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July 19, 2019

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प्रमोशन में आरक्षण खत्म करने का शासनादेश निरस्त

प्रमोशन में आरक्षण खत्म करने का शासनादेश निरस्त
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उत्तराखंड में अनुसूचित जाति और जनजाति के कर्मचारियों-अधिकारियों को प्रमोशन में आरक्षण का रास्ता साफ हो गया है। नैनीताल हाईकोर्ट ने उत्तराखंड सरकार के इस मामले में जारी शासनादेश को निरस्त कर दिया है। सरकार ने 5 सितंबर 2012 को यह शासनादेश जारी किया था। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति एनएस धानिक की संयुक्त खंडपीठ ने सोमवार को मामले की सुनवाई की। अलबत्ता, अदालत ने कहा है कि सरकार चाहे तो इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 16 (4ए) के अंतर्गत कानून बना सकती है। यहां यह उल्लेखनीय है कि देश की सर्वोच्च अदालत सितंबर 2018 में प्रमोशन में आरक्षण पर मुहर लगा चुकी है।

रुद्रपुर निवासी ज्ञान चंद्र ने इस मामले में हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें सरकार के पांच सितंबर 2012 के शासनादेश को चुनौती दी गई थी। इस शासनादेश में सरकार ने प्रदेश में प्रमोशन में आरक्षण पर रोक लगा दी थी। याचिका में इसे संविधान की भावना और सुप्रीम कोर्ट के समय-समय पर दिए फैसले के खिलाफ बताते हुए निरस्त करने की मांग की थी।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद जारी हुआ शासनादेश
सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले के बाद शासनादेश जारी किया था। 10 जुलाई 2012 को एक  याचिका में सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने प्रावधान पूरे किए बगैर प्रमोशन में आरक्षण देने पर रोक लगा दी थी। दरअसल, हाईकोर्ट ने एम.नागराज बनाम भारत सरकार के 2006 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आधार बनाकर जुलाई 2012 में यह फैसला दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दिए फैसले में कहा था कि SC-ST वर्गों के लिए प्रमोशन में आरक्षण का प्रावधान करने से पहले सरकार को संबंधित वर्ग के आंकड़े जुटाने होंगे। इसमें पिछड़े रह गए लोगों की संख्या, प्रतिनिधित्व का प्रतिशत और प्रशासन के कार्य पर इसका असर जैसे आंकड़े शामिल थे। उत्तराखंड सरकार भी यह आंकड़े इकट्ठा नहीं कर सकी थी। हालांकि सरकार ने जस्टिस इरशाद हुसैन की अध्यक्षता में कमेटी गठित कर आंकड़े इकट्ठा करने की कवायद शुरू जरूर की थी, जिसकी अब जरूरत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2018 में दिया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2018 में इस मामले में सुनवाई की थी। इसमें साफ किया कि प्रमोशन में आरक्षण दिया जाना चाहिए। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट साफ कर चुका है कि प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए 2006 में तय मापदंडों को पूरा करने और इससे संबंधित जानकारी जुटाने की जरूरत नहीं है। हाईकोर्ट में याची के अधिवक्ता हरिमोहन भाटिया ने बताया कि इन सभी बातों का ध्यान रखते हुए नैनीताल हाईकोर्ट ने सरकार के जीओ को निरस्त कर दिया है।

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