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सँपोला Written By Agrawal Shruti

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सँपोला © 

Written By Agrawal Shruti

रीता का मन आज सुबह से ही थोड़ा बुझा बुझा सा था। आज बिट्टी मायके आ रही है, और जो आ रही है तो डेढ दो महीने तो रहेंगी ही ! रीता जानती है कि यह समय उसपर कितना भारी पड़ने वाला है। जिंदगी वैसे भी कोई फूलों की सेज तो नहीं ही है… कि सुबह से रात, खटते ही बीतती है पर बिट्टी के आने पर तानों और व्यंग्य की जो बाढ़ आती है तो एक-एक दिन काटना भारी हो जाता है। फिर ससुराल लौटते समय अपने माँ बाप से बक्सा भर कपड़े गहने वसूलने के बावजूद रीता की साड़ियों में से भी अच्छी अच्छी चुन लेना वह नहीं भूलती हैं । आज अगर किसी बात पर खुश होकर भगवान उससे कुछ माँगने को कहे तो वह माँगेगी कि बिट्टी की ट्रेन का एक्सीडेंट हो जाय या उनकी ससुराल में कोई बीमार हो जाय….. या कुछ भी ऐसा हो जाय कि बस, उनके आने का कार्यक्रम किसी तरह टल जाय !

यूँ रीता तो हमेशा ऐसे ही सोचती रहती है पर ये चाहते पूरी कब होती हैं? आज तो ट्रेन तक लेट नहीं हुई कि दो-चार ही घंटों की मोहलत मिल जाती ! ठीक समय पर अरुण स्टेशन गये और उनको गाड़ी में बिठा कर ले आए । गाड़ी का हाॅर्न सुनते ही रीता की छाती का वो पुराना दर्द इतनी तेजी के साथ उठा था कि वो दोनों हाथों से सीना थाम, वहीं बैठी ही रह गई…. पर बाहर गहमा गहमी के स्वर तेज़ हुए जा रहे थे और वह जानती थी कि ऐसे बैठे रहने से तो काम नहीं चलेगा । फिर अरुण भी तो बिट्टी के साथ हैं और उनके सामने सबकुछ जितना सामान्य रह सके, उतना ही अच्छा ! सयत्न स्वयं को सँभाल, रीता भी बाहर निकल आई । नन्हें से एक माँसल पिंड को कपड़े से लपेट कर गोद में ले बिट्टी गाड़ी से उतरीं तो सासूजी ने हर्षातिरेक से दौड़ते हुए बेटी के हाथों से उसे लपक लिया। फिर सोते हुए बच्चे के घर के अंदर आते ही उस गोद में लेने के लिये मानो छीना झपटी ही मच गई ।

बच्चों जैसे उत्साह से उमगते हुए ससुर जी उसे अपनी गोद में ले लेना चाहते थे तो उधर अरुण उसे अपने पास लेने को बेचैन थे। रीता ने भी यथासंभव सबके उत्साह में सम्मिलित होने का प्रयास किया…. “हाय कितना पाला पाला बाबू है !”…. अरुण के हाथों से उसे लेते हुए वह बोली…. “छबछे पहले मामी छे दोछती, तब मामा छे…” मगर शिशु के रीता की गोद में जाते ही बिट्टी के चेहरे के भाव बिल्कुल बदल गए !

आगे बढकर उसे लगभग छीनते हुए तिक्त स्वर में बोली “रहने दो, उसे मैं ही रखती हूँ। “कैसा अपशकुन है, सबसे पहले बाँझ का ही साया पड़ गया !” पीछे से सास की आवाज़ आई तो बिट्टी ने हाँ में हाँ मिलाई “माँ थोड़ी नजर उतार दो इसकी, आज मंगल का दिन है, बुरी नजर का असर ज्यादा होता है। वैसे भी इसे इतनी जल्दी नजर लगती है कि क्या बताऊँ !” माँ होने का दर्प बिट्टी की आवाज़ में छलछला रहा था। रीता की आँखें भर आईं । यूँ पता तो था कि नागिन के दाँतों में जहर की पोटली है तो वो डसेगी ही, पर फिर भी मन बहुत उदास हो गया।



बिट्टी के आते ही सास के विषदंत भी नुकीले और आक्रामक हो उठते हैं फिर इस बार तो ये विष की एक और पिटारी साथ आई है जो रीता की सूनी कोख को और ज्यादा दुुखाएगी। जी चाहा, वह किसी समय रात के अँधेरे में चुपचाप इस सँपोले का गला दबा दे जो उसके जख्मों को हवा देने के लिये आया है । यहीं अभी उसने उत्साह से बढकर इसका स्वागत न किया होता तो यही लोग कहने वाली थीं कि वह जली जा रही है और जो उत्साह दिखाया तो ऐसा व्यवहार ? आँसू छिपाती रीता ने स्वयं को हमेशा की तरह रसोई की दीवारों के पीछे छिपा लिया । सीने में तेज दर्द था, आक्रोश से मन फटा जा रहा था, पर फिर भी वह मान अभिमान ले कर नहीं बैठ सकती । इतने लोगों का खाना पीना बनाना, सुबह के जूठे बर्तन समेटना और भी ढेर सारे कितने ही काम पड़े हुए थे…. जल्दी जल्दी नहीं निबटाया तो सैकड़ों बातें और सुननी पड़ेंगी। वैसे भी उसके जैसी तिरस्कृत चीज का कैसा मान अपमान ? घर में सबके लिये अब तक इस तरह की बातचीत मामूली बात हो चुकी है ….. पता नहीं वही क्यों इसे अपनी आदत नहीं बना सकी है, कि उसे तकलीफ़ भी होती है, गुस्सा भी आता है और बदला लेने की इच्छा भी होती है ।

जी चाहता है कि उसका अपना एक छोटा सा घर हो जहाँ इन स्वार्थी लोगों से दूर, वह केवल अपने अरुण के साथ रहे ।जिसकी छाया तक से परहेज है, उसका छुआ हुआ खाना कैसे खा लेते हैं ये लोग ? उस समय क्यों नहीं याद आता है कि वह गरीब घर की है या बाँझ है ? उसके धोए हुए कपड़ों से छूत नहीं लगती ? पैर दबवाते समय छाया नहीं पड़ेगी उसकी ? अभी ये गंदे और गलीज़ बिछावन उसे ही न धोने पड़ेंगे इस नागिन के बच्चे के, तब नजर नहीं खाएगी उसकी ? यदि उसे कभी कहीं से थोड़ा सा जहर मिल जाय तो इन सबके खाने में मिला दे वो, कि एकबारगी सास, ससुर, नन्द और इस सँपोले की लाश देख कर कलेजा ठंढा हो जाय उसका ! हाथ अकस्मात् कलेजे पर चला गया… फिर यहाँ पर दर्द हो रहा है। आजकल अक्सर ही होने लगता है।

जब भी गुस्से को पीने के प्रयत्न में घुटन महसूस होती है, ये और भी तीखा हो जाता है। जैसे कहीं कुछ अटक रहा हो या पत्थर की एक भारी सी शिला छाती के अंदर जम कर रह गई हो। दूसरों को कहाँ तक रोए, अपनी ही तकदीर पर मन कसैला सा हो गया जो पता नहीं कौन सी अपशकुनी स्याही से लिखी गई है कि बचपन बीता इतनी गरीबी में ! बाबूजी अकेले कमाने वाले और वो लोग थे आठ भाई बहन… भूख ….अभाव…. परेशानियाँ और छोटी छोटी चीजों या सुविधाओं के लिये कट्टर दुश्मनों की तरह लड़ते हुए उन बच्चों ने पहला सबक यही सीखा था कि कुछ पाने के लिये उसे छीनना पड़ता है। रीता उन सबसे कमजोर पड़ती, और मन भले आक्रोश से उबलता रहे पर मुँह से कुछ नहीं कह पाती थी। परिणाम स्वरूप पूरे बचपन, वह छोटी छोटी चीजों के लिये तरसती रह गई । सबसे छोटे भाई बहन भी उसकी चीजें छीन लेते और लंबी चौड़ी गृहस्थी सँभालने में परेशान, चिड़चिड़ाती हुई माँ, बिना कारण जाने, जो भी सामने पड़ जाता, उसे पीट देती । भाईयों की तो फिर भी थोड़ी इज्जत थी पर वे बहनें तो जैसे माता-पिता के किसी पाप का दंड थीं ।

मामूली शिक्षा के बाद स्कूल से निकाल ली गईं और काम काज गृहस्थी सिखाने के नाम पर बची खुची चीजों से पेट भर, फटा पुराना सिल कर, लगातार सबकी सेवा में लगे रहने के बावजूद सबसे ज्यादा उपेक्षित थीं । बड़की दीदी एक दूकान से साड़ियाँ लाकर उसमें फाॅल लगाती थीं, कमला जीजी ब्यूटी पार्लर में काम करने लगीं, यहाँ तक कि उससे छोटी मीता तक पड़ोस की एक अमीर औरत के पास, सेवा करने जाने लगी अतः सबके हाथ में अपने कुछ कुछ पैसे रहते। बस, रीता का हाथ ही हमेशा खाली रहा। पूरे घर का काम करके, छोटे भाई बहनों की कच कच सँभालने के बाद भी वह सदैव दूसरों की दया पर ही निर्भर रही। जिसका जब जी चाहता उसे डाँट देता, झिड़क देता और वो खून का घूँट पी कर रह जाती। सबसे ज्यादा नाराज़ तो वह स्वयं से ही थी कि क्यों वह किसी को जवाब नहीं दे पाती, क्यों किसी काम के लिये मना नहीं कर पाती कि छोटे छोटे बच्चे तक उसपर हाथ उठा लेते हैं, मज़ाक बनाते रहते हैं उसका और इतनी दब्बू है वह कि हर बात के लिये भगवान का ही मुँह देखती रह जाती है कि एक न एक दिन उनकी नजर उसपर ज़रूर पड़ेगी ।

फिर वह सपने देखने लगी थी कि एक दिन कोई राजकुमार उसे ब्याह कर ऐसे राजमहल में ले जायगा जहाँ भर पेट खाना और पहनने को नए कपड़े होंगें, वह सिंगार करके नौकरों पर हुक्म चलाएगी, सिनेमा देखेगी और सुख भोगेगी । और सचमुच, एक दिन भगवान ने उसपर भी नजर डाल ही ली । यूँ तो बड़की दीदी की शादी बड़े गरीब घर में हुई थी पर उसकी सुन्दरता ने उसके लिये एक ऐसे घर का इन्तजाम कर दिया जहाँ कार थी, रंगीन टेलीविजन और फ्रिज था… लगा किसी राजवंश में रिश्ता हो रहा है उसका ! घर में उसकी पूछ एकाएक बहुत बढ गई थी उन दिनों ….मन का आँगन इन्द्रधनुषी सपनों से जगमगा उठा था। रीता की सुन्दरता देख , लड़के वालों ने उसे पसंद तो जरूर कर लिया था पर पिता की माली हालत का अंदाज़ होने पर हिचकिचाहट भी थी ।

काफी सोंच-विचार कर उन्होंने यह शर्त रखी थी कि दहेज में कुछ भले मत देना पर बारातियों की खातिरदारी बढ़िया होनी चाहिये, आखिर समाज में इज़्ज़त का सवाल था। बाबूजी झट मान गये थे । कैसे नहीं मानते, इतना अच्छा संबंध छोड़ा तो नहीं जा सकता पर ये उन्हें अच्छे से पता था कि अच्छी खातिरदारी की सामर्थ्य नहीं थी उनकी ! जितना संभव था, बाजार से कर्ज़ वह पहली दो बेटियों की शादी में उठा चुके थे, और कोई दूसरा जरिया उनके पास था नहीं सो शादी में पहले शिकायतें हुईं फिर माहौल गर्माने लगा। उस गर्म माहौल में रीता विदा होकर जो ससुराल आई तो आजतक वो गर्मी घटी नहीं है। उसके बाद से आजतक मायके जाने की उसे इजाज़त तक नहीं मिली है। थोड़ी शीतलता अपने पति अरुण के पास आ कर जरूर मिलती है उसे, पर उनकी भी कितनी सी सामर्थ्य है? बाप के व्यापार में लगे हैं, उन्हीं के बनाए घर में रहते हैं, सो अपनी मर्जी से कुछ करने की आदत भी नहीं है।

उनके वश में यही है कि एकांत के दो चार पल जो रीता के साथ मिलें, उन्हें खूबसूरत बना लें। सुन्दरी बीबी का सान्निध्य तब ज्यादा सुखद लगता है जब वह हँसती खिलखिलाती रहे और रीता भी उन क्षणों का सर्वाधिक उपभोग करने के लिये अपने अंतर की कटुता को अरुण के सामने नहीं आने देना चाहती थी…. यूँ भी उसे अरुण के साथ समय ही कितना मिलता था ? ब्याह के बाद रीता जब इस घर में आई तो बिट्टी अभी कुमारी ही बैठी थीं हालाँकि अरुण से उम्र में पाँच छः बरस बड़ी रही होंगी। माँ बाप इतना खर्च करने को तैयार पर काला रंग, मोटे होंठ, बेडौल शरीर और कर्कश स्वभाव हर जगह रास्ते में आ जाते थे। स्वभाव यूँ तो पहले से ही तेज था, फिर शादी न हो पाने और बार बार लड़के वालों के सामने प्रदर्शित होकर ठुकराए जाने की कुंठा ने करेले को और भी नीम चढा दिया था । शायद इसीसे, बिना कुछ लिये दिये, केवल रूप के बल पर अरुण जैसा पति पा लेने की रीता की दक्षता पर तो वह जल भुन कर खाक ही हो गई थीं और अपने इन मनोभावों को कभी छिपा तक नहीं सकी थीं ।

ईर्ष्या दग्ध अवचेतन अपने अतिरिक्त और किसी की श्रेष्ठता या प्रशंसा बर्दाश्त नहीं कर पाता । यदि दूसरों में कोई दोष नहीं भी मिले तो उसकी कामना तो रहती ही है । मौका मिलते ही किसी छोटी सी गलती को बड़ा अपराध बना कर प्रस्तुत कर देने में क्या हर्ज है ? फिर रीता तो उन्हें अपनी कट्टर दुश्मन ही लगती थी । कभी कहतीं “समझ में नहीं आता इन भिंची भिंची आँखों और ऐसे लम्बोतरे चेहरे में अरुण को ऐसा क्या नजर आ गया जो जगहँसाई करा कर भी ब्याह लाया है”…. तो कभी कहतीं “क्रीम पाऊडर ज्यादा लगा लिया होगा वर्ना रंग ऐसा कुछ गोरा तो नहीं है ।” शादी की तीसरी रात, शर्माई सकुचाई रीता जो साज सिंगार कर के अरुण का इन्तज़ार कर रही थी तो अरुण से पहले बिट्टी ही कमरे में घुस आई और बोलने लगीं ” अब तुम तो केवल रुप पर ही इतराती बैठी रहो, उधर घर गृहस्थी में खटने के लिये माँ है ही। इतने रईस खानदान से तो आई नहीं हो जो नौ बजते बजते ही सो जाने की आदत हो ।” घड़ी तो साढे दस बजा रही थी। अचकचा कर रीता कमरे से बाहर निकल आई और कुछ नहीं सूझा तो सासूजी के पैर ही दबाने बैठ गई।

उधर बिट्टी को जब किसी ने कभी नहीं रोका तो धीरे धीरे उनकी जुबान और भी खुलती चली गई। और यहाँ भी उसी तरह घुट घुट कर जीने व सबकुछ चुपचाप बर्दाश्त करने की मजबूरी में, वह आक्रोश जो बचपन से ही रीता के अंदर में उमड़ता रहता था, अब और भी सघन होता जा रहा था । बड़े घर में शादी हुई थी उसकी तो परंपरानुसार हनीमून मनाने भी गई थी वह ! ठंढे पहाड़, सुन्दर झरने बगीचे और एक मुग्ध प्रेमी जैसे पति का साथ, यह सुख तो मानो कल्पनातीत था उसके लिये। एक सप्ताह जिंदगी मानो सपनों के हिंडोले पर झूलती रही थी मगर सुख शायद उसके लिये बने ही नहीं थे तभी तो फिसल कर गिरी भी वही, पेट में भयंकर दर्द हुआ और रक्त के सैलाब में बेहोश हो गई। फिर हनीमून की बाकी अवधि अस्पताल में कटी थी। ठीक तो हो गई पर डाॅक्टर ने कहा अब माँ बनने में मुश्किल आ सकती है। उस दिन पहली बार रीता को पता चला था कि अरुण उसे प्यार तो बहुत करते हैं पर अपने घर वालों से कितना डरते हैं जब उन्होंने उसे समझाया था “घर में किसी को मत बताना कि तुम माँ नहीं बन सकतीं। माँ मेरी शादी कहीं और कराए बिना मानेगी नहीं और मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।” रीता को आश्चर्य हुआ था ” आप मना नहीं कर सकते उन्हें?” “नहीं रीता, तुम जानती नहीं उन्हें, जो ठान लेती हैं, कर के ही रहती हैं। मैं ज्यादा नहीं बोल पाता हूँ उनके सामने !” अपनी ससुराल के प्रति और भी ढेर सारा भय बैठ गया था रीता के मन में !

असुरक्षा की भावना ने घेर लिया…. कब तक छुपेगी ये बात ? तीन बरस? चार बरस? फिर उसके बाद? अरुण को खो कर कहाँ जाएगी वह? कौन पूछेगा उसे? पढी लिखी भी नहीं है तो क्या किसी के घर में बर्तन माँजकर दिन काटने पड़ेंगे ? क्या ये दुनिया कभी खूबसूरत नहीं हो सकती ? कौन सा बैर है किस्मत को उससे? साल दर साल उसकी माँ की गोद में बच्चों का इजाफा होता रहा, क्या जरूरत थी उनकी ? यहाँ केवल एक बच्चा उसके सारे दुखों को दूर कर सकता है पर वो एक भी उसके लिये नहीं? तरसती ही रह जाएगी वह ?

घर का नौकर जो घर गया तो लौटकर नहीं आया और कोई दूसरा नौकर खोजने की आवश्यकता ही नहीं महसूस हुई किसी को ! सासूजी को कोई खास काम काज करने की आदत नहीं थी और बिट्टी के कुछ करने का सवाल ही नहीं उठता था अतः रीता ने सुघड़ हाथों से चौके चूल्हे से लेकर घर की सफाई और कपड़ों तक के काम सँभाल लिये, वैसे भी घर के काम करने की तो उसे बचपन से ही आदत थी। धीरे धीरे घर का माहौल कुछ अनुकूल हो भी गया पर बिट्टी का दिल वह कभी जीत नहीं सकी। अरुण का प्यार से लाया हुआ एक भी तोहफा उसके पास बच न पाता… बिट्टी तलाशी लेकर निकाल ले जातीं, ताने देतीं सो अलग ! उसके मायके से आई चिठ्ठी वही खोलतीं, एक एक शब्द को जहर में भिगो भिगो कर उसका विवेचन होता फिर फटी चिथड़ी अवस्था में चिठ्ठी कभी रीता के हाथ में आती, कभी नहीं ही आती । दिन भर जी तोड़ काम कर लेने के बाद, अरुण के घर आने के समय रीता का जी चाहता कि मैली कुचैली साड़ी बदल कर, जरा बिखरे बाल सँभाल ले तो बिट्टी व्यंग्यों से उसे छेद डालतीं।



सब काम निबट जाने के बाद, रात गहराने के पहले, रीता कुछ पल प्रियतम के सान्निध्य में गुजारने, कुछ मीठी मीठी बातें कहने और सुनने को, अपने कमरे में जाने को आतुर रहती तो बिट्टी जाने कहाँ कहाँ के काम निकाल, उसे देर तक उलझाए रखतीं और जब तक वह खाली हो पाती, अरुण सो चुके होते । वह भी तो दिन भर की थकी माँदी रहती थी, कब सो जाती, पता ही नहीं चलता और अगले दिन सुबह, तड़के ही उठकर उसे सबके चाय नाश्ते में व्यस्त हो जाना पड़ता । फिर जब भी उसे याद आता कि अरुण से सामान्य बातचीत हुए भी हफ्तों बीत चुके हैं तब जी चाहता बिट्टी को छत से नीचे फेंक देने का या अगर एक बंदूक मिल जाय तो उनकी कनपटी पर चला देने का ! उधर अरुण समझते कि रीता ही जानबूझकर देर से आती है, वह अलग नाराज़ रहते …. इसीलिए रीता ईश्वर से मनाती थी कि दुनियाभर की सारी गालियाँ और बददुआएं बिट्टी को लग जाएँ ।

फिर एक दिन ईश्वर को दया आई उसपर कि काफी परेशानी और खर्च के एवज में एक वर का जुगाड़ हो गया बिट्टी के लिये ….अपने ही स्तर का खाता पीता घराना, नौकरी में लगा हुआ पति…. रीता ने चैन की साँस ली थी । जिंदगी कुछ खुशनुमा हो गई थी मगर कितनी ? अक्सर ही तो बिट्टी मायके में आकर बैठी रहती थीं। यहाँ जैसा सुख ससुराल में कहाँ से मिलेगा ? वहाँ किसपर बैठे बैठे हुक्म चलाने मात्र से सब काम हो जाय गा ? उसपर से स्वभाव इतना उग्र है कि आए दिन लड़ाई झगड़ा भी होता रहता था । रीता की सास मानमनौवल करातीं और रिश्वत स्वरूप ढेर सारे उपहार लाद कर बिट्टी को फिर ससुराल पँहुचाया जाता ! रीता मन ही मन व्यंग्य से मुस्कुराती …. बहू वाले कानून बेटी के लिये क्यों नहीं ? उसके सात खून माफ क्यों ? वो हमेशा निर्दोष क्यों? इसी बीच बिट्टी गर्भवती हो गईं । रीता को लगा, अब वह स्वयं को और रोक नहीं पाएगी, कुछ तो अनर्थ कर ही बैठेगी । ऐसा अन्याय भगवान कैसे कर सकते है? रीता ने तो जीवन में एक भी पाप नहीं किया है तो उसे बाँझपन की सजा और जिसने केवल पाप ही पाप किये हैं, उसे मातृत्व का वरदान ? कैसा न्याय है ये कुदरत का ? अब जो भगवान ने कुछ नहीं किया तो रीता ही उनको पहाड़ की किसी उँची चोटी से धक्का दे देगी…. उनके खाने में जहर मिला देगी… सीढ़ियों से गिरा देगी…. अगर कहीं से बंदूक मिल जाय…. ईर्ष्यादग्ध मन नपुंसक आक्रोश से उबल रहा था कि कुछ भी ऐसा हो जाय कि बिट्टी माँ न बन पाएँ । जो वह रीता को उसकी सूनी गोद का ताना देती हैं तो खुद उनको भी ये दर्द समझ में तो आए !

नियति को मानों रीता की ईर्ष्या का आभास था, शायद इसीसे, बिट्टी के यहाँ पहली जच्चगी ससुराल में होती थी । लंबे समय के बाद अब जो वह मायके आई हैं तो अपने ढाई महीने के सँपोले के साथ, घमंड के मारे पैर ही जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं। इसबार उसने अपने क्रोध और विरक्ति को ज्यादा नहीं छुपाया। उस दिन मुँह से तो कुछ नहीं बोल सकी पर नागिन के उस बच्चे का मुँह फिर नहीं देखा। छाती के अंदर जम कर बैठे उस दर्द से सुलगती हुई नफरत की लपटें उसके अंतर को झुलसाती रहती थीं और उसका जी चाहता था कीड़े की तरह कुलबुलाते हुए उस प्राणी को उठाकर छत से नीचे फेंक देने का, जिसके आते ही जाने कितना प्रदूषण घर के वातावरण में फैल गया था । जब देखो तब चीख चीख कर रोने की आवाज़ … बिल्कुल बिट्टी जैसी ही कर्कश ! लगता कानों के पर्दे ही फट जाएँगे। चलते फिरते अक्सर इधर उधर फेंकी हुई गंदी गीली लँगोटी पैरों में आ जाती तो वह देर तक अपने पैर रगड़ रगड़ कर धोती रहती। गहरे पीले, गाढ़े द्रव से भरे बदबूदार तौलिये धोते समय न आँसू ही रूकते न कै ही ! मन के अंदर गालियों का सैलाब सा आ जाता कि पिछले पंद्रह दिनों से वह जिस बिट्टी की सेवा में जुटी हुई थी, वह हर पल अरुण को उसके विरुद्ध भड़काने में व्यस्त थीं ।

घर के काम कुछ इस कदर बढे हुए थे कि कुछ पल अपने नाराज़ प्रीतम के पास बैठ कर अपनी बेबसी समझा देने का भी वक्त नहीं मिल पा रहा था । ऐसे में जब पता चला कि बिट्टी को उनकी नानी से मिलाने, सासूजी उन्हें गाँव लेकर जा रही हैें तो खुशी से उसका चेहरा खिल गया था। अब एक सप्ताह वह रानी बन कर राज करेगी। ससुर जी तो सुबह सवेरे ही दुकान के लिए निकल जाएँगे तो बहुत वक्त मिलेगा अरुण के साथ सारे शिकवे गिले दूर करने का ! घर को झाड़ बुहार कर कुछ ऐसे साफ कर देगी कि एक हफ्ते तक खून चूसने वाली पिशाचिनों की याद तक न आए ! उस दिन बिल्कुल सुबह सुबह ही दोनों गाँव के लिए रवाना हो गई थीं। ससुर जी भी चले गए…. ऐसा मौका तो बहुत कम मिलता है उसे ! एक एक पल को भरपूर जी लेने की ख़्वाहिश थी कि एकाएक फोन की घंटी बजी और ससुर जी की घबराई हुई आवाज़ सुनाई दी कि सासूजी लोगों की बस का ऐक्सीडेंट हो गया है ! घबराहट ….भागदौड़ … बदहवासी… अस्पताल के सैंकड़ों चक्कर, पर न सासूजी ही बचीं न बिट्टी ही ! बच्चा लुढ़क कर पाँवदान पर गिर गया था, उसे कुछ चोटें जरूर आई थीं पर वह ठीक था। डर गई थी रीता, क्या यह उसकी बद्दुआओं का असर था ? उसकी तीव्र इच्छा शक्ति की वजह से तो ये दुर्घटना नहीं हुई है ? पर ऐसा कुछ तो उसने नहीं चाहा था! बचपन से दबा सहमा मन अगर दूसरों को गालियाँ देकर हल्का होता था तो इसमें उसका क्या दोष ? मन में बद्दुआएँ उठने पर उसका कोई वश नहीं था पर उनके पूरा न होने पर अफसोस भी तो नहीं होता था उसे? बिट्टी के ससुराल वाले आए, ढेरों आँसू भी बहाए गये पर बच्चे को साथ ले जाने में कोई इच्छुक नहीं दिखा। बिट्टी के ससुर नए सिरे से अपने बेटे की शादी रचाकर उसका घर बसाना चाहते थे। उनको मरे अभी दस दिन भी नहीं हुए और इस तरह की बातें ? इन्सानियत तो मानो आज की दुनिया में रह ही नहीं गई है। ससुर जी का उनसे जबरदस्त झगड़ा हुआ मगर उससे क्या ? बच्चे की सारी जिम्मेदारी रीता से पूछे बिना ही उसके सिर पर आ पड़ी।

सहानुभूति और डर का स्थान एक बार फिर क्रोध ने ले लिया…. दिमाग भिन्ना उठा उसका! ये बिट्टी किसी न किसी रूप में जिंदगी भर सिर पर सवार ही रहेंगीं क्या ? क्यों ढ़ोए वह उनकी इस गंदगी को ? उसे तो नफरत है इस सँपोले से, कि वो तो मुँह तक नहीं देखना चाहती है इसका…. फिर क्यों फाँसी के फंदे को जिंदगी भर गले में लपेट कर रखे ? नहीं चाहती वह इस बोझ को उठाना… पर किससे कहे अपने मन की बात ? उससे तो किसी ने पूछा ही नहीं ? पर वह स्वयं आगे बढ कर अपनी मर्ज़ी किसी को बता क्यों नहीं पाती ? अब उसे अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था…. इतनी दब्बू है, दूसरे उसे क्या सताएँगें…. सारा कष्ट अपनी कमजोरी के कारण सहती है वह ! छाती में दर्द की इतनी तेज लहरें उठ रही थीं कि बर्दाश्त करना मुश्किल होता जा रहा था ! लगता था अभी गिर ही पड़ेगी वो ! छः सात दिन अस्पताल में रहने के बाद बच्चा घर आया तो शोक प्रकट करने के लिए आए हुए आगंतुकों से घर भरा हुआ था और रीता घर सँभालने में बेहद व्यस्त थी, अतः बिट्टी की नानी ही उसे सँभाले रहीं ।



तेरहवीं तक, शोक और मातम के माहौल के बाद जिंदगी धीरे धीरे फिर एक ढर्रे पर आने लगी। नानी जी गाँव लौट गईं और ससुर जी के साथ अरुण भी दुकान के लिए निकल गये । आज पहली बार रीता अपने घर में उस सँपोले के साथ अकेली थी। थोड़ी देर के बाद जब उसने जाग कर रोना शुरु किया तो रीता ने पहले तो अपने कानों में उँगलियाँ ठूँस ली थीं पर फिर कुछ सोंचकर एक पैशाचिक आह्लाद से उसका चेहरा चमक उठा। नाहक ही परेशान थी वह, अब तो उसकी पारी है। नियति ने उसे गिन गिन कर हर जुल्म का बदला लेने का मौका दिया है। ये जहर की पोटली जो एक दिन उसकी नजर मात्र से कुम्हलाई जा रही थी, आज उसके कदमों पर पड़ी है। अब वो जिंदगी भर ठोकरें मारती रहेगी इसे, अपने राख में मिल गये सुनहरे दिनों के एक एक पल का बदला लेगी इससे, ताकि इसकी माँ की आत्मा जहाँ कहीं भी हो, चैन न पा सके…. बस तड़पती रहे ! बच्चा रोए जा रहा है तो रोने दो, नहीं उठेगी वह ! छाती में दर्द हो रहा था अतः उठने को जी भी नहीं चाह रहा था । देखें, कितना चीख सकता है। रो रोकर इसका गला भी फट जाय तो भी इस समय रीता को रोकने टोकने के लिये कोई नहीं था ।

एक्दम अपनी माँ पर गया है ये ! एक झापड़ बिट्टी के गालों पर रसीद कर देने की इच्छा जिंदगी भर मन में घुटती रही है…. पर इससे तो सारा बदला लिया जा सकता है, उन्हीं के शरीर का अंश है न ये ! एक तमाचा उसके गालों पर रख कर उसे चुप कराने आई थी वह, पर वहाँ न तो कोई विष की पोटली थी, न सँपोला ….. ये तो कोई छोटा गुलगुथना सा शिशु था जिसकी आँसुओं से भीगी भींगी आँखें उसी पर आ टिकी थीं । पता नहीं क्या दिखा उन आँखों में कि निःशब्द खड़ी वह, उस हाथ पैर मारकर चीखते हुए नन्हे से जीव को देखती ही रह गई । हमेशा से ऐसी ही तो है वो… चार छोटे भाई बहनों को पाल पोस कर आदमी बनाया है उसने…. सभी तो उसे मार पीट कर चले जाते थे, उसका मन आक्रोश से उबलता रहता, पर वह किसी से उँची आवाज में बात तक नहीं कर सकी कभी ! ये छोटा सा चेहरा, अरुण से कितना मिल रहा है…. मानो नन्हा सा अरुण ही हो ! जितना उन्हें पाया उसमें शायद पूर्णता नहीं थी क्या इसीसे लघु रूप में एक और अरुण उसके सामने आ गया है ? रीता के संपूर्ण अस्तित्व को समा लेने के लिए शिशु रुप में आकर उसकी ओर हाथ पैर उछाल रहा है ।

फिर लगा जैसे उसे कुछ हो रहा है…. छाती के अंदर से कुछ रिस रहा था जो उसके बरसों से उजाड़ पड़े अंतरतम को सींच रहा था। वह इतना भीग गई कि सारी ईर्ष्या, द्वेष और कटुता धुल कर बह निकली। क्या है यह? दया ? क्षमा ? भीख ? नहीं, वात्सल्य है ये ! एक ऐसी रसधारा जिससे आजतक अपरिचित थी वह ! कभी सोच भी नहीं सकती थी कि एक अनुभूति बाढ़ की तरह आकर उसे सबकुछ भूलने पर मजबूर कर सकती है…. कौन बिट्टी ? कैसा अपमान ? और किस बात का प्रतिशोध ? ….. न नफरत न क्षोभ , वहाँ तो बस छाती में उमड़ती हुई ममता की शाश्वत और पावन रसधारा के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था । ईश्वर ने तो इसे अरुण के लिये ही धरती पर भेजा था पर शायद गलती से बिट्टी की कोख दे दी। कहीं इसी ग़लती को सुधारने के लिये तो इतना सबकुछ नहीं हुआ ? जो भी हो, रीता की अपनी संतान उसके सामने है, और वह इतनी दूर खड़ी है ? अंजाने ही आगे बढ़कर उसने उसे अपने सीने में भींच लिया और यह क्या ? छाती जैसे ठंढी पड़ गई। गीली नैपी से साड़ी का एक बड़ा हिस्सा भीग गया था…. रीता मुस्कुरा दी। थूक और आँसुओं से भीगे गाल चूमने को मन मचल उठा और वहाँ होंठ सटाते ही लगा, अब उसकी छाती में दर्द कभी नहीं उठेगा।



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Post source : Written By Agrawal Shruti

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