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पलायन के दर्द से कराहता पहाड़

पलायन के दर्द से कराहता पहाड़
Photo Credit To Village Khirsu Picture By Divyanshu Bahuguna
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“भैजी कख जाणा छा तुम लोग, उत्तराखंड आंदोलन मा…दीदा

कख जाणा छा तुम लोग  उत्तराखंड आंदोलन मा” शायद उतराखंड राज्य के लिए उन शहीदों व आंदोलनकारियों के संगर्ष पे लोक गायक श्री नरेंद्र सिंह नेगी जी का ये राज्य आंदोलन गीत सटीक बैठता है।

शहीदों के बलिदान के कारण ही हम आज अलग उत्तराखंड राज्य मिला है। शहीदों और आंदोलनकारियों ने लाठियां सही, गोलियां खाई और सड़कों पर उतरकर संघर्ष किया लेकिन हार नहीं मानी।19 साल बाद उत्तराखंड, राज्य आंदोलन की अवधारणा के उन्हीं प्रश्नों के सामने खड़ा है, जो पलायन, रोजगार, स्वास्थ्य और गुणवत्तापरक शिक्षा से जुड़े हैं। बेरोजगारी चार गुना बढ़ गई है।। इन कठिन हालातों में उत्तराखंड के संतुलित विकास और उसकी गति को बरकरार रखना बेहद चुनौतीपूर्ण है।

 

उत्तराखंड की जब स्थापना हुई होगी तब शायद उत्तराखंड के लोगो को बहुत खुशी हुई होगी एक अलग प्रदेश जो मिला था लेकिन भविष्य में उत्तराखंड के गाँव जो पहाड़ की नींव है वो खाली हो जाएंगे ये शायद ही किसी ने सोचा होगा।आज एक आम पहाड़ी की नज़र से देखा जाए तो ये एक प्रार्थना थी. आज जब उत्तराखंड को बने 19 साल हो गए हैं तो हर किसी के मन में एक ही सवाल है कि, ‘पहाड़ की तक़दीर कितनी बदली.’ लोग यहां तक सोच रहे हैं कि उत्तराखंड का गठन पहाड़ के लिए अच्छा हुआ या बुरा.ये सही है कि पहाड़ की अपनी सरकार है, मुख्यमंत्री है, राजधानी है, लंबा चौड़ा अधिकारी और कर्मचारी तंत्र है, सत्ता के गलियारों में गढ़वाली और कुमाऊंनी बोली सुनाई दे जाती है, लेकिन इस सब में एक आम आदमी के लिए क्या है, ये एक कठिन सवाल है.एक तरह से देखा जाए तो उत्तराखंड की स्थिति कमोबेश वैसी ही हो गई है, जैसी अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय थी.

नौ नवंबर 2000 को अस्तित्व में आए उत्तराखंड को लेकर अब ये सवाल उठते हैं कि राजनीतिक लाभ के लिए ही क्या राज्य का गठन आननफानन में हुआ, भले ही इसके पीछे लोगों का बहुत लंबा और ऐतिहासिक संघर्ष रहा हो.देश के प्रधानमंत्री भी जब अपनी चुनावी सभा करने उत्तराखंड आये थे तो उन्होंने भी एक नारा दिया था कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के ही काम आएगी आज शायद इस नारे को सच करने का समय आगया है  आज हमे समझना होगा कि  कोरोना महामारी के प्रकोप के बाद अगर हमने बचने को जगह दी है तो वो हमारे पहाड़ो ने दी है जब संकट में की इस घड़ी में हम पहाड़ को याद कर सकते हैं तो इसे बचाने का जिम्मा भी हम युवाओं को ही उठाना होगा,हमे समझना होगा वो कौन से छोटे ववयस्य है जिन से हम अपने रोजमरा की जरूरत पूरा कर सकते हैं।आज हमे मशीन से नहीं  हल बैल से खेतो को जोतने की जरूरत है। हमे समझना होगा कि गाँव में जो सुख शांति और सुकून हैं वो शायद शहर में नहीं।

 

अब शायद समय आगया है अगर वाकई में यदि पलायन रोकना है तो हमे भी किसी नए विचार के साथ फिर से अपने गाँवों का रुख करना होगा और एक नयी शुरुआत को जन्म देना होगा। आज समय आ गया है कि युवाओं को शहरों की भीड़ से आगे आकर अपने गाँव को संभालना होगा क्योंकि कुछ अलग करना है तो भीड़ से हटकर चलने की आवश्यकता है। भीड़ साहस तो देती है मगर पहचान छीन लेती है।


Written By : Divyanshu Bahuguna

छात्रसंघ अध्यक्ष 2014-2015 गढ़वाल विश्वविद्यालय
(केंद्रीय विश्वविद्यालय) श्रीनगर गढ़वाल




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