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34वें राष्ट्रीय खेलों में मेडल दिलाने वाली कराटे चैंपियन बिटिया बेच रही हड़िया

34वें राष्ट्रीय खेलों में मेडल दिलाने वाली कराटे चैंपियन बिटिया बेच रही हड़िया
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 विमला मुंडा ने 34वें नेशनल गेम्स में सिल्वर मेडल दिलाकर झारखंड का सम्मान बढ़ाया. अक्षय कुमार ने इंटरनेशनल कराटे टूर्नामेंट में 2 गोल्ड मेडल जीत अपना लोहा मनवाया. रांची की रहने वाली विमला कराटे टूर्नामेंट में कान-नाक और हाथ भी टूट चुका है. इनके पास 100 से ज्यादा मेडल और कई सर्टिफिकेट भी है. आर्थिक बदहाली के कारण बेच रही है हड़िया (राइस बियर) सरकार के वादे के अनुसार देनी थी नौकरी कई साल हो गए. कोई सुध लेने भी तक नहीं पहुंचा.

हड़िया बेचना रोजी-रोटी के लिए विवशता

विमला का हड़िया बेचना अब विवशता है. कराटे की प्रैक्टिस पर भी असर पड़ रहा है. मां दूसरे के खेतों में काम करती हैं. पिता फिजिकली फिट नहीं हैं. ऐसे में मेडलों को निहारने की बजाये उन्हें बक्से में बंद कर दिया है.विमला कांके के पतरागोंदा में अपने नाना-नानी के साथ रहती हैं. वहीं विमला की मां ने बताया की विमला को पढ़ाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी है. कुछ नहीं हुआ तो आजीविका चलाने के लिए हड़िया बेचना मजबूरी है. खेल विभाग ने अक्टूबर-नवंबर 2019 में नेशनल इंटरनेशनल मेडल विजेताओं के लिये खेल कोटे से सीधी नियुक्ति के लिये विज्ञापन जारी किया था. कई प्लेयर्स ने आवेदन किये थे. विभाग ने इस साल फरवरी में फाइनली 34 खिलाडियों को शॉर्टलिस्टेड किया गया था. जानकारी के अनुसार खेल निदेशालय ने कुछ दिनों पहले इससे संबंधित फाइल को विभागीय सचिव के पास बढ़ा दिया है.



झारखंड में खेल के क्षेत्र में प्रतिभा की कमी नहीं है, कई प्रतिभावानों की प्रतिभा पैसे के आभाव और सरकारी उपेक्षाओं के कारण दम तोड़ देती है. राजधानी रांची के कांके में एक ऐसी प्रतिभा रहती है, जो कराटे में सिर्फ ब्लैक बेल्ट ही नहीं बल्कि नेशनल गोल्ड मेडलिस्ट भी है. लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि अपनी राजधानी में रहने वाली यह प्रतिभा की धनी खिलाड़ी मजबूरी और बेबसी में जिंदगी गुजार रही है. आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण विमला जैसी नेशनल प्लेयर आज हड़िया (राइस बियर) बेच कर अपना और अपने परिवार का ख्याल रख रही हैं.

विमला मुंडा वैसे तो साल 2008 से ही टूर्नामेंट खेल रही हैं. इसी साल डिस्ट्रिक्ट लेवल पर इन्होंने मेडल अपने नाम किया था. इसके बाद 2009 में ओडिशा में भी पदक विजेता रहीं. 34वें नेशनल गेम्स में विमला ने सिल्वर मेडल जीत कर राज्य का मान बढ़ाया तो वहीं अक्षय कुमार इंटरनेशनल कराटे चैम्पियनशिप में इन्होंने दो गोल्ड मेडल जीत कर अपना और अपने राज्य का नाम रौशन किया. इस तरह के सैकड़ों मेडल विमला ने अपने नाम किए हैं. विमला अपने मेडल और सर्टिफिकेट देखकर भावुक हो जाती हैं. कहती हैं पहले पूरे दिन सिर्फ अपने मेडल और सर्टिफिकेट को ही निहारती रहती थी.. लेकिन जैसे सच्चाई से सामना होता गया मैंने अपने सभी मेडल और सर्टिफिकेट बक्से में रख दिए हैं.




टूर्नामेंट में कई बार विमला को चोटिल भी होना पड़ा है. फिर भी विमला टूर्नामेंट में शामिल होने से पीछे नहीं हटती. विमला की माली हालत बहुत ही खराब है. वह बचपन से ही नाना-नानी के घर पर रहकर प्रैक्टिस करती रही हैं. मां खेत में काम करती हैं और पिताजी की भी फिजिकल कंडिशन ठीक नहीं होने के कारण वे कुछ काम नहीं कर पाते हैं. नाना-नानी की भी तबीयत ठीक नहीं रहती है. आर्थिक बदहाली के कारण विमला को हड़िया बेचना पड़ रहा है.

खेल विभाग ने अक्टूबर-नवंबर 2019 में नेशनल मेडल विजेताओं के लिए खेल कोटे से सीधी नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया था. जिसमें कई प्लेयर्स ने आवेदन किये थे. विभाग की ओर से इसी साल फरवरी में 34 खिलाड़ियों को शॉर्टलिस्ट किया गया था. इसके बाद संबंधित फाइल ठंडे बस्ते में चली गई है.

सरकार किसी भी पार्टी की हो, जनता को सिर्फ आश्वासन ही मिलता है. राज्य में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है. लेकिन उस प्रतिभा को सम्मान नहीं दिया जाता है. यहां खेल को तो महत्व दिया जाता है.. लेकिन खिलाडि़यों को नजरअंदाज कर दिया जाता है. खिलाडि़यों को आर्थिक मदद, नौकरी व अन्य सम्मान देने का वादा तो होता है. लेकिन सरकार कुछ ही दिनों में अपने वादे भी भूल जाती है. उसके बाद खिलाड़ी सिस्टम और सरकार को जगाते रहते हैं, लेकिन सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ता.



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