August 04, 2021

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जयशंकर प्रसाद: एक युगप्रवर्तक लेखक

जयशंकर प्रसाद: एक युगप्रवर्तक लेखक

30 जनवरी, 1889 को वाराणसी, उत्तर प्रदेश में पैदा हुए, जयशंकर प्रसाद आधुनिक हिंदी साहित्य के पिता-व्यक्ति की तरह थे। उनके महावाक्य (महाकाव्य कविता) (कामायनी को एक विशेष उल्लेख की आवश्यकता है। कविता में मानवीय प्रेम को खूबसूरती से दर्शाया गया है। जयशंकर प्रसाद की कविता की रेंज रोमांटिक से देशभक्ति से अलग थी। प्रसाद वेदों से गहरे प्रभावित थे। 14 जनवरी, 1937 को उनका निधन हो गया।

वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्होंने हिन्दी काव्य में एक तरह से छायावाद की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ीबोली के काव्य में न केवल कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई, बल्कि जीवन के सूक्ष्म एवं व्यापक आयामों के चित्रण की शक्ति भी संचित हुई और कामायनी तक पहुँचकर वह काव्य प्रेरक शक्तिकाव्य के रूप में भी प्रतिष्ठित हो गया। बाद के, प्रगतिशील एवं नयी कविता दोनों धाराओं के, प्रमुख आलोचकों ने उसकी इस शक्तिमत्ता को स्वीकृति दी। इसका एक अतिरिक्त प्रभाव यह भी हुआ कि ‘खड़ीबोली’ हिन्दी काव्य की निर्विवाद सिद्ध भाषा बन गयी।

आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में इनके कृतित्व का गौरव अक्षुण्ण है। वे एक युगप्रवर्तक लेखक थे जिन्होंने एक ही साथ कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिन्दी को गौरवान्वित होने योग्य कृतियाँ दीं। कवि के रूप में वे निराला, पन्त, महादेवी के साथ छायावाद के प्रमुख स्तम्भ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

प्रसाद की काव्य रचनाएँ दो वर्गो में विभक्त है: काव्यपथ अनुसंधान की रचनाएँ और रससिद्ध रचनाएँ। ‘चित्राधार’ से लेकर ‘झरना’ तक प्रथम वर्ग की रचनाएँ हैं, जबकि ‘आँसू’, ‘लहर’ तथा ‘कामायनी’ दूसरे वर्ग की रचनाएँ हैं। उन्होंने काव्यरचना ब्रजभाषा में आरम्भ की और धीर-धीरे खड़ीबोली को अपनाते हुए इस भाँति अग्रसर हुए कि खड़ी बोली के मूर्धन्य कवियों में उनकी गणना की जाने लगी और वे युगप्रवर्तक कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

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