हार नहीं मानूंगा Book Review by मीनाक्षी Doonited News
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हार नहीं मानूंगा Book Review by मीनाक्षी 

हार नहीं मानूंगा Book Review by मीनाक्षी 
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लेखक: विजय त्रिवेदी  

मूल्य: रु. 399 (पेपर बैक) 
हार्पर हिंदी

हार नहीं मानूंगा पिछले दिनों की सबसे चर्चित किताबों में एक रही है. यह भारतीय राजनीति के सबसे चमकीले सितारों में रहे भारतीय जनता पार्टी के शिखर पुरुष और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जीवनी है. हाल के कुछ वर्षों को छोड़ दें तो वाजपेयी भारतीय राजनीति में हमेशा प्रासंगिक रहे हैं. कुल १३ अध्यायों में हिंदुत्व के सबसे स्वीकार्य चेहरे अटल की जीवनगाथा को समेटनेवाले वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने देश के कई नेताओं और जाने-माने पत्रकारों के हवाले से उनके जीवन के कई पहलुओं पर रौशनी डाली है. हार नहीं मानूंगा में अटल बिहारी वाजपेयी के राजनैतिक सफ़र के संग चलते हुए आपको भारतीय राजनीति के एक लंबे अध्याय से गुज़रने मिलता है. 

जनसंघ से राजनीति शुरू करनेवाले अटल आपातकाल के बाद जयप्रकाश नारायण के आग्रह पर जनसंघ का जनता पार्टी में विलय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. जनता पार्टी का प्रयोग असफल होने के बाद जनसंघ के दूसरे अवतार यानी भाजपा को नई ऊंचाई पर ले जाने का काम लालकृष्ण आडवाणी के साथ मिलकर करते हैं. वाजपेयी और आडवाणी के आपसी संबंधों पर लेखक ने तफ़सील से लिखा है. बीच-बीच में भाजपा के मौजूदा नेतृत्व को पार्टी की पिछली पीढ़ी से कुछ सीखने की सलाह भी दी है.

बाबरी मस्जिद कांड के बाद राजनीतिक रूप से अछूत बनी बीजेपी से विभिन्न विचारधारावाली क्षेत्रीय पार्टियों को जोड़ने में वाजपेयी के सेक्युलर चेहरे की बड़ी भूमिका रही है. परमाणु परीक्षण का बड़ा निर्णय, कश्मीर समस्या सुलझाने की वाजपेयी की पहल, पाकिस्तान से संबंध बेहतर करने की कोशिशें, कांधार विमान अपहरण, संसद पर आतंकी हमला जैसी बड़ी घटनाएं इस जीवनी में विस्तृत विवरण के साथ मौजूद हैं.

अपनी राय स्पष्टता से रखनेवाले वाजपेयी, कई बार असहमत होते हुए भी सामूहिक नेतृत्व के फ़ैसले का अनुसरण करते थे. गुजरात दंगों के बाद मुख्यमंत्री मोदी को राजधर्म के पालन का संदेश देनेवाले वाजपेयी ही थे, हालांकि उन्होंने उनके ख़िलाफ़ कोई ठोस स्टैंड नहीं लिया. वाजपेयी के निजी जीवन की कई बातें भी पाठक जानेंगे. उनके प्रेम प्रसंग और शराब, मांसाहार और यहां तक कि गौमांस खाने से भी परहेज़ न करने का ज़िक्र भी इस किताब में है. पाठक यह भी जानेंगे कि अटल बिहारी वाजपेयी क्यों सभी राजनैतिक दलों और विचारधारों के लोगों द्वारा पसंद किए जाते रहे हैं? आपके दिमाग़ में यह सवाल भी कौंध सकता है, क्या वाक़ई अटल बिहारी ग़लत पार्टी के साथ थे?

यह पुस्तक केंद्र में पांच वर्ष सरकार चलाकर गठबंधन सरकार चलाने की मिसाल कायम करनेवाले पहले ग़ैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जीवन गाथा ही नहीं है, भारतीय लोकतंत्र को समझने की दृष्टि से भी एक ज़रूरी दस्तावेज़ है.




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Post source : हार्पर हिंदी 

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