
कैमरा गटर पर टिका है… जबकि भारत की नई पीढ़ी सितारों की ओर बढ़ रही है।
क्या सचमुच भारत की Gen Z वही है, जो सोशल मीडिया की रीलों, ट्रोलिंग और विवादों में दिखाई जाती है?
क्या हमारी नई पीढ़ी सिर्फ मोबाइल, मीम्स और वायरल वीडियो तक सीमित है?
या फिर कैमरे का फोकस कहीं और है… और असली भारत किसी और दिशा में आगे बढ़ रहा है?
आज बात किसी राजनीतिक बहस की नहीं, बल्कि उस भारत की है जो शोर नहीं करता… लेकिन पूरी दुनिया को अपनी उपलब्धियों से जवाब देता है।
आज यदि आप टीवी चैनल खोलें या सोशल मीडिया स्क्रॉल करें, तो अक्सर आपको वही कुछ चेहरे दिखाई देंगे जो विवाद पैदा करते हैं।
कोई सड़क पर हंगामा कर रहा है…
कोई अभद्र भाषा बोल रहा है…
कोई सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचा रहा है…
और धीरे-धीरे यही तस्वीर पूरी पीढ़ी की पहचान बना दी जाती है।
लेकिन एक सवाल पूछिए…
क्या करोड़ों युवाओं का प्रतिनिधित्व वही कुछ लोग करते हैं जिन्हें कैमरा बार-बार दिखाता है?
उत्तर है—नहीं।
क्योंकि कैमरा अक्सर वहीं जाता है जहाँ सनसनी होती है।
लेकिन इतिहास हमेशा वहाँ लिखा जाता है जहाँ मेहनत होती है।
पिछले कुछ सप्ताहों में दुनिया ने भारत का एक बिल्कुल अलग चेहरा देखा।
स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित प्रतियोगिताओं में भारतीय खिलाड़ियों ने स्वर्ण, रजत और कांस्य पदकों की शानदार झड़ी लगा दी।
शर्मिला धनकर…
दिलीप महाडू गावित…
ज्ञानेश्वरी यादव…
मुथुपांडी राजा…
सरवेश कुशारे…
गुलवीर सिंह…
मुरली श्रीशंकर…
मोहम्मद बासिल…
वल्लूरी अजय बाबू…
बिंद्यारानी देवी…
शिल्पा शायला…
इन खिलाड़ियों ने न किसी देश का अपमान किया…
न कोई नफरत फैलाई…
न कोई विवाद पैदा किया…
उन्होंने सिर्फ तिरंगा ऊँचा किया।
राष्ट्रगान बजा…
आँखों में आँसू आए…
और पूरी दुनिया ने भारत को सम्मान से देखा।
इसके बाद आया इंटरनेशनल मैथमैटिकल ओलंपियाड।
जहाँ भारत के छात्रों ने फिर साबित कर दिया कि मेहनत और प्रतिभा की कोई सीमा नहीं होती।
एबेल जॉर्ज…
आरव गुप्ता…
कनव तलवार…
संजना चाको…
बैरव मुरुगन…
श्रेया शांतनु…
इन बच्चों ने सोशल मीडिया पर ट्रेंड बनने के लिए नहीं पढ़ाई की।
उन्होंने कठिन समीकरण हल किए।
उन्होंने अनुशासन चुना।
उन्होंने ज्ञान चुना।
और भारत का नाम रोशन किया।
आज दुनिया जब शतरंज की बात करती है…
तो भारत का नाम सबसे आगे आता है।
डी. गुकेश…
आर. प्रज्ञानानंद…
आर. वैशाली…
दिव्या देशमुख…
ये सिर्फ खिलाड़ी नहीं…
भारत की नई बौद्धिक शक्ति के प्रतीक हैं।
इसी समय देश के हजारों युवा…
सैटेलाइट बना रहे हैं…
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विकसित कर रहे हैं…
रोबोटिक्स में शोध कर रहे हैं…
डिफेंस टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं…
सेमीकंडक्टर उद्योग में योगदान दे रहे हैं…
और ऐसे स्टार्टअप बना रहे हैं जिनका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।
फिर भी अक्सर कहा जाता है…
आज की पीढ़ी आलसी है…
आज की पीढ़ी में संस्कार नहीं हैं…
आज की पीढ़ी सिर्फ फोन चलाती है…
लेकिन क्या यह पूरी सच्चाई है?
नहीं।
सच्चाई यह है कि भारत की अधिकांश Gen Z पहले से अधिक पढ़ी-लिखी है…
तकनीक में अधिक दक्ष है…
वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रही है…
और बड़े सपने देखने का साहस रखती है।
हाँ…
कुछ लोग गलत रास्ता चुनते हैं।
लेकिन कुछ लोगों की गलती पूरी पीढ़ी की पहचान नहीं बन सकती।
भारत की असली Gen Z…
अपने कंधों पर मेडल लेकर चल रही है।
अपने दिमाग में कठिन समीकरण लेकर चल रही है।
अपने हाथों में लैपटॉप लेकर भविष्य बना रही है।
अपने सीने पर तिरंगा लेकर दुनिया जीत रही है।
दुर्भाग्य यह है कि कैमरा अक्सर नालियों की ओर देखता है…
जबकि पूरी एक पीढ़ी सितारों की ओर बढ़ रही होती है।
हमें तय करना है…
हम अपने युवाओं को किस नज़र से देखेंगे।
कुछ वायरल वीडियो के आधार पर…
या उनकी मेहनत, अनुशासन और उपलब्धियों के आधार पर।
हर पीढ़ी में चुनौतियाँ होती हैं।
हर पीढ़ी में कुछ गलत उदाहरण भी होते हैं।
लेकिन किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके सर्वश्रेष्ठ युवाओं से तय होता है, न कि उसके सबसे शोर मचाने वाले लोगों से।
आइए, उन युवाओं को पहचानें जो बिना शोर किए भारत का भविष्य लिख रहे हैं।
कैमरा चाहे जहाँ देखे…
दूनाइटेड की नज़र उस भारत पर रहेगी जो मेहनत, प्रतिभा और सकारात्मक सोच से आगे बढ़ रहा है।
जय हिन्द।
Be Positive. Be United.