भगवान एक विश्वास का नाम है, जो कण-कण में बसता है: स्वामी विवेकानंद | Doonited.India
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भगवान एक विश्वास का नाम है, जो कण-कण में बसता है: स्वामी विवेकानंद

भगवान एक विश्वास का नाम है, जो कण-कण में बसता है: स्वामी विवेकानंद
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12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद का जन्म दिवस है, उनका नाम लेते ही सिर श्रद्धा से झुक जाता है, नई सोच और ‘जो कहो वो कर दिखाने’ का जज्बा रखने वाले विवेकानंद एक अभूतपूर्व मानव थे, विवेकानंद का वास्तविक नाम नरेंद्र नाथ दत्त था, मात्र 25 साल की उम्र में अपने गुरु से प्रेरित होकर उन्‍होंने सांसारिक मोह-माया त्‍याग दी और संन्‍यासी बन गए थे, उनके विचार बेहद अनमोल हैं, जिनका पालन करके इंसान सदैव तरक्की की पा सकता है।

विवेकानंद की अनमोल बातें
जब राजा ने विवेकानंद से पूछा-कहां है भगवान

उनसे जुड़ी बहुत सारी कहानियां हैं, जो हमेशा हमें शिक्षा देती हैं, ऐसी ही एक कहानी का जिक्र हम यहां आज करते है, एक बार की बात है, एक बार एक राजा ने स्वामी विवेकानंद को अपने घर में बुलाया और बोला कि तुम लोग पत्थर की पूजा करते हैं, उन्हें अपना भगवान मानते हैं, लेकिन वो तो मात्र पत्थर है, मैं इसे नहीं मानता हूं, तुम लोग पाखंड करते हो, कहां हैं तुम्हारा भगवान, क्या वो सोच सकता है, बोल सकता है, सुन सकता है।

मूर्ति पूजा का रहस्य- एक बार स्वामी विवेकानंद को एक राजा ने अपने भवन में बुलाया और बोला, ‘तुम हिन्दू लोग मूर्ति की पूजा क्यूँ करते हो! मिट्टी, पीतल, पत्थर की मूर्ति का.! पर मैं ये सब नही मानता। ये तो केवल एक पदार्थ है।’ उस राजा के सिंहासन के पीछे किसी आदमी की तस्वीर लगी थी। विवेकानंद जी कि नजर उस तस्वीर पर पड़ी। विवेकानंद जी ने राजा से पूछा, राजा जी, ये तस्वीर किसकी है? राजा बोला, मेरे पिताजी की।

इतना सुनकर राजा आपे से बाहर हो जाता है और वो स्वामी विवेकानंद को कहता है कि आपके होश ठिकाने हैं, इस पर विवेकानंद ने कहा आप क्यों नहीं कर सकते हैं, ये तस्वीर तो केवल एक कागज का टुकड़ा ही तो है, इसमे ना तो जान है, ना आवाज, ना तो ये सुन सकता है, और ना ही कूछ बोल सकता है, इसमें ना ही हड्डी है और ना प्राण, फिर भी आप इस पर कभी थूक नहीं सकते क्योंकि आप इसमे अपने पिता का स्वरूप देखते हैं और आप इस तस्वीर का अनादर करना अपने पिता का अनादर करना ही समझते हैं।

स्वामी जी बोले, उस तस्वीर को अपने हाथ में लीजिये। राजा तस्वीर को हाथ मे ले लेता है।

स्वामी जी राजा से : अब आप उस तस्वीर पर थूकिए।

राजा : ये आप क्या बोल रहे हैं स्वामी जी…?

स्वामी जी : मैंने कहा उस तस्वीर पर थूकिए..!

राजा (क्रोध से) : स्वामी जी, आप होश मे तो हैं ना? मैं ये काम नही कर सकता।

स्वामी जी बोले, क्यों? ये तस्वीर तो केवल एक कागज का टुकड़ा है, और जिस पर कूछ रंग लगा है। इसमे ना तो जान है, ना आवाज, ना तो ये सुन सकता है, और ना ही कूछ बोल सकता है। और स्वामी जी बोलते गए, इसमें ना ही हड्डी है और ना प्राण। फिर भी आप इस पर कभी थूक नही सकते। क्योंकि आप इसमे अपने पिता का स्वरूप देखते हो। और आप इस तस्वीर का अनादर करना अपने पिता का अनादर करना ही समझते हो।

थोड़े मौन के बाद स्वामी जी ने आगे कहा, वैसे ही, हम हिंदू भी उन पत्थर, मिट्टी, या धातु की पूजा भगवान का स्वरूप मान कर करते हैं। भगवान तो कण-कण मे है, पर एक आधार मानने के लिए और मन को एकाग्र करने के लिए हम मूर्ति पूजा करते हैं। स्वामी जी की बात सुनकर राजा ने स्वामी जी के चरणों में गिर कर क्षमा माँगी।

भगवान एक विश्वास का नाम है

उसी तरह से भगवान है, भगवान एक विश्वास का नाम है, वो पत्थर, नदी, फूल, पहाड़ हर जगह है, वो भले ही बोलता नहीं लेकिन हमारी सुनता है, वो कहता नहीं लेकिन हमारी हर बात को समझता है, इतना सुनने के बाद राजा को अपनी गलती का एहसास होता है औऱ विवेकानंद से क्षमा मांगता है।

आप सभी जानते ही होंगे 12 जनवरी, 1863 को स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था और उनका असली नाम नरेंद्र नाथ था जो आगे चलकर स्वामी विवेकानंद हो गया. स्वामी विवेकानंद एक बहुत शानदार दार्शनिक थे और जब भी उनकी बात की जाती है तो उनके अमेरिका के शिकागो की धर्म संसद में साल 1893 में दिए गए भाषण की चर्चा ज़रूर होती है और आज हम उसी भाषण के बारे में बात करने जा रहे हैं. हम बताने जा रहे हैं उस भाषण के बारे में जिसने पूरी दुनिया के सामने भारत को एक मजबूत छवि के साथ पेश किया. आइए जानते हैं उस भाषण की ख़ास बातों को.

1. उन्होंने कहा था- अमरीकी भाइयों और बहनों, आपने जिस स्नेह के साथ मेरा स्वागत किया है उससे मेरा दिल भर आया है. मैं दुनिया की सबसे पुरानी संत परंपरा और सभी धर्मों की जननी की तरफ़ से धन्यवाद देता हूं. सभी जातियों और संप्रदायों के लाखों-करोड़ों हिंदुओं की तरफ़ से आपका आभार व्यक्त करता हूं.

2. उन्होंने कहा था- मैं इस मंच पर बोलने वाले कुछ वक्ताओं का भी धन्यवाद करना चाहता हूं जिन्होंने यह ज़ाहिर किया कि दुनिया में सहिष्णुता का विचार पूरब के देशों से फैला है.

3. उन्होंने कहा था- मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है. हम सिर्फ़ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं.

4. उन्होंने कहा था- मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी. मुझे गर्व है कि हमने अपने दिल में इसराइल की वो पवित्र यादें संजो रखी हैं जिनमें उनके धर्मस्थलों को रोमन हमलावरों ने तहस-नहस कर दिया था और फिर उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली.


5. उन्होंने कहा था- मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और लगातार अब भी उनकी मदद कर रहा है.

6. उन्होंने कहा था- मैं इस मौके पर वह श्लोक सुनाना चाहता हूं जो मैंने बचपन से याद किया और जिसे रोज़ करोड़ों लोग दोहराते हैं. ”जिस तरह अलग-अलग जगहों से निकली नदियां, अलग-अलग रास्तों से होकर आखिरकार समुद्र में मिल जाती हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा से अलग-अलग रास्ते चुनता है. ये रास्ते देखने में भले ही अलग-अलग लगते हैं, लेकिन ये सब ईश्वर तक ही जाते हैं.

7. उन्होंने कहा था- मौजूदा सम्मेलन जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, वह अपने आप में गीता में कहे गए इस उपदेश इसका प्रमाण है: ”जो भी मुझ तक आता है, चाहे कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं. लोग अलग-अलग रास्ते चुनते हैं, परेशानियां झेलते हैं, लेकिन आखिर में मुझ तक पहुंचते हैं.”

8. उन्होंने कहा था- सांप्रदायिकता, कट्टरता और इसके भयानक वंशजों के धार्मिक हठ ने लंबे समय से इस खूबसूरत धरती को जकड़ रखा है. उन्होंने इस धरती को हिंसा से भर दिया है और कितनी ही बार यह धरती खून से लाल हो चुकी है. न जाने कितनी सभ्याताएं तबाह हुईं और कितने देश मिटा दिए गए.

9. उन्होंने कहा था- यदि ये ख़ौफ़नाक राक्षस नहीं होते तो मानव समाज कहीं ज़्यादा बेहतर होता, जितना कि अभी है. लेकिन उनका वक़्त अब पूरा हो चुका है. मुझे उम्मीद है कि इस सम्मेलन का बिगुल सभी तरह की कट्टरता, हठधर्मिता और दुखों का विनाश करने वाला होगा. चाहे वह तलवार से हो या फिर कलम से.

आज से नहीं बल्कि काफी समय पहले से ही हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा का महत्व रहा है और यह महत्व आज भी पूरी विधि-विधान के साथ मनाया जाता है। लेकिन ऐसा क्या कारण है जो हिन्दू धर्म में ही मूर्ति पूजा को इतना महत्व दिया जाता है? दरअसल इसके पीछे भी एक रहस्य विद्यमान है, जिसे बहुत ही कम लोग जानते हैं। आज हम आपसे हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा से संबधित एक ऐसे ही रहस्य के बारे में चर्चा करने वाले है, जिससे आप भी यह जान जाओगे कि आखिर हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा का इतना महत्व क्यों है?

 

 

 

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