September 25, 2021

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महाभारत कालीन गोलगप्पे

महाभारत कालीन गोलगप्पे

क्या गोलगप्पे महाभारत कालीन हैं?

दुनिया में इतिहास और मिथक दो अलग-अलग चीज़ें होती हैं. महाभारत की कथा के साथ कई मिथक जुड़े हैं. इन्हीं में से गोलगप्पों से भी एक दंतकथा जोड़ दी गई है. इस कथा की प्रामाणिकता पर हम कोई टिप्पणी नहीं कर सकते, लेकिन कहानी रोचक है.

कहते हैं कि जब द्रौपदी की शादी पांचों पांडवों से हुई तो कुंती ने उनकी परीक्षा लेने की सोची. कुंती ने एक दिन द्रौपदी को खूब सारी सब्ज़ी और थोड़ा सा आटा दिया. द्रौपदी को उसी में पांचों पांडवों के लिए कुछ बनाना था. पांचाली ने आटे से गोल-गोल बताशे जैसे बनाए और उनमें बीच में सब्ज़ी भर दी. सारे पांडवों का पेट भर गया और माता कुंती खुश हो गईं. यही गोलगप्पों का सबसे पहला मॉडल था.

वैसे इस मिथक से अलग गोलगप्पों का संबंध मगध साम्राज्य से भी जोड़ने की कोशिश होती है. इंटरनेट पर कई जगह लिखा मिलता है कि मगध साम्राज्य में फुलकिस बहुत लोकप्रिय था. अब इन फुलकिस का स्वाद कभी बुद्ध या अशोक ने चखा होगा, ऐसा होना मुश्किल है. गोलगप्पों का सबसे जरूरी अंग आलू है. आलू पुर्तगालियों की लाई सब्ज़ी है. इसी तरह से गोलगप्पों के पानी को चटपटा बनाने वाली लाल मिर्च भी भारत में 300-400 साल पहले ही आई इसलिए मगध साम्राज्य का सीधा संबंध भी आज के गोलगप्पों से नहीं जोड़ा जा सकता है.

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असल में मिथकों से अलग गोलगप्पा बहुत पुरानी डिश नहीं है. फूड हिस्टोरियन पुष्पेश पंत बताते हैं कि गोलगप्पा दरअसल राज कचौड़ी से बना व्यंजन हो सकता है. इसकी शुरुआत भी उत्तर प्रदेश और बिहार के बीच कहीं, या शायद बनारस में करीब 100-125 साल पहले हुई हो. तरह-तरह की चाट के बीच किसी ने गोल छोटी सी पूरी बनाई और गप्प से खा ली. इसी से इसका नाम गोलगप्पा पड़ गया.

गोलगप्पा भारतीयता का प्रतीक है

गोलगप्पे का असल इतिहास भले ही बहुत पुराना न हो मगर, उनके बारे में एक बात तय है कि ये हिंदुस्तान की शायद सबसे ज्यादा नामों वाली डिश है. हरियाणा में अनुप्रास अलंकार वाले पानी के पताशे, मध्य प्रदेश में फुल्की, उत्तर प्रदेश में ज्यादातर जगह गोलगप्पा और अवध में नाज़ुक से पानी के बताशे, बंगाल में खाते समय हुई फच्च की आवाज़ के चलते फुचका, ओडिशा में गप्प से खाने वाला गपचप, महाराष्ट्र में पानीपूरी, अनेक भाषा के बाद भी एक बना हुआ ये गोल पकवान भारत की विविधता और एकता का सच्चा प्रतीक है. और हां कभी कोई विदेशी आपसे ‘पटैटो इन होल’ पूछे तो उसे तुरंत किसी नजदीकी गोलगप्पे वाले के पास लेकर जाइए.

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वैसे गोलगप्पों, बताशों और फुचका का यह अंतर सिर्फ नाम तक ही सीमित नहीं है. मुख्य रूप से यह एक ही चीज़ है लेकिन जगह-जगह के हिसाब से इसके अंदर का मैटिरियल और पानी बदल जाता है.

मुंबई की पानीपूरी में सफेद मटर मिलती है. पानी में भी हल्का गुड़ मिला होता है. जबकि गोलगप्पा अक्सर आलू से भरा होता है. इसके साथ ही तीखे पानी में हरा धनिया पड़ा होता है. फुचका में आलू के साथ काला चना मिला होना एक आम बात है. जबकि ज़्यादातर बंगाल वाले पानी को तीखे की जगह खट्टा-मीठा रखना पसंद करते हैं. गुजरात और मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में अंकुरित मूंग भी अंदर भरी जाती हैं.

वैसे पानी के साथ-साथ दही और चटनी के साथ भी इन पूरियों को खाने का चलन है. उत्तर भारत के छोटे शहरों के बाज़ारों में आमतौर पर आपको गोलगप्पे में प्याज़ नहीं मिलेगा. इन गोलगप्पे वालों के पारंपरिक ग्राहक ज्यादातर प्याज़-लहसुन न खाने वाले मारवाड़ी दुकानदार या वैष्णव होते हैं. जबकि दिल्ली में प्याज़ वाले पानी के बताशे एक आम चलन है.

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