रामायणकाल की यह घटना आज भी उतना ही प्रासंगिक है – By Govind Prasad BahugunaDoonited News + Positive News
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रामायणकाल की यह घटना आज भी उतना ही प्रासंगिक है – By Govind Prasad Bahuguna

रामायणकाल की यह घटना आज भी उतना ही प्रासंगिक है – By Govind Prasad Bahuguna
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तथाकथित सभ्य और विद्वान् कहे जाने वाले राजा रावण ने जब सीता का अपहरण किया तब एक वृद्ध आदिवासी और वह भी वानप्रस्थी जीवन जी रहे राजा गृद्धराज जटायु ने उस अन्याय और अत्याचार का विरोध और प्रतिकार करने में अपनी आयु का जरा भी ख्याल नहीं किया , उसने रावण जैसे शक्तिशाली और मारक हथियारों से लैस अपहरणकर्ता का विरोध करने का साहस कर दिखाया I

यह घटना आजकल के तथाकथित “सभ्य और प्रगतिशील” कहलाने वाले समाज के लिए एक सन्देश भी देती है कि- लानत है तुम्हारी सभ्यता और प्रगति शीलता पर, जो किसी असहाय लड़की के साथ होते यौनाचार और बलात्कार को अपनी आँखों के सामने होते देख रहे हो, और फिर इतना ही नहीं उस घटना को मीडिया में चटकारे लेकर उछालते हो – लोगों को गुस्सा नहीं आता बल्कि ऐसी घटनाएं उनके लिए मनोरंजन का साधन भी बनती हैं I आये दिन ऐसी घटनाओं की चर्चा अखबारों और मीडिया में देखने सुनने को मिलती हैं I

वाल्मीकि रामायण में वर्णित जटायु का यह प्रसंग आज भी उतना ही सामयिक और प्रासंगिक है जितना उस समय रहा होगा I यह केवल कहानी नहीं है बल्कि “सभ्यता के विकास की कहानी भी है ,इसको एक पौराणिक गाथा कहकर ख़ारिज नहीं किया जा सकता I

एक झलक उस प्रसंग की आज आपलोगों के साथ शेयर करने का मन हुआ अस्तु –

जब रावण सीता का अपरहरण करके ले जा रहा था उसी रास्ते से होकर गुजर रहा था जहां गृद्धराज जटायु अपना वानप्रस्थी समय बिता रहे थे I जटायु उस समय सो रहे थे, उसी अवस्था में उन्होंने सीता की करुण पुकार सुनी , सुनते ही तुरंत आँखें खोलकर उन्होंने अपने सामने सीता और रावण को देखा I अपना परिचय देते हुए उसने कहा -रावण मेरा नाम गृद्धराज जटायु है, भैया तुमको इस समय मेरे सामने ऐसा निन्दित कर्म नहीं करना चाहिए I जब महाबली राम ने तुम्हारे राज्य अथवा नगर में कोई अपराध नहीं किया है तब तुम उनका अपराध कैसे कर रहे हो I सौम्य ! पुरुष को उतना ही बोझ उठाना चाहिए जो उसे शिथिल न कर दे और वही अन्न भोजन करना चाहिए जो पेट में जाकर पच जाय, रोग पैदा न करे I जिस कार्य को करने से न तो धर्म होता हो , न यश कीर्ति बढ़ती हो और न अक्षय यश प्राप्त होता हो उलटे शरीर को खेद हो रहा हो उस कर्म का अनुष्ठान कौन करेगा ? अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ और तुम नवयुवक हो मेरे पास युद्ध करने के कोई साधन उपलब्ध नहीं हैं जबकि तुम्हारे पास धनुष कवच बाण तथा रथ

सब कुछ है फिर भी तुम सीता को लेकर कुशलपूर्वक नहीं जा सकोगे I मुझे अपने प्राण देकर भी श्रीराम और और उनके पिता दशरथ का प्रिय कार्य करना ही होगा I

न भारः सौम्य भर्तव्यो यो नरं नावसादयेत्।
तदन्नपि भोक्तव्यं जीर्यते यदनामयम्।।१८II 
यत् कृत्वा न भवेद् धर्मो न कीर्तर्न यशो ध्रुवम्।
शरीरस्य भवेद खेदःकस्तत् कर्म समाचरेत।।१९ II 
वृद्धोSहं युवा धन्वी सरथ: कवची शरी I 
न चाप्यादाय कुशली वैदेही मे गमिष्यसि II २१ II

Written By Shri. Govind Prasad Bahuguna

 

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