September 25, 2021

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एक यूनानी हकीम, हाफ़िज़ अब्दुल मजीद ने रूह अफज़ा की खोज की थी

एक यूनानी हकीम, हाफ़िज़ अब्दुल मजीद ने रूह अफज़ा की खोज की थी

एक यूनानी हकीम, हाफ़िज़ अब्दुल मजीद ने पुरानी दिल्ली में मौजूद अपनी क्लिनिक में एक ऐसी हर्बल दवा की खोज की थी, जिसको उष्माघात और निर्जलन के इलाज करने के मकसद से बनाया गया था। ये दवा इतनी मशहूर हुई, कि मजीद ने इसको व्यवसायिक रूप से बेचने के लिए, हमदर्द नाम के कंपनी की स्थापना सन 1907 में की। ये दवा थी: रूह अफज़ा।

आज भी ये कालातीत, लाल, गुलाब के स्वाद वाला पेय, गर्मियों के मौसम में सबका पसंदीदा है। इसका कंसन्ट्रेट ठंडे दूध और बर्फ के साथ मिलाकर शरबत के तौर पर, दूध और सेवइयां के साथ फलूदा के तौर पर और यहाँ तक कई प्रकार मीठे पकवानों, शेक, स्मूथी आदि बनाने में इस्तेमाल होता हुआ आया है।

रूह अफज़ा, भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की एक झलक पेश करता है। स्वदेशी आन्दोलन से उपजी इस मशहूर पेय का व्यवसाय, विभाजन के वक़्त, दो परिवारों में बांटा गया, जिसको एक भाई भारत से, तो दूसरा पाकिस्तान से चला रह था। 1971 में ढाका का कार्यभर, नव-गठित बांग्लादेश में एक स्थानीय व्यवसायी को दिया गया।

फारसी में रूहअफज़ा का अर्थ है, “वो जो रूह की अफजाई करे”। इसको बनाने में 25 सामग्रियों का इस्तेमाल होता है, जिसमें पालक, खीर, धनिया, चन्दन, कमल और यहाँ तक दो प्रकार की लिली से निकले अर्क का भी इस्तेमाल होता है। 114 सालों के बाद भी, ये हर मौसम का अमृत रहा है।

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