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जानिए…. कौन है दादा साहेब फाल्के…

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बॉलीवुड में फिल्मों की शुरुआत करने वाले दादा साहब की आज 148वीं बर्थ एनिवर्सरी है। दादा साहब ने न केवल फिल्म इंडस्ट्री की नींव रखी बल्कि बॉलीवुड को पहली हिंदी फिल्म भी दी जिसे लोग आज भी याद करते है। 19 साल के फिल्मी सफर में दादा साहब फाल्के ने 121 फिल्में बनाई जिसमें 26 शॉर्ट फिल्में शामिल हैं। दादा साहब फाल्के की जिंदगी से जुड़ी कुछ खास बाते बताते हैं।

आईए जानें  दादा साहब फाल्के के बारें में … दादा साहेब फाल्के ने रच दिया था इतिहास

दादा साहेब फाल्के का असली नाम धुंधिराज गोविन्द फाल्के था। इनका जन्म महाराष्ट के नासिक में 30 अप्रैल 1870 को हुआ था। दादा साहेब फाल्के के जन्मदिन के अवसर पर ही  भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में ‘लाइफ टाईम अचीवमेंट अवार्ड’ के रुप में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार दिया जाता है। दादा साहेब फाल्के पुरस्कार, भारत सरकार की ओर से दिया जाने वाला एक वार्षिक पुरस्कार है, जो कि किसी व्यक्ति विशेष को भारतीय सिनेमा में उसके आजीवन योगदान के लिए दिया जाता है।




इस पुरस्कार शुरुआत वर्ष 1969 से हुआ। ‘लाइफ टाईम अचीवमेंट अवार्ड’ के रूप में दिया जानें वाले इस पुरस्कार को प्रतिष्ठित व्यक्तियों की एक समिति ‘दादा साहेब फाल्के अकादमी’ की सिफारिशों पर यह पुरस्कार प्रदान किया जाता है।

बता दें कि साल 1969 में भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्री देविका रानी को पहला दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया था। पहले यह पुरुस्कार साल के अंत में दिया जाता था. सिनेमा जगत के इस प्रतिष्ठित पुरस्कार में अब भारत सरकार की ओर से दस लाख रुपये नकद, स्वर्ण कमल और शॉल प्रदान किया जाता है।




‘दादा साहेब फाल्के अकादमी’ के द्वारा भी दादा साहेब फाल्के के नाम पर तीन पुरस्कार भी दिए जाते हैं, जो हैं – फाल्के रत्न अवार्ड, फाल्के कल्पतरु अवार्ड और दादा साहेब फाल्के अकेडमी अवार्ड्स आखिरी दादा साहेब फाल्के पुरस्कार अभिनेता विनोद खन्ना को दिया है।

दादा साहब फाल्के का असल नाम धुंडीराज गोविंद फाल्के था। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत गोधरा में बातौर फोटोग्राफर की थी लेकिन पहली पत्नी और बच्चे के अचानक निधन के बाद उन्होंने इससे किनारा कर लिया। जिसके बाद उन्होंने भारत के पुरातत्व सर्वेश्रण विभाग में ड्राफ्टमैन के तौर पर काम किया।

दादा साहब फाल्के शुरुआत से ही अपने आप को किसी भी एक सीमा में बांध कर नहीं रखना चाहते थे। इसी वजह से पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग में काम के दौरान ही इन्होंने अपना प्रिंटिंग प्रेस का बिजनेस शुरू कर दिया था। इसके बाद वह नई टेक्नोलॉजी सीखने के लिए जर्मनी भी गए।




दादा साहब फाल्के हमेशा ही कुछ नया करने की चाहत रखते थे। उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट ‘द लाइफ ऑफ क्रिस्ट’ फिल्म साबित हुई। यह एक मूक फिल्म थी। इस फिल्म को देखने के बाद दादा साहब के मन में कई तरह के विचार तैरने लगे तभी उन्होंने अपनी पत्नी से कुछ पैसे उधार लिए और पहली मूक फिल्म बनाई।

इसके बाद साल 1913 में दादा साहब फाल्के ने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की नींव रखी जिसकी वजह से लोग उन्हें इंडस्ट्री का जनक कहने लगे। 1913 में पहली मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ रिलीज हुई। यह पहली फिल्म थी जिसे पब्लिक के लिए कोरोनेशन सिनेमा में 3 मई 1913 को मुंबई में पहला शो रखा गया था।




इस फिल्म से जुड़ी एक रोचक बात भी है। कहा जाता है कि ‘राजा हरिश्चन्द्र’ में तारामती का किरदार निभाने के लिए दादा साहब फाल्के कोई भी एक्ट्रेस नहीं मिल रही थी। यहां तक कि एक्ट्रेस की तलाश करते हुए दादा साहब रेड लाइट एरिया तक भी पहुंच गए थे। जब वहां की लड़कियों से उन्होंने बात की और फीस बताई तो लड़कियों ने कहा था कि वह इतना पैसा तो एक रात में ही कमा लेती हैं। हालांकि उनकी तलाश एक होटल में पूरी हुई। जब वह चाय पी रहे थे तभी उनकी नजर एक लड़की पर पड़ी और उन्होंने उसे तारामती के रोल के लिए कास्ट कर लिया। इस फिल्म का कुल बजट 15 हजार था।




‘राजा हरिश्चन्द्र’ की सफलता के बाद दादा साहब फाल्के ने कई सारी फिल्में बनाई जिसमें सत्यवान सावित्री, मोहिनी भस्मासुर, लंका दहन, कलियामदन शामिल हैं। इसके साथ ही दादा साहब ने अपनी एक फिल्म कंपनी की खोली जिसका नाम ‘हिंदुस्तान फिल्म्स’ था। इस कंपनी में 5 लोगों की साझेदारी थी। हालांकि कुछ समय बाद इन्होंने इस कंपनी से किनारा कर लिया।

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