नई दिशा : By कुसुम गोस्वामी किम  | Doonited.India

February 17, 2019

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नई दिशा : By कुसुम गोस्वामी किम 

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चाय की चुस्कियों के साथ ख़ुद को पुन: तरोताज़ा महसूस करते हुए इंटरव्यू पैनल की ओर मुख़ातिब हुई स्नेहा,‘‘इस पद के क़ाबिल बंदा, अब तक नहीं मिला. अब तो केवल कुछ ही कैंडिडेट्स बाक़ी हैं. चलो… अब उनको भी देख लेते हैं,’’ सभी सदस्यों ने इस बात से इत्तफ़ाक रखते हुए सहमति में सिर हिला दिया.
अगले उम्मीदवार राजीव शर्मा ने आते ही अपना परिचय दिया और अनायास जाने क्या हुआ, वो थोड़ा सहम गया. उसका गला सूखने लगा और उसने अनुमति लेकर टेबल पर रखा पानी का ग्लास उठाया और एक सांस में पूरा पानी पी गया. फिर ख़ुद को संभालते हुए साक्षात्कार की प्रक्रिया ठीक-ठाक पूरी कर दी उसने. असहज होने के बावजूद दूसरे सभी उम्मीदवारों की अपेक्षा उसने सवालों के जवाब सहजता से और सही दिए.
ये नौकरी बेहद ज़रूरी थी उसके लिए. माता-पिता, पत्नी और एक बच्ची की ज़िम्मेदारी उसी के कंधों पर थी. इन उत्तरदायित्वों के चलते, कुछ लापरवाहियां हुईं उससे और पिछली नौकरी से उसे हाथ धोना पड़ा. उसकी योग्यता के हिसाब से बेशक़ छोटी थी ये नौकरी, परंतु तय वेतन इतना तो था ही कि परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने में सक्षम था.
साक्षात्कार ख़त्म होने के बाद भी बदहवास और बेहद घबराया-सा था वो. जाने क्यों हाथ में आने से पहले ही जाती प्रतीत हुई उसे ये नौकरी. भारी क़दमों के साथ घर के लिए रवाना हुआ और अनमना-सा जाकर बैठ गया बस में. बस की खिड़की के पास सिर टिकाकर, सड़क ताकने लगा. मगर चित्त कहीं और भटक रहा था उसका. तभी बस चल पड़ी. उसे ऐसा लगा मानो लंबी-चौड़ी सड़कें, चारों दिशाएं सब अचानक उसके संग चलने लगी हैं. बस के बड़े-बड़े घूमते चक्कों के साथ, ख़ुद भी घूमता हुआ पहुंच गया अपने भुला चुके अतीत में.

नए साल का जश्न दोस्तों और अपनी मंगेतर के साथ मनाकर लौट रहा था वो. मंगेतर के लाख मना करने के बाद भी, दोस्तों के कहने में आकर, कुछ ज़्यादा ही पी ली थी उसने. पार्टी में सारे दोस्तों से एक सुर मे कहा,‘अरे यार, अब तो जल्द तेरी शादी हो जाएगी फिर तू भी और पतियों की तरह पत्नी के पल्लू से बंध जाएगा. दोस्तों के साथ आज तो अपनी होने वाली शादी और ख़त्म होने वाली आज़ादी को खुलकर सेलिब्रेट कर ले मेरे दोस्त!’’ उसके बाद तो राजीव ने मंगेतर की एक न सुनी.
नतीजा ये था कि अब तो ठीक से ड्राइव करने की हालत में भी न था. उसकी मंगेतर का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था. वो आकुल हो गई और उसने राजीव से कहा भी,‘राजीव तुम्हें दोस्तों के साथ ड्रिंक ही करना था तो मुझे साथ लाने के लिए मेरे घर पर सबको इतना मजबूर क्यों किया? वैसे ही बहुत देर हो रही है, पापा का फ़ोन भी आ चुका है कई बार, अगर इस हालत में तुम्हें देखा तो क्या सोचेंगे वे? तुम मेनगेट से ही वापस चले जाना,’ अभी ये कहते हुए उसने एक गहरी सांस ली ही थी कि उनकी बाइक सड़क के किनारे, रुके हुए एक ट्रक से जाकर ज़ोर से टकरा गई. कोहरे और धुंध में कुछ भी नहीं दिख रहा था. उसकी मंगेतर छटक कर सड़क के बीचों-बीच जा गिरी तभी पीछे से आ रहे ट्रक ने….
दोनों को गंभीर चोटें आई थीं. मजबूरी में उनकी शादी स्थगित करनी पड़ी थी फिर…
अकस्मात उसकी स्मृति की लड़ियां बस के ब्रेक से उत्पन्न झटके से टूट कर बिखर गईं.
‘क्या सच में वो स्नेहा ही थी?’ अपनी आंखों देखी पर भी यक़ीन करना मुश्क़िल हो रहा था उसे. लगभग छह-सात साल बाद आज उसने स्नेहा को देखा था. वह फिर से विचारों की कड़ियां पिरोने लगा,‘कोई इतना भी कैसे बदल सकता है? वो तो हमेशा सहमी-सी, सकुचाई-सी रहती थी.’
आज उसका एकदम अलग बिंदास और आत्मविश्वास से सराबोर रूप उसे हैरत में डाल रहा था. फिर कुछ स्मरण करते ही आश्चर्यचकित रह गया. ‘उस दुर्घटना के बाद तो वो अपना एक पैर भी गंवा चुकी थी…’ अचानक बस रुकी और वो दुखी मन से आगे का सफ़र पैदल तय करते हुए घर की ओर बढ़ चला.
इधर इतने सालों बाद, राजीव को सामने देखकर स्नेहा के दर्द भी हरे हो गए. मन की पीड़ा ज़्यादा ही असहनीय होती जा रही थी इसलिए वह घर वापस आ गई. एकांत पाकर जब वो बैठी तो ज़िंदगी की किताब के पन्ने एक-एक करके आंसुओं के साथ उसका दामन नम करते हुए खुलने लगे. उसे नए साल का वो मनहूस दिन बिसराए नहीं बिसरता है. तूफ़ान की तरह जो आया और अपने साथ सब बहाकर ले गया. जब थमा, सब कुछ बदल चुका था, यहां तक कि अपने लोग भी मुंह फेर चुके थे उससे. ज़िंदगी की कड़वी हक़ीक़त से सामना बहुत ही छोटी उम्र में हो गया उसका. ज़िंदगी ने सब कुछ छीन लिया. एक दिन में लोगों को बदलते देखा था उसने.
आज भी भलीभांति याद है उसे, हादसे के बाद उसकी भावी ससुरालवालों को उसकी लेशमात्र भी परवाह नहीं हुई थी. वहां से कोई भी उसका हालचाल पूछने न आया. वक़्त के साथ धीरे-धीरे राजीव स्वस्थ होने लगा और वह भी संभलने लगी. शुरू में राजीव का फ़ोन एकाध बार आया, मगर अब तो बहुत दिनों से उसकी भी कोई ख़बर नहीं मिली थी. स्नेहा के माता-पिता के मन मे बुरे-बुरे ख़्यालात पनपने लगे. उसकी मां ने पिता से चिंता व्यक्त की,‘अब हमें स्नेहा की शादी के लिए और इंतज़ार नहीं करना चाहिए, आप आज ही उसके भावी ससुराल जाकर दोनों की शादी की बात चलाएं.’
स्नेहा के पिता ने ससंशय दोनों के विवाह की बात राजीव के माता-पिता के समक्ष दुहराई. इस पर राजीव की माताजी भड़ककर बोलीं,‘आप ऐसा कैसे सोच सकते हैं? मैं अपने इकलौते बेटे की शादी आपकी अपाहिज…’
स्नेहा के पिता पर अपनी फूल-सी नाज़ुक बच्ची के लिए ‘अपाहिज’ शब्द के सम्बोधन से ही मानो वज्रपात हो गया. ख़ुद को संभालते हुए वे बोले,‘आप ऐसा न कहें, ये रिश्ता गर टूट गया तो स्नेहा, जिसने अब तक ख़ुद को किसी तरह बांधकर रखा है, पूरी तरह बिखर जाएगी.’
‘मुझे इससे क्या लेना-देना? आपकी बेटी है आप जानें. मेरे परिवार को इसमें न घसीटें. जब सगाई हुई थी हालात और थे. मैं उसे इस हाल में अपने घर की बहू हर्गिज़ नहीं बना सकती. अब तो आप उसकी शादी के लिए उसके ही जैसा अपाहिज लड़का ढूंढ़िए,’ बड़ी ही निर्दयता और निष्ठुरता के साथ वे बोलीं.
स्नेहा के पिता विनम्रतापूर्वक बोले,‘नए साल की रात, उस दुखद दुर्घटना में, जिसकी वजह से मेरी बेटी की ज़िंदगी में अंधेरा छा गया, आपके बेटे राजीव का ही हाथ था. अगर वो उस रात इतनी शराब न पीता… ये बात तो रिपोर्ट में भी सभी के सामने आ चुकी है.’
तिलमिलाते हुए राजीव की मां बोलीं,‘हां तो इसका मतलब ये तो नहीं है कि मैं अपने बेटे की इस छोटी-सी ग़लती को इतनी बड़ी सजा दे दूं कि उसे आपकी अपाहिज…’
‘बंद करिए… मेरी बेटी को यूं अपाहिज कहकर बुलाना,’ अचानक स्नेहा के पिता के लिए ये सब सह पाना असहनीय हो गया और वे बिफर पड़े,‘आप लोगों से इंसानियत की उम्मीद ही नहीं करनी चाहिए थी. आप तो इंसान कहलाने के लायक ही नहीं हैं, जो दूसरे इंसान की पीड़ा भी न समझे वो इंसान कैसा? कल शादी के बाद अगर मेरी बेटी के साथ ये दुर्घटना घटती, तब भी आप सब का रवैया ऐसा ही रहता. अपनो के ऐसे बर्ताव से और भी ज़्यादा टूटकर बिखर जाती तब मेरी बच्ची.’ स्नेहा के पिता पुरुष होते हुए भी अपनी वेदना छुपा न पाए और उनकी आंखें छलक पड़ीं. इसके बाद वे एक पल भी वहां नहीं रुके और घर वापस आ गए.
अपने पिता की सूजी, लाल हो चुकी आंखें और झुकी नज़रें देखकर ही स्नेहा समझ गई कि वहां क्या घटा होगा. उसने फिर कभी अपना दर्द अपने माता-पिता के आगे प्रकट नहीं होने दिया. उसे ख़ुद को बैसाखियों पर देखकर भी इतनी पीड़ा नहीं होती थी, जितनी अपने माता-पिता उदास चेहरा देखकर होती थी.
उसने एक रोज़ फ़ैसला लिया कि वो अपनी नीरस और दिशाहीन हो चुकी ज़िंदगी को नई दिशा देते हुए कुछ ऐसा करेगी, जिससे उसके माता-पिता का सिर समाज में गर्व से ऊंचा हो जाए. सबसे पहले उसने अपने लिए कृत्रिम पैर बनवाए, जिसकी मदद से वह काफ़ी हद तक अपने रोज़मर्रा के काम सुचारू रूप से करने लगी. फिर उसने रात-दिन एक करके पढ़ाई करते हुए एक प्रतिष्ठित संस्थान से एमबीए किया, इसके बाद एक कंपनी में अच्छे पद पर उसकी नौकरी लग गई.
उसने अभी भी अपना संघर्ष जारी रखा. परिश्रम और लगन के बल पर कुछ विभागीय प्रमोशन उसकी झोली में आते गए, फलस्वरूप एक दिन उसी कंपनी के एचआर विभाग में सीनियर एग्ज़ेक्यूटिव बन गई.

यहीं पर उसकी मुलाक़ात अपने सहकर्मी सुजीत सक्सेना से हुई. जो स्वभाव का बहुत ही सरल और शालीन था. सुजीत जीवन के प्रति स्नेहा के आशापूर्ण नज़रिए से बेहद प्रभावित था और मन ही मन उसे चाहने भी लगा. एक दिन उसने स्नेहा के सामने शादी का प्रस्ताव रखा. स्नेहा किसी की सहानुभूति नहीं लेना चाहती थी. उसने सुजीत से कहा,‘मैं अभी शादी के लिए ख़ुद को पूरी तरह तैयार नहीं पा रही हूं. मुझे थोड़ा वक़्त लगेगा.’
सुजीत ने मुस्कराकर कहा,‘तुम्हें जितना समय चाहिए, तुम ले सकती हो. मुझे तुम्हारी ‘हां’ का इंतज़ार रहेगा…’

‘‘क्या हुआ बेटा, आज जल्दी कैसे वापस आ गई?’’ स्नेहा के पापा ने कमरे की लाइट जलाते हुए पूछा,‘‘तेरे ड्राइवर ने बताया कि तेरी तबियत ठीक नहीं है,’’ वे बहुत चिंतित लग रहे थे.
सहसा स्नेहा अतीत के डरावने और भयानक पन्नों से निकलकर वर्तमान में आ गई.
‘‘कुछ ख़ास नहीं पापा… बस कुछ अच्छा नहीं लग रहा,’’ कहकर उसने पापा की गोद में अपना सर रख दिया. आंखों के कोनों से बहकर आंसू पापा को हथेली पर जो गिरे तो वे विचलित हो उठे,‘‘आज किस बात ने मेरे शेर की आंखों में आंसू ला दिए. ज़रूर किसी ने तुझे आहत किया है. मगर तू तो अब समझदार हो गई है न फिर…?’’
स्नेहा ने सुबह की इंटरव्यू वाली बात पापा को बताई.
सारी बात सुनने के बाद पापा ने परामर्श दिया,‘‘तुम्हें जो सही लगे वही करो. तुम अपना फ़र्ज़ निभाओ. अगर वो इस जॉब के क़ाबिल है तो उसे इस हिसाब से रिमार्क्स दो, नहीं है तो उस हिसाब से. तुम अपना काम करो, ऊपर वाले को अपना काम करने दो,’’ पापा के मशवरे ने उसे सही रास्ता दिखा दिया.
कुछ दिनों बाद राजीव के पास फ़ोन आया कि उस पद के लिए उसका चयन हो गया है. उसे इस बात पर यक़ीन करना मुश्क़िल हो रहा था. तयशुदा दिन वो ऑफ़िस पहुंचा. स्नेहा के चेंबर के बाहर अपॉइंटमेंट लेटर लेकर उससे मिलने का इंतज़ार करता रहा. कुछ समय व्यतीत होने के बाद स्नेहा ने उसे बुलाया.
‘‘मुझे माफ़ कर दो स्नेहा. मैं माफ़ी के लायक तो नहीं हूं और सच मानो तो तुम्हारा बड़प्पन देखकर आज ख़ुद को और भी नीचा महसूस कर रहा हूं…’’ उसकी आंखें नम हो आईं, स्नेहा से मिलते ही क्षमा याचना करते हुए वो बोला.
स्नेहा अवाक् उसे सुनती रही. शायद वो उससे कुछ कहना ही नहीं चाहती थी. वेदना और पीड़ा की विशाल चट्टान पर मूर्ति बनी बैठी थी वो.
‘‘तुम्हारे पिता ने सही कहा था. हमें तब तुम्हारा दर्द समझ नहीं आया, पर अब मैं ही नहीं मेरा पूरा परिवार तुम्हारा दर्द अच्छी तरह समझ सकता है, क्योंकि नियति की पाठशाला ने हमें जीवन का सही सबक सिखाया,’’ अचानक उसकी कुछ सूखी आंखों में आंसू फिर तैर गए, उसकी आवाज़ कांपने लगी,‘‘तुम्हारे साथ हुए हादसे के लगभग दो वर्ष बाद ही मेरी शादीशुदा बहन की कार का एक्सीडेंट हो गया जिसमें उसके पति की मृत्यु हो गई और उसको भी अपना दाहिना हाथ गंवाना पड़ा. तब मां को आभास हुआ कि शायद अब उनकी आपाहिज हो चुकी बेटी की ज़िंदगी पूरी तरह तबाह हो चुकी है.’’ वो कुछ रुककर ख़ुद को संभालते हुए आगे बोला,‘‘लेकिन मां की आशंका के विपरीत दीदी के ससुरालवालों ने उदारता की बड़ी मिसाल क़ायम की. उन लोगों ने मेरी विकलांग बहन और उनके बच्चों को इस दुख की बेला में, अपनी पीड़ा बिसराकर न केवल सहारा दिया, बल्कि बेटी की तरह उनकी देखभाल भी की. आज वे पूरे सम्मान के साथ अपनी ससुराल में रह रही हैं. आज मां ही नहीं, हम सब अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हैं…कई बार सोचा भी मैंने कि तुम्हें इस बारे में बताऊं. तुमसे मिलकर माफ़ी मांगू, पर हिम्मत नहीं जुटा सका…’’ उसकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बेझिझक छलक पड़े, जिन्हें वो बहुत देर से रोकने की कोशिश कर रहा था.
ऊपर से सख़्त और अंदर ही अंदर दर्द और भावनाओं का समंदर समेटे हुए वो राजीव को आश्वस्त करते हुए बोली,‘‘आपको नौकरी, आपकी योग्यता की वजह से मिली है मिस्टर राजीव. आप अपना काम संभालिए और ज़रूरी फ़ॉर्मैलिटीज़ पूरी कीजिए.’’
राजीव को यूं लगा मानो कोई आराध्य मूर्ति वर्षों बाद एकाएक बोल पड़ी हो. ‘‘थैंक्यू मैडम,’’ कहकर राजीव बाहर चला गया.
आज राजीव को इस हाल में देखकर उसे इस बात की तसल्ली हुई कि कम से कम उसे अपने किए पर पछतावा तो हुआ. उसने किसी इंसान का दुख देर से ही सही, आख़िर समझा तो… यही क्या कम है? अन्यथा लोग ग़लतियां करने के बावजूद जीवनभर ये ही नहीं समझ पाते कि उन्होंने ग़लती की है. आज बरसों का ग़ुबार, तिरस्कार की पीड़ा और क्रोध की अग्नि सब शांत हो गई स्नेहा की. एक ओजस्वी मूर्ति ने बिना किसी आहट के एक निर्मल स्त्री का रूप धर लिया. तभी सुजीत ने उसके चेंबर में प्रवेश किया. अपने चेहरे की संतोषप्रदता, सौम्यता और मनोरमता के साथ आज उसने सुजीत से ये कह ही दिया,‘‘सुजीत, अब मैं शादी के लिए तैयार हूं.’’

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Post source : femina

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