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April 25, 2019

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वैश्विक चुनौतियों के समाधान को अपनी प्रतिबद्धता के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा मिली

वैश्विक चुनौतियों के समाधान को अपनी प्रतिबद्धता के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा मिली
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देहरादून: भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद ने वैश्विक चुनौतियों के समाधान हेतु अपनी प्रतिबद्धता के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा प्राप्त की।

नेपाल में स्थित एकीकृत पर्वत विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (आईसीआईएमओडी) और भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई), देहरादून ने 2015 के दौरान रेड हिमालय में रेड प्लस के क्रियान्वयन में अनुभव के विकास और उपयोग पर एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था।

यह परियोजना हाल ही में पूरी हुई है। डेविड मौलदीन, महानिदेशक, आईसीआईएमओडी ने इसकी सराहना की और रेड प्लस हिमालय के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन के लिए आईसीआईएमओडी और भा.वा.अ.शि.प. के बीच हुई साझेदारी के लिए डॉ. सुरेश गैरोला, महानिदेशक, भा.वा.अ.शि.प. को बधाई दी।

उन्होंने वैश्विक चुनौती को संबोधित करने के लिए परिषद के उच्च स्तर की प्रतिबद्धता की सराहना की। उन्होंने कहा कि वनों की कटाई और जंगल की कटाई की समस्या को दूर करने के लिए पूरे क्षेत्र में एक ठोस प्रयास की आवश्यकता है और आईसीआईएमओडी हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र के वानिकी क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार करने के लिए भा.वा.अ.शि.प. के साथ इस तरह की साझेदारी हेतु इच्छुक है।

इस साझेदारी के माध्यम से, भा.वा.अ.शि.प. केवल भारत में ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर भी रेड उपकरण के विकास में उल्लेखनीय योगदान देने में सक्षम हुआ है। परिषद ने राष्ट्रीय रेड प्लस कार्यनीति की तैयारी प्रक्रिया में भारत सरकार की सहायता करने में मुख्य भूमिका निभाई है। यह कार्यनीति देश में वानिकी क्षेत्र की शमन क्षमता को बेहतर ढंग से तलाश कर रेड़ को लागू करने की भारत सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

राज्य स्तर पर राष्ट्रीय रेड प्लस कार्यनीति को लागू करने के लिए, मिजोरम और उत्तराखंड के वन विभागों के लिए परिषद के समर्थन के द्वारा राज्य रेड़ कार्य योजना तैयार किए गए थें। परिषद ने भारतीय हिमालयी राज्यों में रेड प्लस से संबंधित प्रशिक्षण आयोजित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे कि इस वैश्विक नीति में विभिन्न स्तर के हितधारकों को सक्षम बनाया जा सके। अब सभी पूर्वोत्तर राज्यों में रेड प्लस के लिए केंद्र बिंदु हैं।

क्षेत्रीय स्तर पर दक्षिणी-एशिया अधिगम मंच के जरिए भा.वा.अ.शि.प. ने नेपाल, भूटान, एवं म्यांमार के वानिकी कार्मिकों हेतु क्षमता निर्माण प्रशिक्षण का सह-संयोजन भी किया है। हिंदू कुश हिमालयी और एशिया-पेसिफिक देशों के बीच वन संदर्भ स्तर (एफआरएल) पर प्रशिक्षण एक मील का पत्थर साबित हुआ जिससे हिंदू कुश हिमालयी देशों को वन संदर्भ स्तर विकास प्रक्रिया में शामिल होने का मौका मिला। भा.वा.अ.शि.प. ने भारतीय अनुभवों पर आधारित बहुत सी शोध लेख भी प्रकाशित की हैं, इनमें से बहुत से दस्तावेज आज अन्य देशों की मार्गदर्शिका बन गई हैं।

डा0 सुरेश गैरोला, महानिदेशक, भा.वा.अ.शि.प. ने कहा कि भारत के लिए राष्ट्रीय रेड प्लस कार्यनीतियां पूर्व से ही जारी की जा चुकी हैं। वनों की कटाई और वन क्षरण से उत्सर्जन को कम करना, वन कार्बन स्टॉक का संरक्षण, वनों का सतत प्रबंधन और विकासशील देशों में वन कार्बन स्टॉक में वृद्धि (सामूहिक रूप से जिन्हें रेड प्लस के रूप में जाना जाता है) का उद्देश्य वन संरक्षण को प्रोत्साहित करके जलवायु परिवर्तन शमन प्राप्त करना है।

जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौता भी जलवायु परिवर्तन शमन में वनों की भूमिका को स्वीकार करता है और सहयोगी देशों से रेड प्लस को समर्थन एवं उसे लागू करने के लिए कार्रवाई का आह्वान करता है। डा. गैरोला ने आगे कहा कि स्वस्थ पर्यावरण, स्थानीय समुदायों की सतत् आजीविका तथा जैव विविधता के संरक्षण के लिए वनों की सलामती आवश्यक है।

रेड प्लस भारत जैसे विकासशील देशों में अत्यधिक ध्यान दिया जा रहा है जहां स्थानीय समुदाय, वनवासी जनजातियां उनकी आजीविका हेतु वनों पर ज्यादातर निर्भर है। यह कार्यनीति स्थानीय स्तर पर प्रभारी का नेतृत्व करने के लिए सामुदायिक वनपाल के रूप में युवा संवर्गों के सशक्तिकरण का समर्थन करेगी।

डा. सुरेश गैरौला ने परियोजना को सफलतापूर्वक सहयोग एवं क्रियान्वयन के लिए भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद की परियोजना टीम के द्वारा किए गए प्रयासों की भी जानकारी ली जिसे अंतराष्ट्रीय एजेंसियों ने सराहना की।

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