September 25, 2021

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संतला देवी मंदिर मान्यता

संतला देवी मंदिर मान्यता

 

 

मां संतला देवी मंदिर पूरे साल खुला रहता है। श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना करने के लिए कभी भी आ सकते हैं। लेकिन, खास बात ये है कि इस मंदिर में शनिवार और रविवार के दिन श्रद्धालुओं की काफी भीड़ उमड़ती है। माना जाता है कि शनिवार के दिन संतला देवी मंदिर के एक पत्थर की मूर्ति में परिवर्तित हो जाती है। 

 

इतिहास

पौराणिक कथाओं के अनुसार, 11वीं शताब्दी में नेपाल के राजा को पता चला कि उनकी पुत्री संतला देवी से एक मुगल सम्राट शादी करना चाहता है, तो तब संतला देवी नेपाल से पर्वतीय रास्तों से चलकर दून के पंजाबीवाला में एक पर्वत पर किला बनाकर निवास करने लगी। इस बात का पता चलने पर मुगलों ने किले पर हमला कर दिया। जब संतला देवी और उनके भाई को अहसास हुआ कि वह मुगलों से लड़ने में सक्षम नहीं है तो संतला देवी ने हथियार फेंककर, ईश्वर की प्रार्थना शुरू की। अचानक एक प्रकाश उन पर चमका और वे पत्थर की मूर्ति में तब्दील हो गईं। साथ ही किले पर आक्रमण करने आए सभी मुगल सैनिक उस चमक से अंधे हो गए। इसके बाद किले के स्थान पर मंदिर का निर्माण किया गया और तब से श्रद्धालु यहां पूजा करने आते हैं।

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इस तरह पहुंचे मंदिर

मां संतला देवी मंदिर आसानी से पहुंचा जा सकता है। यह मंदिर देहरादून से लगभग 15 किमी की दूरी पर स्थित है। घंटाघर से गढ़ीकैंट होते हुए जैतूनवाला तक जाने वाली बस सेवा का लाभ उठाकर यात्री मंदिर तक पहुंच सकते हैं। जैतूनवाला से पंजाबीवाला दो किलोमीटर दूर है। पंजाबीवाला से यात्रियों को मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब डेढ़ किमी की पैदल चढ़ाई चढऩी होती है।

 

 

महातम्य
माना जाता है 16वीं सदी में कुछ सैनिक यहां पूजा करने आते थे। उस समय एक अंग्रेजी अफसर के यहां कोई संतान नहीं थी। अपने सैनिकों से मंदिर के बारे में जानकारी के बाद उस अंग्रेज ने विधि विधान से मंदिर में पूजा की। इसके एक साल के भीतर वह एक बेटे के पिता बने। इसके बाद से मान्यता है कि यहां अधिकांश संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले लोग पूजा करने आते हैं।

 

संतला देवी मंदिर देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून जिले में स्थित एक प्राचीन एवम् लोकप्रिय मंदिर है , जो कि देहरादून से 15 कि.मी. की दुरी पर हरे घने जंगलो के बीच में सन्तौर नामक गढ़ में स्थित है | यह मंदिर भक्तो के लिए एक आस्था का केंद्र है जो कि देहरादून नगर में नूर नदी के ठीक ऊपर विराजित है | यह मंदिर देवी संतला और उनके भाई संतूर को समर्पित है | देहरादून में स्थित धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण संतला देवी मंदिर को अन्य नामों से भी बुलाया जाता है , जैसे कि ” संतौरा देवी मंदिर “और ” संतौला देवी मंदिर “ | संतला देवी मंदिर में विश्वास लोगों के प्रतीक के रूप में खड़ा है और मंदिर का एक महान सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है | मंदिर के बारे में यह कहा जाता है कि यदि कोई भक्त या श्रद्धालु सच्चे मन से मनोकामना करता है तो माँ संतला देवी उसकी मनोकामना को पूरी करती है | संतला देवी मंदिर कि यह मान्यता है कि यह मंदिर हज़ारो वर्ष पूर्व माता संतला व उनके भाई संतूर का निवास स्थान हुआ करता था |

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संतला देवी मंदिर के बारे में पौराणिक कथा के अनुसार , इस स्थान पर जब संतला देवी और उनके भाई को एहसास हुआ कि वे मुगलों से लड़ने में सक्षम नहीं हैं , तो उन्‍होंने हथियार फेंक दिये और प्रार्थना शुरू कर दी । अचानक एक प्रकाश उन दोनों पर चमका, और वे पत्थर की मूर्तियों में बदल गये । मंदिर में शनिवार को भक्तों का जमावड़ा लगता है, क्योंकि यह माना जाता है कि इन दिनों संतला देवी की मंदिर एक पत्थर की मूर्ति में परिवर्तित हो जाती है । इस घटना के बाद सन्तौर गढ़ (किले) में एक मंदिर खुद बन गया था |

 

वह दिन शनिवार का था जब देवी संतुला और उनका भाई पत्थर के रूप में बदल गए थे | हज़ारो की संख्या में भक्त संतला देवी मंदिर में संतला देवी और उनके भाई का आशीर्वाद लेने के लिए आते रहते है एवम् माता के इस मंदिर में हर शनिवार चमत्कार होता है | कहा जाता है कि शनिवार को मां की मूर्ति पत्थर में बदल जाती है |

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संतला देवी मंदिर तक पहुँचने के लिए जैतूनवाला तक जाने वाली बस सेवा का लाभ उठाकर यात्री मंदिर तक जा सकते हैं । वहां से पंजाबीवाला 2 किलोमीटर दूर है । पंजाबीवाला से यात्रियों को मंदिर तक पहुंचने के लिये करीब 2 की पैदल चढ़ाई चढ़नी होती है।

 

 

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