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November 18, 2019

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अहम बातें

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अहम बातें
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सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने अपने निर्विवाद निर्णय में रामजन्‍म भूमि के मालिकाना हक का फैसला सुनाते समय कई ऐतिहासिक तथ्‍यों और धार्मिक मान्‍यताओं का उल्‍लेख किया है. कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान में हर मजहब के लोगों को बराबर का सम्मान दिया गया है. जानिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अहम बातें :

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने फैसले में कहा कि अधिकार सिर्फ आस्था से साबित नहीं होता है. 1856-57 तक विवादित स्थल पर नमाज पढ़ने के सबूत नहीं है. हिंदू इससे पहले अंदरूनी हिस्से में भी पूजा करते थे. हिंदू बाहर सदियों से पूजा करते रहे हैं. सुन्नी वक्फ बोर्ड को कहीं और 5 एकड़ की जमीन दी जाए.

कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार मंदिर निर्माण के लिए 3 महीने में ट्रस्ट बनाकर स्कीम बताए. इस ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को भी प्रतिनिधित्व मिलेगा. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आखिर में 2.77 एकड़ जमीन का मालिकाना हक रामलला विराजमान को दे दिया.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 16 दिसंबर 1949 तक नमाज पढ़ी गई थी. टाइटल सूट नंबर 4 (सुन्नी वक्फ बोर्ड) और 5 (रामलला विराजमान) में हमें संतुलन बनाना होगा. हाई कोर्ट ने जो तीन पक्ष माने थे, उसे दो हिस्सों में मानना होगा. कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट द्वारा जमीन को तीन हिस्सों में बांटना तार्किक नहीं था. इससे साफ हो गया कि मामले में अब रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड दो पक्ष ही रह गए.

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य पार्टी रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड को ही माना. सुन्नी पक्ष ने विवादित जगह को मस्जिद घोषित करने की मांग की थी. कोर्ट ने फैसले में कहा कि 1856-57 तक विवादित स्थल पर नमाज पढ़ने के सबूत नहीं है.

मुस्लिम पक्ष ने कहा था कि वहां लगातार नमाज पढ़ी जाती रही थी. कोर्ट ने कहा कि 1856 से पहले अंदरूनी हिस्से में हिंदू भी पूजा किया करते थे. रोकने पर बाहर चबूतरे पर पूजा करने लगे. अंग्रेजों ने दोनों हिस्से अलग रखने के लिए रेलिंग बनाई थी. फिर भी हिंदू मुख्य गुंबद के नीचे ही गर्भगृह मानते थे.

खाली जमीन पर नहीं बनी थी मस्जिद

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई से निकले सबूतों की अनदेखी नहीं कर सकते हैं. कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट का फैसला पूरी पारदर्शिता से हुआ है. बाबरी मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बनी थी. कोर्ट ने कहा कि मस्जिद के नीचे विशाल रचना थी. एएसआई ने 12वीं सदी का मंदिर बताया था.

कोर्ट ने कहा कि वहां से जो कलाकृतियां मिली थीं, वह इस्लामिक नहीं थीं. विवादित ढांचे में पुरानी संरचना की चीजें इस्तेमाल की गई थीं. गौरतलब है कि मुस्लिम पक्ष लगातार कह रहा था कि ASI की रिपोर्ट पर भरोसा नहीं करना चाहिए. कोर्ट ने फैसले में यह भी कहा कि नीचे संरचना मिलने से ही हिंदुओं के दावे को माना नहीं माना जा सकता.

कोर्ट ने कहा कि ASI नहीं बता पाया कि मस्जिद तोड़कर मंदिर बनी थी. हालांकि अयोध्या में राम के जन्मस्थान के दावे का किसी ने विरोध नहीं किया. विवादित जगह पर हिंदू पूजा किया करते थे. गवाहों के क्रॉस एग्जामिनेशन से हिंदू दावा गलत साबित नहीं हुआ. हिंदू मुख्य गुंबद को ही राम के जन्म का सही स्थान मनाते हैं. कोर्ट ने कहा कि रामलला ने ऐतिहासिक ग्रंथों के विवरण रखे. हिंदू परिक्रमा भी किया करते थे. चबूतरा, सीता रसोई, भंडारे से भी इस दावे की पुष्टि होती है. आपको बता दें कि ऐतिहासिक ग्रंथ में स्कंद पुराण का जिक्र किया गया था.

निर्मोही अखाड़े का दावा खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने फैसले की शुरुआत में ही हिंदू पक्ष निर्मोही अखाड़े के दावे को खारिज कर दिया. हाई कोर्ट ने इस पक्ष को एक तिहाई हिस्सा दिया था. रामलला को कोर्ट ने मुख्य पक्षकार माना. निर्मोही अखाड़ा सेवादार भी नहीं है. SC ने रामलला को कानूनी मान्यता दी.

सुप्रीम कोर्ट ने शिया वक्फ बोर्ड की अपील खारिज कर दी. उन्होंने कहा कि मस्जिद कब बनी, इससे फर्क नहीं पड़ता. 22-23 दिसंबर 1949 को मूर्ति रखी गई. उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति की आस्था दूसरे का अधिकार न छीने. नमाज पढ़ने की जगह को हम मस्जिद मानने से मना नहीं कर सकते हैं. जज ने कहा कि जगह सरकारी जमीन है.

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Post source : Agency

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