पिरूल बनेगा महिला सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण जरिया: मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत | Doonited.India

June 17, 2019

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पिरूल बनेगा महिला सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण जरिया: मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत

पिरूल बनेगा महिला सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण जरिया: मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत
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• वनों को ग्रामीण आर्थिकी से जोङने की बङी पहल।
• पिरूल नीति में मुख्यमंत्री ने 21 विकासकर्ताओ को आवंटन पत्र दिए।
• 20 प्रस्ताव पिरूल से विद्युत उत्पादन व एक प्रस्ताव पिरूल से ब्रिकेट बनाने के लिए है।
• जंगलों से पिरूल कलेक्शन करने के लिए महिला समूहों को एक रूपया प्रति किलो की दर से भुगतान किया जाएगा।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने बुद्धवार को मुख्यमंत्री आवास में पिरूल (चीड़ की पत्तियों) तथा अन्य प्रकार के बायोमास से विद्युत उत्पादन तथा ब्रिकेट इकाइयों की स्थापना हेतु 21 चयनित विकासकर्ताओं को परियोजना आवंटन पत्र प्रदान किये। इस अवसर पर मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र ने नवोन्मेषी उद्यमियों का स्वागत करते हुए इसे पर्यावरण संरक्षण के लिये भी नई शुरूआत बताया। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन रोकना हमारी सबसे बड़ी चिन्ता है। राज्य निर्माण के बाद भी गांवों से हो रहा पलायन चिन्ता का विषय है। इसके लिये ग्रोथ सेन्टरों की स्थापना पर ध्यान दिया जा रहा है। ताकि स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध हो सकें।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पिरूल प्रकृति की देन है इसे व्यवस्थित कर ग्रीन एनर्जी में परिवर्तित करना हमारा उदेश्य है। पिरूल से ऊर्जा उत्पादन हेतु आज 21 उद्यमी आगे आये है। उन्हें भरोसा है कि इनकी संख्या शीघ्र ही 121 होगी। उन्होंने कहा कि इसमें राज्य को एनर्जी इंधन के साथ ही वनाग्नि को रोकने में मदद मिलेगी, जगंलों में हरियाली होगी तथा जैव विविधता की सुरक्षा होगी। उन्होंने कहा कि चीड़ से निकलने वाले लीसा से भी 43 प्रकार के उत्पाद बनाये जा सकते है। इसके लिए इंडोनेशिया से तकनीकि की जानकारी प्राप्त की जाएगी। इसका एक प्रोजेक्ट बैजनाथ में लगाया गया है। इससे भी वनाग्नि को रोकने में मदद मिलने के साथ ही हजारों लोगों को रोजगार उपलब्ध हो सकेगा। उन्होंने कहा आज प्रदेश में चीड़ विनाश के बजाये विकास का कारक बन रहा है। उन्होंने कहा कि इन योजनाओं पर शीघ्र कार्य हो तथा उद्यमियों को सभी आवश्यक सुविधायें उपलब्ध हो। इस पर भी ध्यान दिया जाये। बैंकों को भी इस दिशा में सहयोगात्मक रवैया अपनाने को कहा गया है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य व रोजगार पलायन के प्रमुख कारणों में शामिल है। इस दिशा में हमने कारगर प्रयास शुरू कर दिये है। अस्पतालों में डाॅक्टरों की तैनाती के साथ ही स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती की गई है, एनसीआरटी की सस्ती दर पर पुस्तकें उपलब्ध करायी जा रही है। हमारा सामाजिक दायित्व के तहत 482 स्कूलों को विभिन्न उद्योगपतियों द्वारा एडाप्ट कर उन्हें स्मार्ट स्कूल के रूप में विकसित किया जा रहा है। शिक्षा की बेहत्तरी के लिये 700 स्कूलों का एकीकरण कर शिक्षकों की संख्या भी बढ़ाई गई है। बड़े गांवों में स्कूल बसों की व्यवस्था की जा रही है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड अमूल्य वन संपदा से भरपूर है। हमने इस दिशा में बहुत विचार विमर्श करे पिरूल की खपत को क्लीन एनर्जी में बदलने के संकल्प पर काम किया। हमारी ये सोच धरातल पर उतर रही है। पिरूल नीति हमारे लिए, हमारे पर्यावरण के लिए, महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए, एक क्रांतिकारी कदम साबित होगी।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के वनों से हर साल 6 लाख मीट्रिक टन पिरूल निकलता है। इसके अतिरिक्त अन्य बायोमास भी निकलता है। इस तरह पिरूल व अन्य बायोमास से बिजली उत्पादन का जो लक्ष्य हमने रखा हैए उसकी शुभ शुरुआत होने जा रही है। पिरूल से बिजली उत्पादन के लिए उरेडा एवं वन विभाग को नोडल एजेंसी बनाया गया है। राज्य में विक्रिटिंग और बायो ऑयल संयंत्र स्थापित किए जाने हैं। इन संयंत्रों के स्थापित होने से पिरूल को प्रोसेस किया जाएगा व बिजली उत्पादन किया जा सकेगा। उरेडा द्वारा इसके लिए प्रस्ताव आमन्त्रित किए गए थे। अभी तक 21 प्रस्ताव जिसमें प्राप्त हुए जिनमें 20 प्रस्ताव पिरूल से विद्युत उत्पादन एवं एक प्रस्ताव पिरूल से ब्रिकेट बनाने के लिए शामिल है।

पिरूल के जो सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं उन तक पिरूल की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए महिला समूहों को रोजगार से जोड़ा जा रहा है। जंगलों से पिरूल कलेक्शन करने के लिए महिला समूहों को एक रूपया प्रति किलो की दर से भुगतान किया जाएगा। वन पंचायत स्तर पर महिला मंगल दलों को इसकी जिम्मेदारी दी जाएगी। इस तरह महिलाएं घर बैठे रोजगार प्राप्त कर सकेंगीए और आर्थिक रूप से सशक्त बनेंगी। महिला समूहों और महिला वन पंचायतें की भूमिका और भी सशक्त हो सकेगी। चूंकि प्रदेश में ऐसे करीब 6 हजार पिरुल संयंत्र स्थापित करने की योजना हैए अगर एक संयत्र से 10 लोगों को भी रोजगार मिले तो कुल 60 हजार लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार मिल सकेगा। इस तरह पलायन पर बहुत हद तक रोक लग सकेगी।

मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र ने कहा कि पिरूल से बायोफ्यूल और बिजली बनाने के लिए 25 किलोवाट क्षमत की इकाई स्थापित करने में करीब 25 लाख रुपए तक का खर्च आता है। 25 किलोवाट तक की इकाइयों को एमएसएमई के तहत अनुदान उपलब्ध कराया जाएगा। 25 किलोवाट तक की एक इकाई से सालभर में 1 लाख 40 हजार यूनिट बिजली और करीब 21 हजार किलो चारकोल निकलेगा। इसे बेचने से 9.3 लाख रुपए तक की आय प्राप्त हो सकती है। इससे जंगलों में फैलने वाली आग को काबू पाया जा सकता है। पिरूल कलेक्शन से स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ने के साथ ही महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण और रोजगार की संभावनाएं बढ़ेंगी। पिरूल से बायोफ्यूल बनाकर स्वच्छ ईंधन तैयार किया जाएगा तथा पिरूल प्रोसेसिंग यूनिट्स के जरिए छोटे उद्यमों को प्रोत्साहन मिलेगा।

सचिव ऊर्जा श्रीमती राधिका झां ने बताया कि उरेडा द्वारा इस नीति में 10 कि0वा0 से 250 कि0वा0 क्षमता तक की विद्युत उत्पादल इकाईयों के साथ-साथ 2000 मि0टन क्षमता तक की बायोमास ब्रिकेटिंग तथा बायो आॅयल इकाईयों की स्थापना कराये जाने हेतु दिनांक 14 फरवरी, 2019 को त्थ्च् के माध्यम से प्रस्ताव आमंत्रण किये गये थे जिसके सापेक्ष अंतिम तिथि दिनांक 30 मार्च, 2019 तक कुल 21 प्रस्ताव विभिन्न फर्मों/विकासकर्ताओं द्वारा जमा कराये गये, जिसमें 675 कि0वा0 क्षमता के 20 प्रस्ताव पिरूल से विद्युत उत्पादल हेतु एवं 2000 मी0टन का 01 प्रस्ताव बिक्रेट बनाये जाने हेतु प्राप्त हुये।

उन्होंने कहा कि इन सभी 20 परियोजनओं के कुल 675 कि.वा. विद्यत उत्पादन हो सकेगा तथा इन परियोजनाओं को वर्षभर चलाने पर लगभग 6075 मि.टन पिरूल की आवश्यकता होगी। इन परियोजनाओं की स्थापना होने से पिरूल से जंगलों में लगने वाली आग, जिसके कारण बड़ी मात्रा में पर्यावरण, जीव जन्तु एवं पेड़-पौधों को हो रही क्षति में कमी लाई जा सकेगी। तब लगभग 100-150 व्यक्तियों को सीधे तौर पर रोजगार प्राप्त हो सकेगा। इन योजनाओं की स्थापना से पर्वतीय क्षेत्रों से हो रहे पलायन को रोकन में भी मदद मिल सकेगी। साथ ही चीड़ से जंगलों में लगे वाली आग से हो रहे कार्बन उत्सर्जन में भी कमी हो सकेगी। पिरूल से विद्युत उत्पादन एवं बायोमास ब्रिकेटिंग/बायो आॅयल इकाईयों की स्थापना के लिये उत्तराखण्ड सरकार द्वारा की गई यह पहल पूरे देश में अन्य किसी राज्य द्वारा नहीं की गई है।

प्रमुख वन संरक्षक जयराज ने वन विभाग की ओर से इस सम्बन्ध में सभी आवश्यक सहयोग का आश्वासन दिया।

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