September 25, 2021

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चोरी हो जाते है सपने : अशोक कुमार शुक्ला

चोरी हो जाते है सपने : अशोक कुमार शुक्ला

क्या लिखना था
याद तो है

लेकिन कैसे लिखूं..?
छुटकी का संदेशा आया है
“पता नहीं क्यों..
नींद नहीं आती
सारी सारी रात 
यूँ ही आँखों में गुजर जाती है
आँख अगर लगती भी पल भर को
तो दीखते हैं 
अजीब अजीब से सपने
मैं क्या करूँ दद्दा…?”
मैंने भी 
सारे परंपरागत उपदेश 
उंडेल दिए इनबॉक्स में 
मसलन
ज्यादा सोचा मत करो
समय से सो जाया करो
कही उनसे
झगड़ा तो नहीं कर बैठी हो कोई..?
ऐसा ही और बहुत कुछ
लेकिन 
नहीं बताया उसे 
कि 
आजकल 
मेरा भी वी पी बढ़ गया है 
नींद के लिए 
मैं भी खाने लगा हूँ गोलियां
अक्सर चला जाता हूँ 
घर के उस एकांत कमरे में 
जहां तुमने जो रख छोड़ी है
अपनी ढेरों निशानियाँ
उसी फिरोजी रंग के 
दुपट्टे में लिपटी 
रखी हैं गुड़िया 
जिसे बाबू जी लाये थे 
देवांशरीफ के मेले से 
अक्सर टटोलता हूँ वो डायरी 
जिसमे तुमने 
लिखने शुरू किये थे देवी गीत 
परंतु जिसका पिछ्ला हिस्सा 
भरा पड़ा है रफ़ी लता के 
दर्दभरे गीतों के मुखड़े से
निहारता हूँ वो गुलाबी फ्राक
जो मैंने पार्सल की थी 
जब पहली बार 
नौकरी करने 
पहाड़ पर गया था 
और 
मिली थी मुझे
अपनी पहली तनख्वाह 
बाबूजी का खादी का गाउन 
देखता हूँ
साथ ही देखता हूँ 
तुम्हे गुदगुदी करना 
और फिर तुम्हारा खिलखिलाना
सचमुच 
देखते ही देखते 
कितना बदल गया सब कुछ
कितने बदल गए सपने 
मेरी आँखों में 
तुम्हे हमेशा खुश देखने का सपना 
अब भी तो है
तुम ही तो थी
जो सपनों सी बसती थी 
घर के हर सदस्य की आंखो में 
कुछ दिनों बाद
चोरी चोरी 
सपना बनकर बसने लगी थी 
किसी और की भी आँखों में 
पगली .. यही रीति है 
रोती बिलखते 
बिदा किया था तुम्हे 
ताकि जा कर बसो 
उसी आँगन में
जिनके सपनो में
चोरी-चोरी जगह बनायी थी तुमने
अब सोच रहा हूँ.. 
….कहाँ तो तुम 
हम सब की आँखों का 
जीती जागती सपना थी..!
…और कहाँ 
आज तुम्हारी आँखे
खुद तरस रही हैं
नींद में भी 
सपना देखने को…!

इस जग की 
यही रीत है पगली..!
सपने चोरी हो जाते है

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