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किसी भी सूरत में विध्वंसकारी प्रोजेक्ट को क्रियान्वित नहीं होने देंगेः मैड

किसी भी सूरत में विध्वंसकारी प्रोजेक्ट को क्रियान्वित नहीं होने देंगेः मैड
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थानो स्थित जंगल के कटान का विरोध करते हुए, देहरादून के शिक्षक छात्रों के संगठन, मेकिंग अ डिफरेंस बाय बीइंग द डिफरेंस (मैड) द्वारा एक प्रेस वार्ता आयोजित की गई, जिसमें हवाई अड्डे के विस्तार हेतु जिस सुनियोजित साजिश के तहत देहरादून के आसपास के क्षेत्रों के बचे-कुचे जंगलों को खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है, इसका तथ्यों के साथ पुरजोर विरोध किया गया। छात्रों ने स्पष्ट किया कि वह किसी भी सूरत में ऐसे विध्वंसकारी प्रोजेक्ट को क्रियान्वित नहीं होने देंगे।
उत्तराखंड वन विभाग एवं उत्तराखंड शासन पर सवाल खड़े करते हुए, मैड के पदाधिकारियों ने कहा कि 10,000 पेड़ों का कटान, वह भी ऐसे क्षेत्र में जो वन्य जीवन बाहुल्य है, जहां पग पग पर हिरण दिखता है, जहां बाघ भी आता जाता रहा है और जहां पर हाथी भी आ जाते हैं, और कई दुर्लभ पक्षी भी देखे जाते हैं, ऐसे क्षेत्र में ऐसे प्रोजेक्ट का आना बहुत निंदनीय कृत्य है।


मैड ने इस बात पर भी आश्चर्य प्रकट किया कि सरकार को हवाई अड्डे के विस्तार हेतु कहीं और जमीन नहीं मिली। मैड ने अवगत कराया कि वर्तमान में जौली ग्रांट एयरपोर्ट डोईवाला में स्थित है और सरकार चाहती तो निजी भूमि का क्रय कर सकती थी और हवाई अड्डे को वहां बना सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इस मुद्दे पर, मैड, की ओर से कई संस्थाओं के साथ वार्ता की जा चुकी है और प्रमुख वन संरक्षक, उत्तराखंड वन विभाग जयराज से वार्ता कर उन्हें भी ज्ञापन सौंपा गया हैं।


मैड की ओर से इस पर भी ध्यान आकर्षित किया गया कि जो इस योजना को पर्यावरण पर प्रभाव के नजरिए से अध्ययन कर रही कंपनी है, ग्रीनसी इंडिया कंसलटिंग प्राइवेट लिमिटेड, गाजियाबाद, उसकी ओर से एक बेहद झूठी रिपोर्ट तैयार की गई है जिसमें कहां गया है कि जिस जगह पर यह विध्वंसकारी योजना लाई जा रही है, वहां ना कोई घना जंगल है और न ही वहां पर शेड्यूल वन फौना हैं। शेड्यूल वन फौना वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 मे दिए प्रावधानों के अनुसार सुरक्षित है। ऐसा परिलक्षित होता है कि सरकार द्वारा उत्तराखंड के वनों का सुनियोजित साजिश के तहत विनाश किया जा रहा है। ऐसा करने से हाथियों की जो पौराणिक काल से एक पथ होता था जहां वो टनकपुर बॉर्डर से नेपाल तक चले जाते थे, उसमें और अवरोध पैदा हो जाएगा। पहाड़ों में चिकित्सा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से अलग हटकर, सरकार को अपनी मूर्खता के आयाम कम करने की कोशिश करनी चाहिए।



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