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Rajpal Yadav: मैं विवाद की नहीं, संवाद की राजनीति करने आया हूं, हम चुनाव लड़ेंगे, लेकिन हमारा अंदाज अलग होगा, हम समाज को सिखाएंगे कि पॉलिटिक्स कैसे की जाती है…ये बातें आज करीब 10 साल पहले राजपाल यादव ने कही थी. साल 2016 में उन्होंने सर्व संभाव पार्टी (एसएसपी) नाम की पार्टी बनाई और यूपी की सियासत में कदम रखा, अभिनेता से नेता बने राजपाल यादव का उत्साह उन दिनों चरम पर था. उन्हें लगता था कि सियासत आसान है हालांकि साल 2017 के विधानसभा चुनाव में ये बात काफी हद तक समझ आ गई. उस दौरान 403 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान करने वाले राजपाल यादव आज कर्ज से जूझ रहे हैं.
जोश के साथ सियासत में रखा कदम
तब एक बयान देते हुए ये भी कहा था कि मैं ये साफ करना चाहता हूं कि ये पार्टी चुनावी मौसम का मेढक नहीं है. चुनाव एक सही समय है, जब हम समाज के सामने अपनी भावना लेकर हाजिर हों लेकिन अब आलम ऐसा है कि राजपाल यादव ने कोर्ट में ये कहते हुए सरेंडर कर दिया कि मेरे पास कर्ज चुकाने के लिए पैसे नहीं है. वो कहते हैं न कि जब वक्त करवट लेता है तो तो बाजियां नहीं जिंदगियां पलट जाती है.
यूपी चुनाव से पहले बनाई पार्टी
यूपी के शाहजहांपुर के बंडा ब्लॉक से ताल्लुक रखने वाले राजपाल यादव ने एक नए विजन के सात सियासत में कदम रखा था और साल 2017 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी सियासी मैदान में उतरी थी. इस पार्टी का नाम था ‘सर्व संभाव पार्टी’. पार्टी का गठन करते समय राजपाल ने भगवत गीता, पवित्र कुरान, बाइविल, गुरुग्रंथ साहिब, रामायण और भारत के संविधान को अपने सामने रखकर ईमानदारी से प्रदेश में काम करने का निश्चय किया था. उनकी पार्टी जोश के साथ चुनावी मैदान में उतरी थी लेकिन सियासी मैदान में राजपाल यादव के मंसूबों पर पानी फिर गया, यूपी विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने करीब 250 प्रत्याशियों को मैदान में उतारा था. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सभी प्रत्याशियों को मिलाकर ढाई-तीन लाख वोट मिला था. कुछ प्रत्याशियों का तो प्रदर्शन ऐसा था कि उन्हें केवल 10-15 हजार तक वोट मिले थे.
एक हार और लगा सियासत पर ब्रेक
इस चुनाव में मिली हताशा के बाद राजपाल यादव का सपना टूटने लगा, हालांकि उन्होंने एक बार फिर जोर भरा और संगठन को मजबूती प्रदान करने लगे. साल 2022 की तैयारियों में लग गए थे. कहा जाता है कि रुहेलखंड समेत आसपास के जिलों की करीब 100 सीटों पर प्रत्याशी उतारने का खाका तैयार कर लिया गया था लेकिन साल 2020 में आए कोरोना ने काफी कुछ बिगाड़ दिया. इसके बाद धीरे-धीरे राजपाल यादव का मोह राजनीति से भंग हो गया और वो सियासत से दूरी बनाने लगे.
लगातार उड़ती रही अफवाहें
राजपाल यादव का हमेशा से समाजवादी पार्टी का करीबी बताया जाता रहा है. कई मौकों पर ये देखने को मिला, जब-जब भी वो सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव से मुलाकात करने पहुंचे तो सियासी सरगर्मियां बढ़ जाती थी. साल 2019 में ये आलम देखने को मिला था, मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने अखिलेश यादव से मुलाकात की थी फिर अफवाह उड़ी को समाजवादी पार्टी उन्हें चुनाव लड़ा सकती है. ये चर्चा इसलिए भी और होने लगी क्योंकि उसी दौरान दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ ने बीजेपी जॉइन की थी.
शीला दीक्षित से की थी मुलाकात
इसके बाद उन्होंने शीला दीक्षित से भी मुलाकात की थी. जिसके बाद ये भी कयास लगाए जा रहे थे कि वो कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं और मनोज तिवारी के खिलाफ चुनावी मैदान में उतर सकते हैं. हालांकि राजपाल यादव ने कांग्रेस में शामिल होने से इनकार कर दिया था. उन्होंने कहा था कि वह दिल्ली आते हैं तो शीला दीक्षित से मिलते भी जाते हैं.
रोते को हंसाने वाले पर कर्ज
अभिनेता से नेता बनने के पहले राजपाल यादव की शुमार देश के मशहूर कॉमेडियन में होती थी. राजपाल यादव अपने दमदार अभिनय और अंदाज से लोगों को चेहरे पर मुस्कान ला देते थे. वो दौर ऐसा भी था कि किसी भी हिट फिल्म में कॉमेडियन का किरदार राजपाल यादव ही निभाते थे लेकिन वक्त का पासा ऐसा पलटा कि पैसों और शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचने वाले राजपाल यादव आज कर्ज को लेकर परेशान हैं.
क्यों हो रही है चर्चा
हाल में ही चेक बाउंस से जुड़े मामलों की वजह से उन्हें तिहाड़ जेल प्रशासन के सामने सरेंडर करना पड़ा. ये मामला साल 2010 का है, साल 2010 में ‘अता पता लापता’ नाम की एक फिल्म आई थी. जिसे उन्होंने डायरेक्ट किया था. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली और यहीं से उनकी आर्थिक परेशानियां शुरू हो गईं. उनपर करीब 9 करोड़ का कर्ज हो गया. जैसे ही ये खबर फैली इंडस्ट्री में हलचल मच गई, जिसके बाद कई कलाकार, राजनेता राजपाल यादव की मदद के लिए आगे आए हैं जो राजपाल यादव की आर्थिक मदद कर रहे हैं.
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