त्रियुगीनारायण मंदिर की पौराणिक कथा.. By Ranjana Rawat | Doonited.India

August 21, 2019

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त्रियुगीनारायण मंदिर की पौराणिक कथा.. By Ranjana Rawat

त्रियुगीनारायण मंदिर की पौराणिक कथा.. By Ranjana Rawat
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त्रियुगीनारायण मंदिर रुद्रप्रयाग, यही पर भगवान शिव व माता पार्वती का विवाह हुआ था


By Ranjana Rawat

श्री त्रियुगीनारायण मंदिर रुद्रप्रयाग, यही पर भगवान शिव व माता पार्वती का विवाह हुआ था |

अगर आप केदारनाथ जाने का मन बना रहे हैं तो इस मंदिर में भी अवस्य जाएं |

जिला रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड | गांव त्रिजुगीनारायण

हिन्दू पौराणिक कथा के अनुसार देवी सती ने माँ पार्वती के रूप में अपना दूसरा जन्म लिया था और भगवान शिव को पाने के लिए उन्होंने कठोर तपस्या की और उनकी इसी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव जी माँ पार्वती से विवाह के लिए तैयार हुए और त्रियुगीनारायण वही स्थान है , जहाँ भगवान शिव पार्वती का विवाह सभी देवताओं के समक्ष हुआ था इस विवाह में भगवान विष्णु जी विशेष रूप से माँ पार्वती के भाई बन के सम्मलित हुए और उसी विवाह की अग्नि आज भी ‘अखंड धूनी’ के रूप में विघमान है , जिसे स्वयं भगवान विष्णु ने प्रज्वलित किया था । इस कारण निरन्तर जल रही उस अग्नि के कारण ही यह स्थान “त्रियुगी नारायण” के नाम से जाना जाता है ।

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार इन्द्रासन पाने के लिए राजा बलि को 100 यज्ञ करने थे | उनमे से राजा ने 99 यज्ञ पुरे किये , तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि को रोक दिया , जिससे की राजा बाली का यज्ञ भंग हो गया , इसलिए विष्णु भगवान् को इस स्थान पर वामन देवता के रूप में पूजा जाता है |

गांव त्रिजुगीनारायण रुद्रप्रयाग में स्थित ‘त्रिजुगी नारायण’ एक पवित्र जगह है, माना जाता है कि सतयुग में जब भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया था तब यह ‘हिमवत’ की राजधानी थी। जिस हवन कुण्ड की अग्नि को साक्षी मानकर विवाह हुआ था वह अभी भी प्रज्वलित है।

भगवान विष्णु को समर्पित यह शानदार मंदिर, त्रिजुगीनरायण गांव में स्थित है, प्राचीन पगडण्डी मार्ग र घुटूर से होते हुए यह श्री केदारनाथ को जोड़ता है। इस मंदिर की वास्तुकला शैली केदारनाथ मंदिर के जैसी है जो इस गांव को एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थान का केंद्र बनाता हैं।एक पौराणिक कथा के अनुसार, त्रियुगिनरायण पौराणिक हिमवत की राजधानी थी और जहां भगवान शिव ने सतयुग में पार्वती से विवाह किया था।

इस दिव्य विवाह के लिए चार कोनो में विशाल हवन कुंड जलाया गया था। सभी ऋषियों ने विवाह की शादी में भाग लिया, जिसमें विष्णु भगवन द्वारा खुद समारोहों की देख रेख की गयी।माना जाता है कि दिव्य अग्नि के अवशेष आज भी हवन कुंड में जलते हैं। अग्नि में तीर्थयात्री लकड़ी डालते है यह कुंड तीन युग से यंहा पर है , इसलिए इसे त्रियुगीनारायण के नाम से जाना जाता है। इस आग की राख को विवाहित जीवन के लिए वरदान मन जाता है।इस गांव में तीन अन्य कुंड हैं, रुद्रकुंड, विष्णु कुंड और ब्रह्मकुंड। ये कुंड हैं जहां भगवान शिव-पार्वती विवाह के विवाह के दौरान भगवां स्नान किया करते थे । इन कुंडों का पानी सरस्वती कुंड से बहता है जो कि विष्णु के नाभि से उगता है। यहां पर बच्चों की चाह रखने वाली महिलाएं स्नान करती है विश्वास है कि इससे उनका बांझपन दूर हो जाता है ।

आज भी वहां उस विवाहवेदी की धुनि जलती हुयी दिखाई जाती है।

त्रियुगीनारायण मंदिर में एक ऐसा हवन कुंड हैं , जो आज भी प्रज्ज्वलित रहता है । इसमें प्रसाद के रूप में लकड़ियां चढाई जाती है और लोग इस हवन कुंड की राख लेकर घर जाते हैं । इस हवन कुंड के बारे में यह माना जाता है कि इसी हवन कुंड में शिव पार्वती ने सात फेरे लिए थे । मंदिर के निकट पर एक ब्रह्मकुंड हैं और इस ब्रह्मकुंड के बारे में यह मान्यता है कि जब ब्रह्मा जी भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह कराने के लिए आए थे , तो उस समय उन्होंने इसी कुंड (ब्रह्मकुंड) में सबसे पहले स्नान किया था । इसके बाद ही ब्रह्मा जी ने भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह कराया था । वर्तमान समय में इस स्थान पर आने वाले लोग इस “ब्रह्मकुंड” को पवित्र मानकर इसमें स्नान करते हैं और ब्रह्म जी से आशीर्वाद लेते हैं ।

विष्णुकुंड – भगवान विष्णु ने भगवान शिव और देवी पार्वती के विवाह में विशेष भूमिका यानी कि देवी पार्वती के भाई की भूमिका निभाई थी । ऐसे में विष्णु जी ने विवाह से पहले जिस कुंड में स्नान किया था । वह कुंड वर्तमान में “विष्णु कुंड” के नाम से जाना जाता है । इसके अलावा विवाह में शामिल होने से पहले सभी देवी-देवताओं ने जिस कुंड में स्नान किया , उसे “रुद्र कुंड” के नाम से जाना गया। इसके अलावा यहां पर एक स्तंभ बना है। कहते हैं कि इस स्तंभ में विवाह में शिव जी को एक जो गाय मिली थी। उसे इसी जगह पर बांधा गया था।

तीनो कुंडो में जल सरस्वती कुंड से आता है | सरस्वती कुंड का निर्माण भगवान् विष्णु की नाबी से हुआ था इसलिए ऐसी मान्यता है कि इन कुंडो में स्नान करने से संतानहीनता से मुक्ति मिल जाती है , एवम् जो भी श्रद्धालु इस पवित्र स्थल की यात्रा करते है ,वे अपने साथ अखंड ज्योति की विभूति भी ले जाते है , ताकि उनका वैवाहिक जीवन भगवान शिव और देवी पारवती के आशीर्वाद से मंगलमय बना रहे|

मंदिर का नाम तीन शब्दों यथाः त्रि यांनी तिन , युग यानी सत युग , त्रेता व द्वापर , नारायण विष्णु का ही एक नाम इस तरह त्रियुगी नारायण नाम पड़ता है। इसी पवित्र स्थान के आस-पास ही विष्णु मंदिर भी है।

कैसे पहुंचे त्रियुगी नारायणः मंदिर : 

वैसे तो इस मंदिर में जाने के लिए बहुत रास्ते आपको मिल जाएंगे। परंतु गौरीकुंड जाने के लिए आपको दो ही मार्ग मिलेगे। जब आप गौरीकुंड से 6 किलोमीटर दूर गुप्तकाशी की तरफ जाएंगे तो वहां सोनप्रयाग आता है।

यहां से भी आप त्रियुगी नारायण मंदिर जा सकते हैं वहां से आपको त्रियुगी मंदिर 12 से 13 किलोमीटर दूर पड़ेगा। अगर आप यहां से नहीं जाना चाहते हैं तो एक और रास्ता है जो कि पैदल जाता है।

इस मंदिर की वास्तुशिल्प शैली भी केदारनाथ मंदिर की ही तरह है। इस जगह के भ्रमण के दौरान पर्यटक रुद्र कुण्ड, विष्णु कुण्ड और ब्रह्म कुण्ड भी देख सकते हैं। इन तीनों कुण्डों का मुख्य स्त्रोत ‘सरस्वती कुण्ड’ है। मान्यताओं के अनुसार, इस कुण्ड का पानी भगवान विष्णु की नाभि से निकला है। और अगर आप किसी धार्मिक स्थल पर विवाह बंधन में बंधना चाहते हैं तो त्रियुगीनारायण मंदिर से अच्छा विकल्प और क्या हो सकता जहां पर स्वयं भगवान शिव व माता पार्वती का विवाह बंधन में बंधे थे। जहां पर विवाह बंधन में बंधने से आपको त्रियुगीनारायण भगवान के साथ-साथ पर्वतराज हिमालय व केदार बाबा का आशीर्वाद भी मिलता है जिससे वैवाहिक जीवन सुखमयी व समृद्ध हो जाता है।


विवाह से संबंधित सारे इंतजाम जैसे रहना, खाना-पीना, वेडिंग डेकोरेशन, मंदिर डेकोरेशन, ढोल-दमाऊ, पारंपरिक भेष-भूषा में सजी पारंपरिक मांगल गाने वाली महिलाएं, महिला संगीत टीम, मेकअप व मेंहदी आर्टिस्ट इत्यादि की सुविधा हमारे माध्यम से दी जाती है।

इस स्थान पर डेस्टीनेशन वेडिंग हेतु आप हमें इस नंबर पर संपर्क भी कर सकते हैं +91 97614 33065 भगवान त्रियुगीनारायण आप सभी की मनोकामनाएं पूरी करे।

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Post source : Ranjana Rawat

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