‘जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जनम्याई नई’ | Doonited.India

June 17, 2019

Breaking News

‘जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जनम्याई नई’

‘जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जनम्याई नई’
Photo Credit To जयदेव भट्टाचार्य
Want create site? Find Free WordPress Themes and plugins.

शुक्रवार की शाम देहरादून नगर निगम ऑडिटोरियम एक और शानदार प्रस्तुति का गवाह बना। दर्शकों से खचाखच भरे ऑडिटोरियम में संभव मंच परिवार ने जब असगर वजाहत द्वारा लिखित और अभिषेक मेंदोला द्वारा निर्देशित नाटक ‘जिस लाहौर नी वेख्या वो जम्या ही नईं’ प्रस्तुत किया तो लगातार तालियां बजती रही।

By त्रिलोचन भट्ट, PC: जयदेव भट्टाचार्य

यूं तो यह नाटक अब तक विभिन्न नाट्य ग्रुपों द्वारा, अलग-अलग जगहों पर, हजारों बार मंचित किया जा चुका है लेकिन हर बार यह नाटक कुछ ना कुछ खास छोड़ने में सफल रहा है। मंच सज्जा, रूप सज्जा, संवाद अदायगी और कलाकारों की परिपक्वता आज एक बार फिर विभाजन की विभीषिका को जीवंत करने में सफल रही। सांप्रदायिक उन्माद में जकड़े आज के दौर में यह प्रस्तुति पूरी तरह समसामयिक प्रतीत हुई।

अंतराल के दौरान हेमा पंत, सतीश धौलाखंडी, सोनिया गैरोला, संजय गैरोला और अभिमन्यु मेंदोला की आवाज ने जादू बिखेरा। पर्दे के पीछे रहकर नीलम रतूड़ी, मोहित कुमार, सुरेंद्र भंडारी, अमिता आर्य, विजय शर्मा, अजय भटनागर, प्रेम कुमार, केतन प्रकाश, गीता गैरोला और अजय जोशी ने जो मेहनत की वह इस प्रस्तुति को साकार करने में सहायक सिद्ध हुई। समदर्शी भटनागर कहते हैं इस शानदार प्रस्तुति को देखने के बाद मैं लगातार इस सोच से गुजर रहा हूँ, कि आज के दौर में हमें मजहबों के बीच की दीवार को गिरा देने का काम करना है या तमाम मजहबों की झूठ की बुनियाद को ही खोद डालना चाहिए।

जाने-माने नाटककार अजगर वजाहत के लिखे चर्चित नाटक ‘जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जनम्याई नई’ के मंचन ने कौमी एकता और मजहबी भाईचारे का पैगाम दिया। संभव मंच के रंगकर्मियों ने नगर निगम सभागार में देर शाम हुई प्रस्तुति दिवंगत कैबीनेट मंत्री प्रकाश पंत और रंगकर्मी मनोज शर्मा को समर्पित की। अभिषेक मैंदोला के निर्देशित नाटक की कहानी देश के बंटवारे और उसके बाद पैदा हुई परिस्थितियों पर है। सिकंदर मिर्जा (नवनीत गैरोला) और हमीदा बेगम (मिताली पुनेठा) खुश हैं कि बंटवारे के बाद आखिरकार उसके परिवार को शरणार्थी शिविर से आजादी मिल गई। लाहौर में उसे हवेली रहने को दी गई है, लेकिन ये क्या, हवेली में तो अभी भी एक बुढ़िया रह रही है। वो रतन की मां (कुसुम पंत) है। जिसके बेटे और परिवार दंगे में मारे जा चुके हैं। ये हवेली उसी की है, लेकिन वह न हवेली छोड़ना चाहती है न ही ‘हिन्दुस्तान’ जाना चाहती है।

Kusum Pant
Kusum Pant

सिकंदर मिर्जा को बुढ़िया बोझ सी लगती है और वह किसी तरह उसे हवेली से रुखसत करना चाहता है। रोज तकरार होती है और इस तकरार के बीच पनपने लगता है एक रिश्ता। बुढ़िया को सिकंदर मिर्जा के बच्चों में अपना परिवार दिखने लगता है तो सिकंदर मिर्जा को बुढ़िया में अपने घर की बड़ी बुजुर्ग।  कट्टरपंथियों को ये प्यार मोहब्बत चुभने लगती है। वो हवेली पर कब्जे की कोशिश करते हैं, लेकिन उन्हें मायूसी हाथ लगती है। जब बुढ़िया की मौत होती है तो सारा लाहौर उसकी मय्यत में उमड़ आता है। एक मौलवी हिन्दू रीति-रिवाज से बुढ़िया का अंतिम संस्कार कराता है। नाटक का सशक्त पक्ष प्रमुख कलाकारों का भावपूर्ण अभिनय था, जिसमें आंखों से आंसू टपकने की भरपूर संभावनाएं रहीं। नाटक खत्म होने पर देर तक तालियों से हाल गूंजता रहा। नाटक में आरती शाह, अभिनव चौहान, कमल पाठक, भूपेन्द्र तनेजा, राहत खान, अनिल दत्त, प्रदीप शर्मा, प्रीति पटवाल, तौसीफ अहमद, राहुल जोवियर, सार्थक नेगी, प्रशांत सक्सेना, अंकित चौहान, सतीश धौलाखंडी, संजय गैरोला, अभिमन्यु मैंदोला ने शानदार अभिनय किया।

Did you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.

Post source : त्रिलोचन भट्ट

Related posts

error: Be Positive Be United
%d bloggers like this: