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विपस्सना एक प्राचीन और अद्भुत ध्यान प्रयोग है

विपस्सना  एक प्राचीन और अद्भुत ध्यान प्रयोग है
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विपस्सना ध्यान

शरीर को स्वस्थ रखने के उद्देश्य से मानव तरह तरह के व्यायाम करता रहता है, जिससे उसका शरीर स्वस्थ होता है, और शरीर से बीमारियों का नाश भी, वैसे ही मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के उद्देश्य से ध्यान करना चाहिए। मनुष्य ध्यान करने के लिए भी भिन्न भिन्न पद्धति अपनाता रहता है, उन्ही में से एक है, विपस्सना ध्यान 
 इसको करके हम जहाँ मानसिक रूप से स्वस्थ हो सकते है, वहीँ अपने ऊपर नियंत्रण भी रखना सीखते है। आज हम समझेंगे की कैसे इसको समझ कर इसका उपयोग किया जा सकता है और मानसिक रूप से स्वस्थ हुआ जा सकता है तो शुरू करते है, विपस्सना ध्यान को समझकर उपयोग करने की। 


विपस्सना ध्यान क्या है? 

इसके उपयोग को समझने से पहले हम समझेंगे की – विपस्सना ध्यान होता क्या है? असल में विपासना ध्यान, मन को स्वस्थ, शांत और निर्मल करने की वैज्ञानिक विधि होती है। यह आत्मनिरीक्षण की एक प्रभावकारी विधि है। इससे आत्मशुद्धि की जाती है। दूसरे शब्दों में इसे मन का व्यायाम कहा जा सकता है। 
जिस तरह शारीरिक व्यायाम करने से शरीर को स्वस्थ और मज़बूती प्रदान की जाती है, वैसे ही विपस्सना ध्यान से मन को स्वस्थ बनाया जा सकता है। हर परिस्थिथियो का सामना करने के उद्देश्य से इस ध्यान का उपयोग किया जाता है और इसके निरंतर अभ्यास से मन हर स्थिति में संतुलित रहता है।

असल में विपस्सना शब्द पाली भाषा के शब्द ‘पस्सना’ से बना है, जिसका अर्थ है “देखना” (जो चीज जैसी है, उसे उसके सही रूप में देखना)

यह तकनीक हजारों साल पहले की तकनीक है, इसका उद्धव लगभग 2600 साल पहले महात्मा बुद्ध द्वारा किया गया। बीच में यह विद्या लुप्त हो गई थी। दिवंगत सत्य नारायण गोयनका सन 1969 में इसे म्यांमार से भारत लेकर आए।

चलती हुई श्वास को; जैसी चल रही है बस बैठकर उसे देखते रहना है ही विपस्सना ध्यान कहलाता है। इसको हम उदाहरणों की मदद से समझने का प्रयास करेंगे, जैसे राह के किनारे बैठकर कोई राह चलते यात्रियों को देखता है, वह क्या कर रहा है और कहाँ जा रहा है, उसकी सारी गतिविधिओ को देखता है। नदी-तट पर बैठ कर नदी की बहती धार को देखता है उसमे उपस्थित मछलियों को देखता है। 

राह से निकलती हुई कारें, बसें आदि को देखता है, कहने का तात्पर्य है जो भी है, जैसा है, उसको वैसा ही देखते रहना ही विपस्सना ध्यान है। जरा भी उसे बदलने की कोशिश नही करना चाहिए। बस शांत बैठ कर श्वास को देखते रहना और देखते-देखते ही श्वास और शांत हो जाती है। क्योंकि देखने में ही शांति है। इसी को विपस्सना ध्यान कहा जाता है

विपस्सना ध्यान करने से जहाँ मन शांत होता है वही उससे शरीर में कई परिवर्तन देखने को मिलते है। 

जैसे –  लगातार इसका अभ्यास करने से शरीर में रक्त संचार बढ़ता है, रक्त संचार बढ़ने और तनाव मुक्त होने से चेहरे में रौनक आती है। इसके नियमित अभ्यास से में मन शांत होता है तथा आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होती है। एकाग्रता बढ़ाने के लिए यह एक बहुत ही शानदार उपायों में से एक है। इसका नियमित  अभ्यास करने से एकाग्रता बढ़ती है और ध्यान लक्ष्य की ओर केंद्रित होता है साथ ही दिमाग का विकास होता है।
 


इसको करने से व्यक्ति तनाव मुक्त हो जाता है। इस ध्यान को करने से सकारात्मक विचार उत्पन्न होते है और नकारात्मक विचार खत्म हो जाते हैं। मन और मस्तिस्क बिलकुल शांत रहता है।  मन में हमेशा शां‍ति बनी रहती है।  सिद्धियां स्वत: ही सिद्ध हो जाती है। नियमित रूप से करने से देखते-देखते ही आपके सारे रोग दूर हो जाएंगे।
शरीर के रोगों के साथ-साथ आपका मन भी शांत हो जाएगा।  

ध्यान करने का तरीका – विधि 

कोर्स के पहले तीन दिन आती-जाती सांस को लगातार देखना होता है। इसे ‘आनापान’ कहते हैं। आनापान दो शब्दों आन और अपान से बना है। आन मतलब आने वाली सांस। अपान मतलब जाने वाली सांस। इस तकनीक में अपनी श्वास को देखना और उसके प्रति सजग रहना होता है। देखने का अर्थ उसके आवागमन को महसूस करने से है।

विपस्सना ध्यान करने के लिए घर के सबसे शांत कोने का इस्तेमाल करें। कमरे की लाइट बंद करके आसन पर पालथी मार कर बैठ जाना चाहिए एवं आपकी कमर और गर्दन सीधी और आँखें बंद रखना चाहिए। इसके बाद नाक से आने और जाने वाली सांस पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। कुछ दिनों तक इसी का अभ्यास करते रहना चाहिए। इसके बाद सांसों पर ध्यान केंद्रित रखते हुए शरीर में होने वाली संवेदनाओं की अनुभूति करें, यही विपासना है। 

शुरू में इसे कुछ समय तक सुबह-शाम करें, बाद में सुविधा के मुताबिक समय बढ़ा भी सकते हैं। पहले अभ्यास में उठते-बैठते, सोते-जागते, बात करते या मौन रहते किसी भी स्थिति में बस सांस के आने-जाने को नाक के छिद्रों में महसूस करते है। सांस लेने और छोड़ने के बीच जो गैप है, उस पर भी सहजता से ध्यान दें। ज़बरदस्ती इस काम को नहीं करना है। केवल अपनी सांसों पर ध्यान देना ही विपस्सना ध्यान है विपस्सना ध्यान को कई प्रकार से किया जाता है।

पहली विधि

अपने कार्य जैसे अपने शरीर, अपने मन, अपने हृदय के प्रति सजगता रखना चाहिए। चलते समय चलने का अहसास रखना चाहिए, यदि आप हिल रहे है तो उसका भी आपको अहसास होना चाहिए, सुनते समय पुरे होश और हवास से सुनना चाहिए सुबह सैर पर निकले तो अपने पैरों के प्रति सजग रहना चाहिए।

शरीर की हर गतिविधियों के प्रति सजग रहना चाहिए। खाते समय, उन गतिविधियों के प्रति सजग रहना चाहिए जो खाने के लिए ज़रूर होती है। नहाते समय जो शीतलता मिल रही है। जो पानी गिर रहा है और जो अपूर्व आनंद उससे मिल रहा है उस सब के प्रति सजग रहना चाहिए। अपने विचारों के प्रति भी सजग रहना चाहिए।

दूसरी विधि

हमे अपनी श्वास के प्रति सजग होना चाहिए। जैसे ही श्वास भीतर जाती है पेट ऊपर उठने लगता है, और जब श्वास बाहर जाती है तो पेट फिर से नीचे बैठने लगता है। उसके उठने और गिरने के प्रति सजग हो जाना चाहिए। पेट के उठने और गिरने का बोध को महसूस करना चाहिए।

हमे अपने शरीर के प्रति सजग होना है, अपने मन के प्रति सजग होना है। अपने भावों, भाव दशाओं के प्रति सजग होना है तो इसमें तीन चरण हैं। दूसरी विधि में एक ही चरण है। बस पेट ऊपर और नीचे जा रहा है। और परिणाम एक ही है। जैसे-जैसे तुम पेट के प्रति सजग होते जाते हो, मन शांत हो जाता है, हृदय शांत हो जाता है। भाव दशाएं मिट जाती है।

 हमे अपने द्वारा की जाने वाली हर एक गति विधि का ध्यान रखना चाहिए।
 श्वास ही महत्वपूर्ण है क्योंकि क्रोध में श्वास एक ढंग से चलती है, करुणा में दूसरे ढंग से। दौड़ते हो, एक ढंग से चलती है; आहिस्ता चलते हो, दूसरे ढंग से चलती है। चित्त ज्वरग्रस्त होता है, एक ढंग से चलती है; तनाव से भरा होता है, एक ढंग से चलती है; और चित्त शांत होता है, मौन होता है, तो दूसरे ढंग से चलती है।

श्वास भावों से जुड़ी है। भाव को बदलो, श्वास बदल जाती हैं। श्वास को बदल लो, भाव बदल जाते हैं। कोशिश करके देखिये जब क्रोध आये तो श्वास को डोलने मत देना। श्वास को स्थिर रखना, शांत रखना। अलग अलग परिस्थिति पर श्वास अलग अलग होती है।

विपस्सना के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि आप इसे कहीं भी कर सकते हैं। आपके आसपास बैठे लोगों को भी इस बात का पता नहीं चलेगा कि आप क्या कर रहे हैं। यह प्रक्रिया बाहर से देखने में जितनी सरल है, इसमें उतनी ही अधिक गहराई है, जिसे अपनाने के बाद ही महसूस किया जा सकता है।

बस-ट्रेन में यात्रा करते समय या अपने घर में बिस्तर पर लेटे-लेटे भी आप इसे बड़ी सुगमता से किया जा सकता हैं। इससे आपके आसपास के लोगों को भी कोई असुविधा नहीं होती क्योंकि न तो इसमें किसी मंत्र के उच्चारण की जरूरत है और न बार-बार शारीरिक मुद्रा बदलनी होती है। कोर्स कहने को तो यह कोर्स 10 दिन का होता है लेकिन कुल 12 दिन लगते हैं। 10 दिन पूरे और 2 दिन अधूरे। एक दिन पहले सेंटर पहुँचना होता है। दोपहर बाद 2 से 4 बजे के बीच रजिस्ट्रेशन होता है, मोबाइल जैसी चीजें जमा हो जाती हैं और सोने का कमरा अलॉट होता है। शाम 5 बजे से रात करीब 9 बजे तक कोर्स के नियम-कायदों की जानकारी दी जाती है। 

साथ में ध्यान कक्ष में सीट अलॉट की जाती है। उसी पर सभी दिन बैठकर ध्यान करना होता है। कोर्स 11वें दिन सुबह 7:30 बजे खत्म होता है। हर सेंटर एक महीने में 2 कोर्स कराता है। ध्यान कैसे करना है, इस बारे में निर्देश गोयनका जी के हिंदी-अंग्रेजी में रेकॉर्डेड ऑडियो टेप के जरिए दिए जाते हैं। रोज रात को डेढ़ घंटे गोयनका जी का प्रवचन होता है जिसमें विशुद्ध धर्म और ध्यान की बारीकियां समझाई जाती हैं।
 

पहले तीन दिन बस यही करना होता है। चौथे दिन विपश्यना सिखाई जाती है और बाकी 7 दिन इसी की प्रैक्टिस कराई जाती है। इससे इंसान सुख-दुख में भी संतुलन में रह पाता है। उसकी छोटी-मोटी बीमारियाँ तो यूं ही दूर हो जाती हैं।

भारत में करीब 89 केंद्र विपस्सना ध्यान के है। द्विभाषा में यह कोर्स कराये जाते है, साल भर यह कोर्स कराये जाते है, आज दुनिया में लगभग 170 विपस्सना केंद्र और 130 नॉन-सेंटर हैं। इन सेंटरों पर विपासना के 10, 20, 30, 45 और 60 दिनों के कोर्स करवाए जाते हैं। ये कोर्स नि:शुल्क होते हैं। इन कोर्स में से विपस्सना केंद्रों में अधिकतर 10 दिवसीय आवासीय कोर्स प्रसिद्ध है।

यह बेसिक और सबसे कम समय का कोर्स है। इन 10 दिनों में विपासना ध्यान सिखने वाले विद्यार्थी को गंभीरता से काम करना होता है। 10 दिनों के इस कोर्स में शामिल हैं- आर्य मौन : शिविर की शुरुआत से ही सभी को आर्य मौन अर्थात वाणी एवं शरीर से मौन रहना होता है। इसका पालन पहले दिन से 10वें दिन की सुबह 10 बजे तक करना होता है

विपस्सना ध्यान के बारे में पूरी जानकारी यदि आप भी इच्छुक है, इस ध्यान को सीखने के तो एक बार ज़रुर आपको विपस्सना केंद्र जाकर इसको सीखना चाहिए क्योंकि इसको सीख कर करके आप अपने मस्तिष्क को संतुलित करके अपने लक्ष्यों की प्राप्ति कर सकते है।  
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