DNA: रिलीज से पहले ही ‘गोदान’ पर बैन की मांग, आखिर क्यों भड़का विवाद?

DNA: रिलीज से पहले ही ‘गोदान’ पर बैन की मांग, आखिर क्यों भड़का विवाद?

Ghooskhor Pandat And Godaan Controversy: आज हम एक ऐसे विषय के बारें में बात करने वाले हैं जिसपर धर्मगुरुओं और राजनीतिक पार्टियों के बीच इन दिनों बहस हो रही है. जल्द ही बॉलीवुड में एक फिल्म आ रही है, जिसका टाइटल गोदान है. मुंशी प्रेमचंद के कालजयी उपन्यास ‘गोदान’ का नाम सुनते ही मन में किसान की पीड़ा और एक गाय की लालसा जागती है, लेकिन 2026 की यह फिल्म ‘गोदान’ उस साहित्य से आगे बढ़कर सीधे आज के ज्वलंत मुद्दों से टकरा रही है.

आप सोच रहे होंगे कि गो संरक्षण और गो संस्कृति पर बनी किसी फिल्म से किसी भारतीय को क्या आपत्ति हो सकती है. लेकिन आपत्ति की उत्पत्ति कहां से हुई उसे समझने के लिए आपको इस फिल्म के ट्रेलर का कुछ हिस्सा देखना चाहिए

ट्रेलर के डायलॉग बड़ी वजह
इस ट्रेलर का ये डायलॉग विवाद की सबसे बड़ी वजह बन गया है. मुस्लिम धर्मगुरुओं का आरोप है कि फिल्म में गौ-तस्करी के पीछे एक खास वर्ग को दिखाया गया है.. जिससे पूरे समुदाय की छवि नकारात्मक रूप से पेश की जा रही है. इस फिल्म के ट्रेलर में एक और चीज लोगों का ध्यान खींच रही है. फिल्म में इंदिरा गांधी का किरदार है. ट्रेलर के इसी हिस्से से कांग्रेस पार्टी भी नाराज नजर आ रही है.

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कांग्रेस पार्टी कर रही विरोध
फिल्म का एक तरफ कांग्रेस पार्टी पुरजोर विरोध कर रही है. वहीं बीजेपी शासित राज्यों के कई मुख्यमंत्रियों ने इस फिल्म का पोस्टर रिलीज किया है. गोदान की टीम ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथों पोस्टर रिलीज करवाया. गुजरात, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों से भी गोदान की टीम ने मुलाकात की है.

इस फिल्म को लेकर विवाद की वजह इसमें 1966 के गोरक्षा आंदोलन का चित्रण भी है. फिल्म के ट्रेलर में संसद भवन के सामने साधु संतों पर गोली चलते हुए दिखाया गया है. फिल्म में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी दिखाया गया है. जो विरोध की वजह बन गया है. आज आपको ये जानना चाहिए कि साधु-संतों का वो आंदोलन क्या था और ये विवाद की वजह क्यों बना है.

बता दें कि 60 के दशक में गौ-रक्षा का मुद्दा तेज हुआ और 1966 तक ये बड़े आंदोलन में बदल गया. साधु, संत और हिंदू संगठनों ने सरकार से गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग की. 7 नवंबर 1966 को दिल्ली में संसद भवन के सामने प्रदर्शनकारी जमा हो गए. जब प्रदर्शनकारी संसद भवन में प्रवेश करने की कोशिश करने लगे तब सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प हो गई. आंदोलनकारियों को रोकने के लिए पुलिस को गोली तक चलानी पड़ी थी. कई रिपोर्ट्स में ये दावा किया गया है कि गोलीबारी में 8-10 आंदोलनकारियों की मौत हो गई थी. जिसमें कई साधु संत शामिल थे. उस वक्त देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं. उन पर आंदोलन को रोकने के लिए अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगा. शायद यही वजह है कि आज एक बार फिर इतिहास के उस रक्तरंजित चैप्टर को खोलने पर कांग्रेस नाराज है.

वहीं जो लोग आज गोदान फिल्म के ट्रेलर को देखकर फिल्म का विरोध कर रहे हैं. ये वही लोग हैं जो घूसखोर पंडत नाम की आने वाली फिल्म को लेकर चुप हैं. इन्हें गोदान का पोस्टर और ट्रेलर एक समुदाय के खिलाफ लगता है. लेकिन घूसखोरी को एक जाति से जोड़ने पर इन्हें कोई ऐतराज नहीं होता है.

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