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मौके रोज दस्तक नहीं देते Written By Yogesh Suhagwati Goyal

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मौके रोज दस्तक नहीं देते

Written By © Yogesh Suhagwati Goyal

 

नवी मुंबई के बेलापुर रेल्वे स्टेशन के पास कंचन हाउसिंग सोसाइटी की पर्ल टावर में ९वीं माले पर ३ कमरों के फ्लेट नंबर ९०६ में मेहता परिवार रहता था। मेहता परिवार में परिवार के मुखिया श्री आलोक मेहता, उनकी पत्नी गीता, बेटा सौरव और सबसे छोटी, बेटी रश्मि थे। आलोक एक प्राइवेट कंपनी में ऊंचे पद पर कार्यरत थे। सौरव ने मुंबई के एक सरकारी कालेज से कम्प्युटर इंजीनीयरिंग की पढ़ाई की और आजकल टाटा कंसल्टेंसी में बतौर मेनेजर काम कर रहा था। बेटी रश्मि मेडिकल कॉलेज के आखिरी साल में थी। गीताजी अपने आपको परिवार की देखभाल और घर के कामों में व्यस्त रखती थी। कुल मिलाकर, परिवार के हर सदस्य की ज़िंदगी सुचारु रूप से चल रही थी। सभी अपने आप में व्यस्त और खुश थे।

कंचन हाउसिंग सोसाइटी की पर्ल टावर में ही, छठे माले पर ३ कमरों के फ्लेट नंबर ६०५ में माने परिवार रहता था। माने परिवार में श्री जयदीप माने, उनकी पत्नी लीना और बेटी श्लोका थे। जयदीप माने साहब एक बड़ी फ़ाइनेंस कंपनी में डायरेक्टर के पद पर कार्यरत थे। उनकी पत्नी लीना एक फ्रीलान्स इवैंट मैनेजर थी। बिटिया श्लोका ने मुंबई यूनिवर्सिटी से कला की डिग्री लेने के बाद, अमेरिका की एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी से एडवरटाइज़िंग और मॉडलिंग का कोर्स किया। वो आजकल मुंबई में ही मॉडलिंग का काम कर रही थी। बहुत थोड़े से वक़्त में ही श्लोका की गिनती देश की नामी मॉडलों में होने लगी थी।

मेहता और माने दंपति पर्ल टावर में रहने करीब ३० साल पहले आये थे। उस वक़्त दोनों के ही बच्चे नहीं थे। सौरव, रश्मि और श्लोका का जन्म यहीं हुआ। तीनों बच्चे साथ साथ बड़े हुए। आलोक और जयदीप शुरू के दिनों से ही अच्छे दोस्त थे। दोनों परिवारों का एक दूसरे के यहाँ आना जाना, मिलना जुलना लगा ही रहता था। यहाँ अगर मैं दोनों परिवारों की तुलना करूँ तो मेहता परिवार के मुक़ाबले माने परिवार आर्थिक रूप से ज्यादा सम्पन्न था। माने परिवार मन से पूरा भारतीय था और अपने संस्कारों के प्रति गंभीर था। लेकिन रहन सहन, आचार विचार, पहनावा इत्यादि में पूर्ण रूपेण पाश्चात्य सभ्यता में रंगा होने के कारण, कुछ लोगों की नज़रों में खटकता था। खासकर गीता मेहताजी लीना और श्लोका से कटी कटी रहती थी।

पारिवारिक या सामुहिक कार्यक्रमों में मिलने जुलने से उन्हें कोई परहेज नहीं था, लेकिन वो दोनों को ही ज्यादा पसंद नहीं करती थी। यूं भी लीना और श्लोका, दोनों का काम भी कुछ ऐसा था कि दोनों हमेशा टशन में रहते थे। किस्मत से माँ और बेटी दोनों ही मृदुभाषी, खूबसूरत और आकर्षक व्यक्तित्व की धनी थी। सुबह या शाम जब भी माँ बेटी पार्क में साथ घूमने निकलती तो देखने वालों की आँखें फटी रह जाती।



श्लोका जयदीप माने और लीनाजी की इकलौती संतान थी। माँ बाप के साथ साथ श्लोका भी यही चाहती थी कि उसकी शादी आसपास कहीं मुंबई में ही हो जाये। इससे शादी के बाद भी वो अपने माँ बाप के करीब रह पायेगी और आगे उनकी देखभाल भी कर सकेगी। इसी विचार को ध्यान कर, एक दिन बातों बातों में जयदीप माने साहब और लीनाजी ने श्लोका का सौरव के साथ शादी का प्रस्ताव रखा। आलोक मेहताजी को प्रस्ताव बहुत अच्छा लगा। रश्मि तो पूरी की पूरी खिल गयी। श्लोका उसकी सबसे प्रिय सहेली जो थी। लेकिन गीताजी ने इस प्रस्ताव में ज्यादा रुचि नहीं दिखाई। उन्होने “सबके साथ विचार विमर्श कर आपको जवाब देंगे” कहकर बात टाल दी। गीताजी ने इस बात का कभी जवाब नहीं दिया और लीनाजी ने दोबारा नहीं पूछा। शायद माने साहब और लीनाजी, गीताजी का मन समझ गये थे।

सौरव ज़्यादातर अपना लंच घर से ही लेकर जाता था लेकिन कभी कभी ये मुमकिन नहीं हो पाता था। उसके आफिस के नीचे ही कई होटल थे और लंच के वक़्त तो सड़क पर भी बहुत से ठेले और मोबाइल वेन लग जाते थे। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। घर पर खाना तैयार नहीं हुआ था। लंच के वक़्त कुछ मित्रों के साथ सौरव भी सड़क पर खड़ी मोबाइल वेन के पास आ गया। सभी अपना अपना लंच खरीदकर वहीं खड़े होकर खाने लगे। उनके पास खड़े कुछ लोग एक नये विज्ञापन की बात कर रहे थे। सौरव के मन में भी उत्सुकता जगी और उसने अपने साथ वाले मित्रों से उस विज्ञापन के बारे में जानना चाहा। तभी एक साथी ने बताया कि टीवी पर अभी कुछ दिन पहले ही एक नया लेडीज अंडरगारमेंट्स का विज्ञापन चालू हुआ है। ये लोग उसी की बात कर रहे हैं।

सौरव को थोड़ी हैरानी हुई इसीलिए वो फिर पूछ बैठा, तो इसमें नया क्या है ?

अरे यार, ये लोग लेडीज अंडरगारमेंट्स की बात नहीं कर रहे हैं। ये लोग उस विज्ञापन वाली लड़की की बात कर रहे हैं। एक तो वो लड़की बहुत सुंदर है और उसके ऊपर अंडरगारमेंट्स का विज्ञापन। जो कोई भी उस विज्ञापन को देखता है, बस देखता ही रह जाता है। इतने में ही सौरव का एक और साथी कमल भी आ गया। आते ही उसने भी नये विज्ञापन की बात छेड़ डी। कमल ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से टीवी पर लेडीज अंडरगारमेंट्स का एक विज्ञापन आ रहा है। लेकिन कौन कमबख्त लेडीज अंडरगारमेंट्स देखता है जब विज्ञापन करने वाली लड़की इतनी खूबसूरत हो। और हाँ याद आया, शायद ये वही मॉडल है जो तुम्हारी बिल्डिंग में रहती है। तुमने तो उसे देखा होगा ! ये सब सुनकर, सौरव मूक दर्शक बन गया था। टीवी तो वो भी देखता था लेकिन इस नये विज्ञापन पर उसका ध्यान कैसे नहीं गया ? खैर, वहाँ मौजूद कुछ लोग तो उस मॉडल को सुपर सेक्सी कहकर आहें भर रहे थे।

आफिस से छुट्टी के बाद, घर लौटते वक़्त सौरव ने उस विज्ञापन के कुछ बिलबोर्ड भी देखे। उस विज्ञापन में श्लोका ज्यादा ही खूबसूरत नज़र आ रही थी। घर पहुँचने में एक घंटा लग गया। कपड़े बदलकर सौरव सीधा ड्राइंग रूम में गया और टीवी चालू कर दिया। कुछ चेनल बदलने के बाद आखिर वो विज्ञापन नज़र आ गया। उसके दोस्त सही कह रहे थे। इसी बीच सौरव की माँ भी वहाँ आ गयी। टीवी पर उस विज्ञापन को देखकर, बरबस ही उनके मुंह से निकल गया, इस लड़की को जरा भी शर्म नहीं आती। ये लड़की ऐसे गंदे गंदे विज्ञापन क्यों करती है ? सौरव ने अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

आमतौर पर आलोक मेहताजी और सौरव को घर आते आते करीब नौ – साढ़े नौ बज जाते थे। इसीलिये काम वाले दिन, रश्मि डिनर टेबल पर, सौरव और पापा का इंतज़ार नहीं करती थी। वो अपना डिनर जल्दी खत्म कर कॉलेज के काम में लग जाती थी। टेबल पर बैठते ही माँ ने श्लोका के विज्ञापन की बात छेड़ दी

गीता : रश्मि, क्या तुमने भी श्लोका का लेडीज अंडरगारमेंट्स वाला विज्ञापन देखा है ?

रश्मि : नहीं माँ, मैंने देखा तो नहीं है लेकिन श्लोका ने मुझे उसके बारे में बताया था। उसके अनुसार अंडरगारमेंट्स वाली कम्पनी ने इस विज्ञापन पर बहुत पैसा खर्च किया है। वो अपने अंडरगारमेंट्स बहुत बड़े स्केल पर लॉंच करना चाहते हैं। और हाँ माँ, एडवरटाइज़िंग और मॉडलिंग की दुनिया में ये सब चलता है, इसमें नया क्या है ?

गीता : लेकिन इतना गंदा विज्ञापन करने की जरूरत क्या है ?

रश्मि : माँ, ये उसका काम है। और इसमें गंदा क्या है ? अब साड़ी पहनकर तो अंडरगारमेंट्स का विज्ञापन हो नहीं सकता।

गीता : पहनावे से ही माँ और बेटी, दोनों का चाल चलन झलकता है। बन ठनके आधुनिक कपड़ों में, यहाँ वहाँ घूमती फिरती हैं।

रश्मि : माँ, पहनावा उनकी अपनी जरूरत भी है और पसंद भी। दोनों का पेशा भी इसका एक बड़ा कारण है। लेकिन वो दोनों ही अपने परिवार के संस्कारों का पूरा खयाल रखती हैं।

गीता : मैं तेरे साथ सहमत नहीं हूँ।

रश्मि : माँ, आप कैसे भूल सकते हो ? अपनी हर जरूरत के वक़्त, कैसे सारा माने परिवार अपने साथ खड़ा हो जाता है ? हर वर्ष कितनी धूमधाम से, मन से गणेश उत्सव मनाते हैं। अपनी सोसाइटी के कार्यक्रमों में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं। सबके साथ कितनी शालीनता से पेश आते हैं। लीना आंटी कैसे सबकी मदद करती हैं। माँ, बहुत भले लोग है।

गीता : ये सब तो ठीक है लेकिन ?

रश्मि : छोड़ो, जाने दो माँ। आपने अपने दिमाग में उन दोनों के बारे में जो धारणा बना ली है, अब मैं उसे बदल तो नहीं सकती।

रश्मि अपना डिनर खत्म कर अपने कमरे में चली गयी। करीब दो से ढाई घंटे बाद, रश्मि ड्राइंग रूम में आई। सोफ़े पर बैठे पापा और माँ, दोनों टीवी देख रहे थे। रश्मि भी कुछ देर वहीं बैठ गयी। रोजाना के टीवी कार्यक्रमों के बीच अचानक लेडीज अंडरगारमेंट्स का वही विज्ञापन आ गया। मेहता साहब ने पूरा विज्ञापन गौर से देखा और बोले, बीजी ब्रांड वालों ने अच्छा विज्ञापन बनाया है। साथ ही अपनी श्लोका भी अच्छी लग रही है। बहुत ही मेहनती और समझदार लड़की है। मैं तो इसको अपने घर की बहू बनाना चाहता था।



रश्मि : पापा, श्लोका के बारे में, आप माँ के खयाल तो जानते हैं ना ?

आलोक ने हल्के से मुस्कराकर गीता की तरफ देखा और फिर टीवी देखने लगे।

गीता : तुम बाप बेटी ऐसा सोच भी कैसे सकते हो ?

रश्मि : माँ, आपको श्लोका से ज्यादा संस्कारी और समझदार बहू कहीं नहीं मिलेगी !

गीता : टीवी पर उसके संस्कार साफ नज़र आ रहे हैं।

करीब डेढ़ से दो महीने बाद।

सुबह का वक़्त था। रश्मि अखबार पढ़ते पढ़ते नाश्ता भी कर रही थी। अचानक उसकी नज़र एक खबर पर पड़ी। महाराष्ट्र सरकार लीनाजी और श्लोका को ‘संवेदनशीलता सम्मान’ से सम्मानित करेगी। इसी मुख्य पंक्ति के नीचे पूरा लेख छपा था। करीब एक महीने पहले की बात है। लीनाजी और श्लोका दोनों को सुबह ५ बजे की फ्लाइट पकडनी थी। सड़क पर रोशनी ज्यादा अच्छी नहीं थी। गाड़ी उनका ड्राइवर चला रहा था। अंधेरे में एक बूढा व्यक्ति सडक पार करने की चेष्टा कर रहा था। ड्राइवर ने जैसे ही उस व्यक्ति को देखा, उसने उससे बचने की पूरी कोशिश की। लेकिन फिर भी गाड़ी उस व्यक्ति से टकरा गयी। इस टक्कर में उस व्यक्ति का दाहिना पैर कुचल गया। तुरंत ही माँ और बेटी ने उस व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाया। दोनों ने अपने खर्चे पर और पूरी ज़िम्मेदारी से उसका इलाज करवाया। अभी भी जरूरत मुताबिक दोनों उस व्यक्ति की मदद करते रहते हैं। उस व्यक्ति को अस्पताल ले जाने और इलाज संबंधी बातचीत में उनकी फ्लाइट छूट गयी, और उस दिन और आगे होने वाले कार्यक्रमों पर भी बुरा असर पड़ा। परंतु इस सबकी परवाह किये बिना एक अनजान इंसान के लिए उनकी संवेदना सम्मान के काबिल है।

पूरा लेख पढ़ने के बाद रश्मि ने माँ को बताया कि आज के अखबार में लीना आंटी और श्लोका के बारे में खबर छपी है, आप भी पढ़ लेना। ये कहकर वो अपने कॉलेज को निकल गयी।

उस दिन शाम जब सारा परिवार टीवी के सामने बैठे हुए थे तो लीनाजी और श्लोका के संवेदनशीलता सम्मान की बात चल निकली।

रश्मि : पापा, आपने पूरी खबर पढ़ी ?

आलोक : हाँ बेटा, बहुत कम लोग ही इतने संवेदनशील होते हैं।

मैं तो बहुत पहले से जानता हूँ, मानता हूँ और कहता भी हूँ, कि माँ बेटी ही नहीं, सारा माने परिवार ही बहुत अच्छा है, भले लोग हैं, लेकिन तेरी माँ माने तब ना। और फिर हल्के से मुस्कराकर गीता की तरफ देखा।

गीता : अब तो मानना ही पड़ेगा, लीनाजी और श्लोका ने सम्मान के काबिल काम किया है।

रश्मि : तो क्या अब आप श्लोका को अपनी बहू बनाने को राज़ी हो ?

गीता : मैं मना करने वाली कौन होती हूँ। कहकर हल्के से मुस्करा दी।

रश्मि : पापा, अब तो आप तुरंत ही जयदीप अंकल से बात कर लो । कौन जाने माँ का मन कब बदल जाये ?

शायद ये शुभ संयोग था । इन्हीं सब बातों के बीच, आलोक मेहताजी के मोबाइल के घंटी बजी । दूसरी तरफ से जयदीप माने साहब बोल रहे थे । आम शिष्टाचार के बाद, माने साहब ने बताया कि वो श्लोका के संबंध के बारे में बात करना चाह रहे थे । दो तीन अच्छे प्रस्ताव मिले हैं लेकिन वो अभी भी मेहताजी के जवाब का इंतज़ार कर रहे हैं । वो आज भी यही मानते हैं कि सौरव और श्लोका की जोड़ी अच्छी जमेगी । दोनों बच्चे एक दूसरे को बचपन से जानते हैं । हम दोनों के परिवार भी एक दूसरे को अच्छी तरह से समझते हैं । वो चाहते हैं कि इस प्रस्ताव के बारे में गंभीरता से विचार किया जाये ।

माने साहब की बात सुनकर, सर्वप्रथम मेहताजी ने समय से जवाब नहीं देने के लिए माफी मांगी । साथ ही गीता से बात कर १० मिनिट में जवाब देने की इजाजत मांगी । इतना कहकर उन्होने फोन काट दिया । और फिर गीता और रश्मि को सारी बात बताई । श्लोका से शादी के बारे में, वो सौरव और रश्मि के विचार जानते थे लेकिन गीता की तरफ से निश्चिंत नहीं थे । बातों बातों में उन्होने गीता को समझाया कि मौके बार बार दस्तक नहीं देते । हम भाग्यशाली हैं, ईश्वर ने हमको फिर एक बार मौका दिया है । इतना कहकर उन्होने गीता को प्रश्नभरी निगाहों से देखा । गीता की इच्छा जाने बिना वो कोई जवाब नहीं दे सकते थे ।

गीता मुस्कराई, फ्रिज से मिठाई का डिब्बा निकाला और फिर आलोक और रश्मि को साथ चलने को कहा । बिना वक़्त गँवाये, तीनों माने साहब के घर पहुंचे । सब लोग घर पर ही थे । हमेशा की तरह, आलोक तो माने साहब के सामने बैठे लेकिन आज पहली बार गीता लीना के साथ बैठी । शिष्टाचार के बाद, गीता ने लीना और माने साहब से कहा, अगर आप दोनों आशीर्वाद दें तो श्लोका को अपनी बहू बनाकर हमें गर्व का अनुभव होगा ।

सब लोग एक दूसरे को मिठाई खिला रहे थे और पास बैठी श्लोका मुस्करा रही थी ।




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Post source : Yogesh Suhagwati Goyal

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