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भारत अब चीन को जैसा को तैसा वाले अंदाज में जवाब दे रहा है

भारत अब चीन को जैसा को तैसा वाले अंदाज में जवाब दे रहा है
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 अमेरिका ने भी चीन के खिलाफ भारत के पक्ष में मुनादी कर ही है। कोरोना संकट के बीच चीन को व्यापार और सामरिक मामले में भारत से जबर्दस्त चुनौती मिल रही है। चीन में कारखाना चला रहीं कई बहुर्राष्ट्रीय कंपनियां अब भारत में शिफ्ट हो रहीं है। दूसरी तरफ सीमा पर भी भारत, चीन को मुंहतोड़ जवाब दे रहा है। इससे चीन बौखलाया हुआ है। सिक्किम और लद्दाख की सीमा पर जब चीनी सैनिकों ने जमावड़ा लगाया तो भारत ने भी उन इलाकों में अपने तंबू गाड़ दिये।

5 मई को लद्दाख सीमा से लगे अक्साई चीन के पेंगौंग झील के पास भारत और चीनी सैनिकों के बीच लाठी-डंडे और रॉड से झड़प हो चुकी है। इस घटना में दोनों देशों के सौनिक घायल हुए थे। फिर 9 मई के सिक्कम इलाके में नाकुला दर्रे के पास भारत और चीन के सैनिकों में दूसरी बार मारपीट हुई। इस हमले में दोनों तरफ से करीब 10 सैनिक घायल हुए थे। इसके बाद सीमा पर तनाव बढ़ने लगा। फिलहाल अक्साई चिन की गालवन घाटी तनाव का केन्द्र बनी हुई है। यहां लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के पास भारत ने सैनिक गतिविधिय़ां बढ़ा दी हैं। अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बीच चीन, भारत के आक्रामक रवैये से तिममिलाया हुआ है।




चीन धौंस दिखाने की स्थिति में नहीं

क्या कोरोना पर हो रही किरकिरी से ध्यान भटकाने के लिए चीन सीमा विवाद को हवा दे रहा है ? अमेरिकी विदेश मंत्रालय के दक्षिण और पश्चिम एशिया विभाग की प्रमुख एलिस वेल्स ने कहा है चीन के उकसाने वाले रवैये से अमेरिका, भारत, आस्ट्रेलिया और आशियान के देश एक साथ आ गये हैं। भारतीय सीमा हो या दक्षिण चीन सागर की घटना, चीन से असल खतरा अतिक्रमण का ही है। चीन की उकसाने वाली हरकतों से तनाव बढ़ रहा है। ये खतरे चीन के प्रति अगाह करते हैं। अब पूरी दुनिया में चीन के इरादों पर चर्चा होने लगी है। अमेरिका के इस समर्थन से भारत की समारिक स्थिति मजबूत हो गयी है। 2017 के डोकलाम विवाद के समय भारत चीन, के खिलाफ अकेला पड़ गया था। लेकिन अब गालवन घाटी के मामले में स्थिति बदल गयी है। कोरोना संकट ने अमेरिका को भारत के करीब ला दिया है। चीन अब धौंस दिखाने की स्थिति में नहीं है।

तनाव का केन्द्र गालवन घाटी

‘अक्साईचिन’ भारत के उत्तर पश्चिम में स्थित एक पठार है। यहां ‘चिन’ शब्द का अर्थ सफेद रेगिस्तान से है जो खितनी भाषा से निकला है। भारत इस इलाके को प्राचीन जम्मू कश्मीर राज्य का उत्तर पूर्वी हिस्सा मानता है। यह एक निर्जन स्थान है और यहां वर्षा नहीं होती। बारिश इस लिए नहीं होती क्यों कि हिमालय और अन्य पर्वत मानसून की हवाओं को रोक देते हैं। अक्साई चीन पर चीन भी अपना दावा करता रहा है। ब्रिटिश भारत के समय 1865 में सर्वे ऑफ इंडिया के अधिकारी जॉनसन ने चीन के साथ विभाजक रेखा खींची थी जिसे जॉनसन लाइन कहा जाता है।

जॉनसन लाइन के मुताबिक तब अक्साई चिन भारत के जम्मू कश्मीर का हिस्सा था। 1947 में आजादी के बाद भारत ने जॉनसन लाइन को ही सीमा रेखा माना। लेकिन चीन ने कभी जॉनसन लाइन को स्वीकार नहीं किया। 1958 में ही चीन शिनझियांग से तिब्बत तक सड़क बना कर अक्साई चीन को हड़प लिया था। 1962 की लड़ाई के बाद तो उसने अक्साई चिन पर अवैध कब्जा जमा लिया। अभी जो गालवन घाटी चर्चा में है वह अक्साई चिन इलाके में ही है। गालवन घाटी के पास ही लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल है जो भारत के लद्दाख और अक्साई चिन को अलग करता है। 1962 में यही गालवन घाटी लड़ाई की मुख्य भूमि थी। 2020 में भी यहां सैनिक गतिविधियां बढ़ने से भारत में-चीन में नया तनाव निर्मित हुआ है।




चीनी सीमा तक भारत की पहुंच बढ़ी

हाल ही भारत का पता चला कि गालवन घाटी में चीनी सैनिकों ने बड़ी संख्या में तंबू बनाये हैं तो वह सतर्क हो गया। इसके भारत ने लद्दाख के पैंगोंग सो झील के पास अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा दी। भारतीय सैनिक अपनी सीमा पर लगातार गश्ती कर रहे हैं। जब लद्दाख में वास्विक नियंत्रण रेखा के पास चीनी सेना के लड़ाकू विमान मंडराने लगे तो भारत ने वहां सुखोई विमान तैनात कर दिये। तब जा कर चीनी विमान वहां से भागे। भारत का कहना है कि वह अपनी सीमा में सैनिक गश्त कर रहा है लेकिन चीन में इसमें बाधा डाल रहा है। गालवन घाटी भारत के लिए सामरिक रूप से बहुत अहम है। यह क्षेत्र पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, चीन के शिनझियांग और भारत के लद्दाख की सीमा से सटा हुआ है।

भारत अब इस इलाके पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है क्यों उसे चीन और पाकिस्तान ,दोनों से खतरा है। हाल के दिनों में भारत ने चीनी की सीमा से लगे क्षेत्रों में 44 नयी सड़क परियोजनाएं शुरू की हैं। इनमें से कुछ सड़कें बन गयीं है और कुछ का निर्माण जारी है। भारत ने इसी महीने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ से लेपुलेख तक सड़क बनायी है जो चीन की सीमा तक जाती है। हालांकि कि यह सड़क कैलाश मानसरोवर जाने के लिए बनायी गयी लेकिन इसका सामरिक महत्व भी है। अपनी सीमा तक भारत की बढ़ती पहुंच से चीन विचलित हो गया है। चीन यह भली भांति समझ रहा है कि भारत अब 1962 वाला भारत नहीं है। ऐसे में उसका बेचैन होना लाजिमी है।




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Post source : Agency

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