टार्गेट By निर्मल गुप्ता  | Doonited.India

February 18, 2019

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टार्गेट By निर्मल गुप्ता 

टार्गेट By निर्मल गुप्ता 
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महीने का आज आख़िरी दिन है. सारे मार्केट टार्गेट पूरे हो चुके हैं. बॉस के क्लीन शेव्ड चेहरे पर टिके गालों पर दो अर्धचंद्राकार रेखाएं उभर आई हैं. रीना के माथे पर दिनभर बनी रहने वाली दरारें गायब हैं. वह सुकून अनुभव करना चाह रही है. उसकी नौकरी एक और माह के लिए लगभग पक्की हो गई लग रही है. मार्केटिंग से जुड़े लोगों की ज़िंदगी इसी तरह टार्गेट अचीव कर पाने, न कर पाने की जद्दोजेहद में गुज़रती है.
कॉफ़ी के दो कप बॉस की मेज पर आ चुके हैं और दो प्लेटों में कुछ आलू चिप्स और सैंडविच. वह उससे पूछ रहा है. नहीं, नहीं पूछ नहीं बस कह रहा है,‘‘सो…?’’
वह समझ नहीं पा रही कि इस सो के जवाब में क्या कहे.
‘‘सो…?’’ बॉस ने फिर कहा. अबकी बार यह सवाल की शक्ल में है.
‘‘वी गॉट इट… अल्टिमेटली,’’ उसने कहा.
‘‘या… अल्टिमेटली…’’ बॉस का अंदाज़ बेहद शातिराना है.
इसके बाद उसने कॉफ़ी का प्याला उठा लिया. रीना ने भी कप उठाया और तुरंत सिप किया. उसे उम्मीद है कि कैफ़ीन अपना काम करेगी और देह में ठहरी थकान को घटा देगी.
बॉस ने कॉफ़ी का प्याला बिना सिप किए फिर मेज पर रख दिया और टिशु पेपर में रैप सैंडविच को उठाकर कुतरने लगा.
‘‘हैव इट,’’ बॉस ने प्लेट रीना की ओर सरकाते हुए कहा. उसकी आवाज़ में हुक़्म जैसा कुछ है.
उसने एक सैंडविच उठा लिया. उसने उसे कोने से कुतरना चाहा पर मुलायम सैंडविच का बड़ा बाइट मुंह में चला गया.
इन बॉस लोगों को सॉफ़्ट चीज़ें ही क्यों भाती हैं? उसने यह बात कही नहीं. यह उसके ज़हन में आई तो मुस्कान की एक पतली लकीर उसके होंठों पर आ गई. बॉस ने उसकी ओर देखा तो उसने हड़बड़ाकर मुस्कान की लकीर को होंठों पर लगे डार्क शेड के लिपग्लॉस के पीछे छुपा दिया.
वह घर लौट कर अपने रूममेट से आज फिर ज़रूर पूछेगी,‘‘यार बॉस लोग सॉफ़्ट माल ही क्यों खाते हैं?’’
‘उनके दांत इस लायक होते ही नहीं कि सख़्त चीज़ों को चबा सकें,’ उसे पता है कि रूममेट यही कहेगी.
वह चुपचाप कॉफ़ी सिप करती रही. वह सोचती रही कि काश कुरकुरी आलू की भुजिया होती तो वह सैंडविच की परत खोलती उस पर भुजिया डालती. ऊपर से नींबू के रस की कुछ बूंदें डालती. यदि संभव होता तो थोड़ा ब्लैक पेपर छिड़क लेती. फिर चटखारे लेकर उसका मज़ा लेती… सीसी… सीसी… करती हुई.
उसके मुंह से शायद सीसी टाइप कोई आवाज़ बाहर आई. बॉस ने उसे घूरा तो उसने उस मुस्कान को वापस समेटा, जो लिपग्लॉस की ओट से बाहर आने ही वाली थी.
‘‘सो?’’ बॉस ने उससे कहा.
उसने सवालिया निशान अपनी आंखों पर टिकाते हुए अपनी कलाई में बंधी घड़ी को निहारा. उसका अनुमान था कि बॉस
के चैम्बर के बाहर अंधेरा घिरना शुरू हो चुका होगा.
बॉस ने कहा,‘‘वेल डन रीना. कीप इट अप!’’
वह जानती थी कि बॉस आज भी वो नहीं कह पाया जो वह कहना चाह रहा था.
‘‘थैंक्यू सर!’’ उसने कहा और वह मुस्कुराते हुए बाहर आ गई.
ऑफ़िस का समय ख़त्म हो चुका था. वह अपनी मेज के क़रीब आई. उसने अपना कम्प्यूटर ऑफ़ किया. पर्स उठाया. उसमें से छोटा-सा मिरर निकालकर ख़ुद को निहारा. फिर वाटर कूलर के पास जाकर एक घूंट पानी पिया. सिर उठाकर आसमान को देखना चाहा तो उसे पता लगा कि जहां आकाश को वह ढूंढ़ रही है, वहां तो फ़ॉल्स रूफ़ है. आसमान तो ऑफ़िस के बाहर है. लेकिन वह जब तक बाहर निकल पाती है, तब अमूमन अंधेरा उसकी थाह नहीं पाने देता. वीकएंड पर ही वह अपने हिस्से के आसमान को जीभर के देख पाती है.
वह तेज़ क़दमों से ऑफ़िस से बाहर निकलने लगी तो उसे लग रहा था कि बॉस की एक जोड़ी भूरी आंखें उसका पीछा कर रही हैं.
‘सो?’ उसने ख़ुद से पूछा.
इसके जवाब में चौड़ी सी मुस्कान उसके होंठों पर उभरी. इस बार उसने मुस्कान को अपने होंठों पर जीभर कर थिरकने दिया. टार्गेट पूरा हो गया है. उसके पास कम से कम आज तो मुस्कराने की मुक़म्मल वजह है.

पर्स में रखा फ़ोन थरथराया. वह समझ गई कि शाम के सात बज गए हैं. उसने फ़ोन हाथ में लिया तो स्क्रीन पर कोलकाता लिखा दिख रहा है और प्रोफ़ाइल फ़ोटो के तौर पर विक्टोरिया मेमोरियल चमक रहा है. यह अभिजीत है.
उसने कहा,‘‘नमस्कार कोलकाता. दिस इज रीना रिपोर्टिंग फ्रॉम एनडी.’’
‘‘सो यू अचीव्ड योर टार्गेट?’’ उधर से आवाज़ आई.
‘‘तुमने कैसे जाना?’’ उसने पूछा.
‘‘तुम्हारी आवाज़ में क़ामयाबी का खरगोश फुदकता दिखा.’’
‘‘दिखा या सुनाई दिया?’’
‘‘तुम्हारी आवाज़ मुझे दिख जाती है.’’
‘‘पर मैं तो नहीं देख पा रही तुम्हारा कहा.’’
‘‘अंडर अचीवर्स को भी कोई देखता है भला?’’ अभिजीत की आवाज़ में उदासी है.
‘‘क्या हुआ… हुआ…?’’ उसका सवाल अनुगूंज करने लगा.
‘‘नाइंटी पर्सेंट ही अचीव कर पाया.’’
‘‘अब?’’ सवाल में आशंका है.
‘‘अब क्या? बॉस ने कह दिया है कुछ करो वरना मुझसे मत कहना.’’
‘‘ओह!’’ वह बुझ गई.
अभिजीत उसके बचपन का दोस्त है. दोनों लगभग एक जैसे हालात् में पले-बढ़े. एक बिज़नेस स्कूल में पढ़कर मैनेजमेंट में डिग्री ली. साथ-साथ ख़ूब घूमे फिरे. लड़े-झगड़े और फुसफुसाते हुए देर रात तक बातें भी कीं. सपनों की बातें. ख़ूब पैसा कमाने की बातें. देश दुनिया की बातें. एक बार जब यह लगा कि उनके बीच प्यार है तो उसे मानने और कहने में देर न की. फिर कैम्पस सलेक्शन के ज़रिए नौकरी मिली तो दोनों अलग-अलग हो गए. अभिजीत कोलकाता से उसे हर छोटी-बड़ी ख़ुशी पर सॉन्देस की मौखिक सौगात भेजने लगा और रीना दैहिक स्पर्श को शाब्दिक लिबास में भेजने की कोशिश करती रही.
दोनों अपनी-अपनी नौकरी में अपने लिए स्थाई मुक़ाम खोजने की पुरज़ोर मशक्कत करते रहे. रीना महीने दर महीने अपने टार्गेट को प्राप्त करती रही. वहीं अभिजीत पूरी ताक़त झोंक देने के बावजूद अपने लक्ष्य के कभी क़रीब तो कभी दूर होता रहा. बाज़ार और बॉस उसे लगातार झटके पर झटके देते रहे.
उन दोनों को यक़ीन है कि वे एक दूसरे के लिए बने हैं. लेकिन अभिजीत को लगता कि वह करियर की दौड़ में रीना से पिछड़ता जा रहा है.
‘‘और बताओ तुम्हारे बॉस ने क्या कहा तुमसे?’’ लगभग तीन घंटे के अंतराल के बाद कोलकाता का फ़ोन आया तो उसने बातचीत का सिरा वहीं से पकड़ा जब ‘ओह!’ के साथ फ़ोन डिस्कनेक्ट हुआ था.
मेरे बॉस ने कहा,‘‘सो…?’’
‘‘मतलब…?’’
‘‘कहा तो इतना ही. और हां, कॉफ़ी और सैंडविच ऑफ़र किए. और हां… यह भी कहा-वेलडन कीप इट अप! ये साले बॉस… स्कूली भाषा से ही चिपके रहते हैं,’’ यह कहकर उसने बॉस के लिए मोटी-सी गाली दी और ठठाकर हंस दी.
दूसरी ओर से कुछ नहीं कहा गया लेकिन उसे अभिषेक की सांस की आवाज़ साफ़ सुनाई दी.
‘‘यार इन बॉस लोगों के सैंडविच उनकी ही तरह कितने पिलपिले होते हैं. नहीं?’’ उसने वातावरण को हल्का करना चाहा.
‘‘पिलपिले नहीं सॉफ़्ट. इनको हमेशा सॉफ़्ट टार्गेट मिल ही जाते हैं,’’ उसका स्वर सपाट है.
‘‘साफ़्ट टार्गेट? हू इज़ सॉफ़्ट टार्गेट? मी?’’ वह तल्ख़ हो उठी.
रीना उस रात ठीक से सो नहीं पाई. वह सोचती रही कि अभिजीत ने उसे सॉफ़्ट टार्गेट क्यों कहा? वह कोई ऐसी-वैसी लड़की नहीं. उसे यह टैग किसी हालत में मंज़ूर नहीं. पर वह जितना अधिक सोचती उसे लगता कि वह जो कह रहा था, वह भले ही पूरा सच न हो, पर कोरा झूठ भी तो नहीं है. सच के आसपास जैसा कुछ है. उसके मन में रातों रात नुकीले सवालों के कैक्टस उग आए.
यह सही है कि उसे सॉफ़्टनेस क़तई पसंद नहीं. उसे तो पुरलुत्फ़ ज़िंदगी के लिए तेज़-तीखा कुरकुरा स्वाद ही भाता है. लेकिन जो हालात् हैं वह उसकी पर्सनैलिटी को धीरे-धीरे सॉफ़्ट और माइल्ड बनाते जा रहे हैं.
‘‘यू हैव ए शाइनिंग फ़्यूचर अहेड,’’ एक बार बॉस मार्केटिंग एग्ज़ेक्यूटिव्स की मीटिंग में सबके सामने कहा था. उसने बेहद सधी हुई शब्दावली में वाक्य दर वाक्य जो कहा था उसका सार यही था कि अपनी कम्यूनिकेशन स्किल्स और फ़ेमिनिन चार्म का सही और भरपूर इस्तेमाल करो और आगे बढ़ जाओ. और आगे बढ़ना है तो या तो बाज़ार को अपना सॉफ़्ट टार्गेट बना लो वरना उसके साफ़्ट टॉय बन जाओ. चॉइस इज़ योर्स.
वह सोचती रही, सोचती ही गई, समय बीतता रहा. एक शाम जब फ़ोन थरथराया. उसने देखा फ़ोन पर कोलकाता है और नेपथ्य में वही विक्टोरिया मेमोरियल का अविचल चित्र. उसने फ़ोन ऑन किया और कहा,‘‘मुझे तेरे अलावा किसी का सॉफ़्ट टार्गेट बनना मंजूर नहीं. मैं तेरे पास आ रही हूं. हमेशा साथ रहने के लिए.’’
‘‘हैंग ऑन. हैंग ऑन. पहले मेरी सुनो…’’ वह कह रहा है,‘‘लिसन टू मी. मुझे यह पिलपिली भावुकता मंजूर नहीं. मुझे अड़ियल रीना पसंद है. उसका लड़ना झगड़ना स्वीकार है, लेकिन उसकी हताशा नहीं…नहीं… बिल्कुल नहीं रीना.’’
‘‘मेरी सुन अभिजीत आज सिर्फ़ मेरी सुन. मैंने ज़िंदगी में आज तक सारे हार्ड टार्गेट अचीव किए हैं. मैं सॉफ़्ट टार्गेट न कभी किसी के लिए थी, न बनूंगी. अभिजीत तुम मेरा टार्गेट नहीं मक़सद हो…’’ उसका स्वर भीगा हुआ है,‘‘मैं आ रही हूं. तुम सॉन्देस का इंतज़ाम करो. मैं आ रही हूं…’’
एनडी के दिल से निकली अनुगूंज को कोलकाता साफ़-साफ़ सुन पा रहा है.

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Post source : femina

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