May 18, 2022

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पुस्तकें सबसे अच्छी दोस्त हैं, उन्हें प्यार करो : पद्मश्री डा. वीकेएस संजय

पुस्तकें सबसे अच्छी दोस्त हैं, उन्हें प्यार करो : पद्मश्री डा. वीकेएस संजय


देहरादून: संजय आर्थाेपीडिक, स्पाइन एवं मैटरनिटी सेंटर एवं सेवा सोसाइटी के द्वारा विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर जनजागरूकता व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुनील उनियाल गामा महापौर, नगर निगम, देहरादून थे। कार्यक्रम में अति विशिष्ठ अतिथि पद्मश्री डॉ. माधुरी बर्थवाल, प्रो. जे. पी. पचौरी कुलपति, विशिष्ठ अतिथि असीम शुक्ला, पारितोष किमोथी, अतिथि वक्ता डॉ. राम विनय सिंह, जसवीर सिंह हलधर, डौली डबराल, शादाब अली, विश्वम्बर नाथ बजाज, सविता मोहन, डॉ. सुजाता संजय, डॉ. गौरव संजय आदि उपस्थित रहे।कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. सुधारानी ने की एवं संचालन श्रीकांत एवं मीरा ने किया।


यह पूरे विश्व के लोगों के द्वारा हर वर्ष मनाया जाने वाला एक वार्षिक कार्यक्रम है। इस दिन ग्राहक को रिझाने के लिए विक्रेता हर एक किताब पर एक गुलाब देते हैं जिससे पाठक किताबें पढ़ने के लिये प्रोत्साहित हों और सम्मानित महसूस करें। मुख्य अतिथि सुनील उनियाल गामा, महापौर, नगर निगम, देहरादून के द्वारा अन्य अतिथियों की उपस्थिति में दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।

सभी अतिथिगणों ने पुस्तकों के महत्व के ऊपर अपने-अपने विचार व्यक्त किए। मुख्य अतिथि ने अपने संबोधन के दौरान सभी नागरिकों से अपील की कि शहर को स्वच्छ और हरा-भरा रखने के लिए यह एक संयुक्त प्रयास होना चाहिए ताकि हम शहर की स्वच्छता रैंकिंग में सुधार कर सकें। डॉ. सुधा रानी पांडेय पूर्व कुलपति ने आयोजक व अतिथियों को सुझाव दिया कि युवा पीढ़ी के हित के लिए भविष्य में इस तरह का कार्यक्रम आयोजित किया जाए।


पद्मश्री डॉ. बी. के. एस. संजय ने कहा कि हमारे शास्त्रों में लिखा है कि विचारः परम ज्ञानम अर्थात विचार परम ज्ञान है और यह भी लिखा है- ज्ञानम परम् बलम ज्ञान सबसे बड़ा बल है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था जिस तरह पौधे को पानी की जरूरत पड़ती है उसी तरह एक विचार को प्रचार-प्रसार की जरूरत पड़ती है वरना दोनों मर जाते हैं। पुस्तकें किसी भी विचार के प्रचार-प्रसार का अच्छा, सस्ता और स्थायी माध्यम हैं।


हजारों साल पहले सिखाने का अधिकार गुरू का था। जिससे ज्ञान का प्रचार और प्रसार सीमित था। आपने पढ़ा भी होगा और सुना भी होगा द्रोणाचार्य का दृष्टान्त। जिन्होंने कर्ण और एकलव्य को शिक्षा देने से इंकार कर दिया था। पुस्तकें किसी भी विचार के प्रचार-प्रसार का अच्छा, सस्ता और स्थायी माध्यम हैं। लेखक लिखने के बाद मर जाते हैं पर पुस्तकें अमर रहती हैं जैसे हमारे ग्रंथ रामायण, महाभारत।

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