गोपाल की दुनिया – By Akhilesh Pradhan | Doonited.India

May 26, 2019

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गोपाल की दुनिया – By Akhilesh Pradhan

गोपाल की दुनिया – By Akhilesh Pradhan
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ये नजारा सिल्थिंग गांव का है। सिल्थिंग मुनस्यारी तहसील के अंतर्गत आता है, यह गांव गोरीपार के ठीक पीछे की पहाड़ी में पड़ता है जहाँ तक जाने के लिए मदकोट से ही गाड़ी चलती है। आज हम‌ आपको जिन गोपाल जी के बारे में बारे में बताने जा रहे हैं, वे इसी गांव के हैं, गोपाल 35 वर्ष के हैं, वे जन्म से अंधे हैं। कुदरत ने उनसे आंखों की रोशनी तो छीन ली लेकिन बाकी चीजों का ऐसा अनुकूलन कर दिया कि गोपाल बस एक डंडे के सहारे गांव-गांव नाप लेते हैं। उनकी श्रवणशक्ति गजब की है, वे चीजों को बड़ी तेजी से सेंस कर लेते हैं।

 

 

सिल्थिंग गांव की वो पहली सुबह, मैं उठा और पास में स्थित नौले से मुंह धोकर आ रहा था, उसी समय मैंने सबसे पहले गोपाल को देखा, वे ढेर सारी बकरियों और गायों को घास चराने ले जा रहे थे, मेरे दोस्त रूककर उनसे बात कर रहे थे, उस समय मुझे उनके बारे में कुछ भी पता नहीं था। मुझे बाद में मेरे दोस्त ने बताया कि यार आज सुबह जो वो मिले थे न वे पूरी तरह से अंधे हैं। फिर भी उनको इस गांव का और आसपास के गांवों का एक-एक रास्ता पता है।

लेकिन गोपाल इन खतरनाक पहाड़ी रास्तों में ये सब कैसे कर लेते हैं, ऐसी पगडंडियां जहां एक कदम फिसला तो या तो गंभीर चोट लग सकती है या फिर जान का खतरा हो सकता है।

 

 

मुझे नहीं पता कि गोपाल अपना दैनिक जीवन का काम कैसे करते होंगे, लेकिन गांव वाले कहते हैं कि वो कभी किसी का सहारा नहीं लेते, उनके दिमाग में पूरा उस पहाड़ी गांव का और साथ ही आसपास के कुछ गांवों का एक मानचित्र सा बन गया है। वो कदम-कदम में चल के बता देते हैं कि यहां पर एक स्कूल है, यहां पेड़ है, यहां अस्तबल है, यहां किराने की दुकान है, दाहिने तरफ खेत है, इधर ये बिजली का खंभा है, उधर नौले, यहां फलां व्यक्ति का घर..वगैरह वगैरह।

दोस्त की दीदी के घर से जब हम अपने अगले पड़ाव के लिए निकले तो जाने से पहले परंपरा अनुसार गुड़ खाया, माथे में टीका लगाया और दोपहर को हम लोगों ने सिल्थिंग गांव से विदा लिया। हमें सात किलोमीटर दूर पगडंडियों से होकर चलते-चलते रिंग्यू गांव जाना था, रिंग्यू में पोस्ट आफिस की सुविधा है और आइडिया का नेटवर्क भी थोड़ा बहुत मिल जाता है। हम जब अपने दोस्त के साथ रिंग्यू के लिए निकले तो हमारे साथ गोपाल भी आ रहे थे। हम जैसे ही उनके पीछे चलने को होते, वे थोड़ा रूकते और कहते कि चलो आगे चलो मैं पीछे-पीछे आ रहा हूं। रास्ते भर मैं पीछे मुड़-मुड़कर गोपाल की चलाई देखता, हल्का सा सिर को टेढ़ा किए हुए एक डंडे के सहारे मस्त चले आ रहे थे। जैसे ही उस पगडंडी वाले रास्ते में उबड़-खाबड़ वाले पत्थर आते गोपाल की स्थिति वहां कुछ ऐसी हो जाती जैसे एक चलती गाड़ी अचानक गड्ढे आने पर हल्की डोलने लगती है।

 

 

इन गुजरते सालों में निश्चय ही इस दरम्यान गोपाल को चोटें भी आई। कभी पैर छिल गया, मोच आ गई तो कभी कांटे चुभ गये, कभी बिच्छू घास लग गया लेकिन आजतक उन्हें किसी प्रकार की कोई गंभीर चोट नहीं लगी। जब हम रिंग्यू पहुंचने वाले थे तो उससे पहले एक सरकारी स्कूल आता है, स्कूल तक पहुंचने में लगभग 200 मीटर बचा हुआ था, हमने गोपाल को जांचने के लिए झूठ बोला और कहा कि तुम तो कह रहे थे कि स्कूल आएगा तो बता दूंगा लेकिन स्कूल तो हमने पार कर लिया, तुम्हें पता भी नहीं चला। फिर गोपाल सिर हिलाते हुए एक सौम्य सी मुस्कुराहट फेरते हुए बोले कि अरे नहीं अभी नहीं आया होगा, थोड़ा बाकी है शायद अब आएगा स्कूल इधर। और निस्संदेह गोपाल का अनुमान एकदम सटीक था। हम स्कूल के एकदम करीब थे।

आगे फिर रिंग्यू गांव जाने के लिए दो रास्ते आए, एक ऊपर की ओर था और एक ढलान की ओर। हम जब ऊपर की ओर जाने लगे तो पीछे-पीछे आ रहे गोपाल रूक से गये और कहने लगे कि शायद नीचे जाना है यहां से, आसपास किसी से पूछना तो। हम तो एक पल के लिए ताज्जुब रह गये। क्योंकि जो नीचे वाला रास्ता जो था वो काफी शार्टकर्ट था और उसके बारे में मुझे और मेरे दोस्त को कोई जानकारी नहीं थी। गोपाल की वजह से हम एक लंबी दूरी तय करने से बचे। पता नहीं आप यकीन कर पाएंगे पर यूं समझिए कि गोपाल हमारे लिए किसी गाइड के समान थे। रिंग्यू हम पहली बार जा रहे थे, वैसे तो हम पूछताछ करके रिंग्यू तक पहुंच सकते थे लेकिन गोपाल ने हमारी पैदल यात्रा सरल,सुखद एवं आश्चर्य और रोमांच से भरपूर बना दी।

गोपाल ने फिर हमें जो बताया उससे जो थोड़ी बहुत शक की गुंजाइश थी वो भी खत्म हो गई। उन्होंने कहा- जब कोई मुझसे पहली बार मिलते हैं वे हमेशा यही सोचते हैं कि मुझे थोड़ा बहुत तो कम से कम दिखता ही होगा। गोपाल जो कह रहे थे तो मेरे मन में भी था कि यार इन्हें थोड़ा बहुत तो दिखता ही होगा नहीं तो ऐसे कोई कैसे पैदल चल सकता है। लेकिन सच्चाई तो यही है कि वे पूरी तरह से अंधे हैं। गोपाल कहते हैं कि लोग अड़ जाते हैं कि मुझे दिखता होगा लेकिन मैं तो ठहरा जन्म से अंधा, अब इनको कैसे समझाऊँ। जब हमने उनसे पूछा कि वे ये सब कैसे कर लेते हैं तो वे बोले कि मुझे भी नहीं पता, बस आदत हो गई है।

जब हम रिंग्यू गांव के लिए पैदल निकले थे तो समझिए कि कुल जमा दो घंटे हम गोपाल के साथ थे। इस बीच मन में बार-बार आया कि यार इनके साथ फोटो खिंचवा लिया जाए, इन्हें तो वैसे भी नहीं दिख रहा, रिकार्डिंग कर लेते हैं इनका चलना, बातें करना, मुस्कुराना आदि आदि। पर हमने ऐसा कुछ भी नहीं किया, उनके मूल स्वरूप को नहीं छेड़ा उन्हें जस का तस स्वीकार किया, उनसे खुद आगे आकर उतनी बात भी नहीं की, बस उनकी बातें सुनते रहे, कुछ यूं वो चंद घंटे जो हम‌ उनके साथ थे उसे हम पूरी तरह से जीने लगे।

 

Story by Akhilesh Pradhan
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