पलायन: न जाने अब वो लौटेंगे भी कि नहीं – By Jyotsana Pradhan Khatri | Doonited.India

May 26, 2019

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पलायन: न जाने अब वो लौटेंगे भी कि नहीं – By Jyotsana Pradhan Khatri

पलायन: न जाने अब वो लौटेंगे भी कि नहीं – By Jyotsana Pradhan Khatri
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आज मन हुआ पहाड़ पर कुछ लिखने का….

पहाड़ से लोग पलायन कर देहरादून, दिल्ली, मुंबई और न जाने कहाँ-कहाँ बसते चले गये।
न जाने अब वो लौटेंगे भी कि नहीं।
इस प्रश्न का उत्तर भविष्य के गर्भ में है।

 

  • हम लोगों का भी जन्म देहरादून में हुआ क्योंकि पड़दादा के जमाने से वहीं के निवासी हो गये थे। पहाड़ को कभी जाना नहीं ठीक से। बस बचपन में गर्मियों की छुट्टियां पड़ती तो बड़ी मौसी के घर मसूरी चले जाते। बस वही यादें हैं पहाड़ की बचपन की।
    उसके बाद जब थोड़ी समझ हुई कॉलेज तक आते-आते तो स्नातक के अंतिम वर्ष में एडवेंचर कैंप्स में भाग लेने के कारण ऋषिकेश में माँ गंगा व प्रकृति के सान्निध्य ने पहाड़ के प्रति उत्सुकता और बढ़ा दी।

 

  • परास्नातक परीक्षा का परिणाम आते-आते जलागम प्रबंधन निदेशालय से भी लिखित परीक्षा हेतु कॉल लैटर आ गया, जिसको पास करने के बाद फिजीकल फिटनेस का १० किमी० पैदल व ग्रुप डिस्कसन टैस्ट पास कर नियुक्ति पत्र मिला।
    लगभग एक से डेढ़ माह का प्रशिक्षण व ग्राम भ्रमण के बाद दिसम्बर १९९८ में प्रथम नियुक्ति ऋषिकेश में तत्कालीन उपपरियोजना निदेशक सुश्री ज्योत्सना सितलिंग मैडम के अधीनस्थ मिली।
    तब से शुरू हुआ पहाड़ का सफ़र और कोटद्वार में थम गया। इस बीच उच्च शिक्षा भी पूरी हो गई और अन्य संस्थानों के साथ कार्य कर अनुभव भी जुड़ते चले गये।

  • अचानक फिर अवसर मिला पहाड़ से पुन: जुड़ने का और इस बार कुमांऊ क्षेत्र में अल्मोड़ा। अब तक इतना समझने लगा दिमाग कि कैसे समेट लूं इन सब पहाड़ की स्मृतियों को, धरोहरों को, यहाँ की संस्कृति को।
    जो कभी देहरादून में रहकर जाना नहीं, वो पहाड़ों में आकर जाना। कितना समृद्ध है पहाड़ लेकिन चुनौतियां बहुत हैं पर उससे निबटा जा सकता है अगर सही नीतियों से काम हो तो।
    महज़ कुछ डिग्रीयों और कुछ हज़ार की नौकरी के लिये पलायन कर गये लोग कितना कुछ खो बैठे हैं, ये शायद वो भलीभांति महसूस कर सकते हों।
    इतने सालों की नौकरी में भी लगता है अभी पहाड़ को बहुत कुछ जानना बाकि है। हर दिन कुछ न कुछ नई जानकारी मिलती रहती है।

One day at Sakar Van Panchayat of Gananath Forest Range...
Writer Herself : One day at Sakar Van Panchayat of Gananath Forest Range…

 

  • कभी-कभी लगता है अभी शून्य से ही शुरुआत हुई है पहाड़ को जानने की।
    इतनी विभूतियां इन पहाड़ों में जन्मी है, जिनके बारे में पढ़ती हूँ तो गर्व होता है पहाड़ पर और पछतावा भी कि क्यों नहीं जान पाई इन सबके बारे में पहले।
    देहरादून बस कुछ डिग्रियां ही दे पाया मुझे। असली शिक्षा व जानकारी इन पहाड़ों व जंगलों ने ही दी है मुझे। बहुत लंबा समय बीत गया पर लगता है अभी मैंने कहाँ कुछ जाना है ठीक से पहाड़ को… अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है… सफ़र ज़ारी है अभी…!!!
    Story By Jyotsana Pradhan Khatri
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