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मैं उत्तराखंड बोल रहा हूँ, मैं उदास हूँ, परेशान हूँ, बेचैन हूँ…

मैं उत्तराखंड बोल रहा हूँ, मैं उदास हूँ, परेशान हूँ, बेचैन हूँ…
Photo Credit To Divyanshu Bahuguna
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मैं उत्तराखंड बोल रहा हूँ। हाँ!

सही पहचाना मैं वही हूँ जिसके लिए मेरे अपने मुझ से दूर हो गये क्योंकि मेरे जन्म के लिए उन्होंने जो संघर्ष किया, जिस कारण उन्हें अपने प्राण देंने पड़े। अपने जन्म के लिए जो लड़ाई मैंने लड़ी उसके लिए मैं कभी पीछे नहीं हटा मैंने लाठियाँ खाईं। सीने पर गोली भी मैंने ही खायी और आखिरकर 9-Nov-2000 को मेरा जन्म हो ही गया। मैं हूँ  आपका अपना उत्तराखंड समय के साथ मेरा नाम भी बदल गया पहले उत्तरांचल फिर उत्तराखंड।

मुझे बहुत हर्ष था कि मेरे अपने लोगों अब मेरे नाम से एक अलग पहचान मिल गई थी।लेकिन मेरी इस ख़ुशी को जैसे किसी की नजर लग गई हो जैसे जैसे में बड़ा हुआ मेरे अपने मुझे छोड़ कर जाने लगें शुरुआत में तो कभी कभी वार-त्यौहार में आप लोगो के दर्शन हो भी जाते थे लेकिन आज मैं 19 साल बाद अकेला हो गया हूँ। आज मैं परेशान हूँ, बेचैन हूँ, निराश हूँ आज मुझे पलायन की बीमारी नें दीमक की तरह खोकला कर दिया है। हाँ ये वो ही पलायन है जिसने मुझे मेरे अपनो से दूर किया आज मैं आप सब से पूछना चाहता हूँ कि क्या आपने जन्म इसीलिए किया था कि आप लोग मुझे अपने से दूर कर देंगे?आज मुझे अफ़सोस है तो इस बात का कि जिस कारण शहीदों ने अपने प्राणों की आहुति मुझे बनाने को दी थी आज मेरे अपने उस पर बात करने को तैयार नहीं हैं,खुद पर बहुत नाज़ है मुझे और हो भी क्यों ना आज देश विदशों में मुझे मेरे प्राकृतिक सौंदर्य, साफ आबो हवा जो हर बीमारी से लड़ने का दम रखती हैं तभी तो आज आप लोग इस कोरोना महामारी के चलते मेरे वापिस लौट आएं हैं।

मेरी सुंदरता के लिए ही तो में देश और दुनिया मे जाना जाता हूँ, मेरे पहाड़ सूर्य की किरणे जब इन पर पड़ती है तो इनकी सुंदरता दोगुनी हो जाती है मेरे हरे भरे बुग्याल जो प्रकृति मखमली गोद में जिसका मनोरम दृश्य आँखों के साथ मन को भी सुकून का एहसास करतें है।भगवान शिव भी मुझ में बसते हैं। माँ गंगोत्री, यमनोत्री भी मुझ से ही निकलती है। हज़ारों करोड़ों देवी देवताओं का वास भी मुझ में ही हैं तभी तो मुझे देव भूमि भी बुलाया जाता है।ऐसे वीरों को जन्म देता हूँ मैं जो देश के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर देते हैं वीरों की भूमि भी हूँ मैं, लेकिन आज 19 साल बाद भी इतना सब मेरे पास होने के बाद भी मैं उदास हूँ, परेशान हूँ, बेचैन हूँ आखिर क्यों? सब कुछ तो है मेरे पास नहीं शायद सब कुछ नहीं ना पहाड़ का पानी ना पहाड़ की जवानी बुनयादी सुख सुविधाओं के लिए आज भी संघर्ष कर रहा हूँ।




अलग राज्य को जो संघर्ष मेरे अपनों ने किया था वो संघर्ष वहीं पे खत्म नहीं था आज सुख सुविधाओं के लिए आज भी मेरे अपने संघर्ष कर रहे हैं।अलग राज्य बनने के बाद मैंने जो सपने देखे थे, सपने विकास के, सपने शिक्षा के, सपने अच्छी चिकित्सा सुविधाओं के, सपने पलायन रुकने के, सपना एक विकास से बना उत्तराखंड का मैंने देखा था लेकिन आज 19 साल बाद भी मुझे मिला तो मिला क्या? जो सपने मैने देखें थे वो आज सपने ही बने क्यों रह गये?ये जो नेता मेरा नेतृत्व कर रहें हैं ये भी मेरे अपने बेटे,भेजी,भुला हैं,लेकिन उनको भी मेरी परेशानी मेरे उदास होने का कारण पता होने के बाद भी उन्हें सही नहीं किया इसी लिए आज मैं बेचैन हूँ परेशान हूँ।

अगर आज में पलट कर देखूं तो वो दर्द भरी यादें आज भी उन जख्मों को याद दिलाती हैं वो 1 सितम्बर, 1994 खटीमा गोली कांड जब वीरों ने  गोली खाई,वो एक अक्टूबर 1994 को जब मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पे मेरी माताओं,बहन, बेटियों की आबरू के साथ खेला गया, वो दो सितंबर 1994 को मसूरी गोली कांड, सब कुछ याद हैं मुझे भूला नहीं हूँ मैं कुछ भी लेकिन आज मेरे अपने उन पर बात करने को तैयार नहीं उन वीरों को भुला दिया गया हैं, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति मेरे लिए दी थी आज मैं आप से सवाल करना चाहता हूँ कि क्या किसी को वो याद हैं क्या उनका संगर्ष उन्हें याद हैं क्या उनके नाम किसी को याद हैं? शायद नहीं।

 

एक दाग सब कुछ खत्म कर देता है,दाग पलायन का जो मेरे अपनो ने मुझे दिया है। मैं हर रोज आपकी राह देखता हूँ कि कभी तो दरवाजों पे लगे ताले खुलेंगे लेकिन हर दिन इसी सोच के साथ गुजार लेता हूँ। मेरे वो सुंदर गाँव जहाँ सब बच्चे बड़े या बूढ़े सब मिल कर वार-त्यौहार को मनाया करते थे वो आज खाली हो गये हैं पहाड़ का पानी और पहाड़ का पानी को पहाड़ में ही रोका जा रहा है इन कोरे वादों से थक गया हूँ मैं। आज मेरे खेत और मेरी सुंदरता खत्म होती जा रही है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि जितना पलायन देश की आजादी के बाद राज्य बनने तक नहीं हुआ उसे कई जायद इन 19 सालों में हो गया विकास हुआ तो है लेकिन सत्ता के गलियारों में वो विकास की किरण देहरादून से निकल कर देहरादून तक ही सिमट जाती हैं ये विकास की ऊंची किरण मेरे डाँडो कांठो तक नहीं पहुँची।

हर साल भूस्खलन,बादल फटना जैसी दैवीय आपदा से मैं खत्म होते जा रहा हूँ वो 2013 के केदारनाथ जैसी आपदा से भी मैं चुप चाप लड़ा हूँ इस उम्मीद के साथ कि इस आपदा के बाद तो शायद सब जाग जाएंगे और मुझे बचा लेंगे। समझ जाएंगे कि विकास के लिए मुझ से छेड़ छाड़ ठीक नहीं लेकिन  वो न समझे, न जाने, मुझ से निकली मोक्षदायिनी नदियाँ जो देश भर को अपना प्रवित्र गंगाजल दें रही हैं आज वो मैली होती जा रहीं हैं। मैं उदास हूँ आज मैं खुद को ढूंढ रहा हूँ। हो सके तो मुझे बचा लो क्योंकि तरक़्क़ी की सुनहरी इबारत का पहाड़ में लिखा जाना अभी बाकी हैं।
आज भले ही कोरोना महामारी के कारण एक भय बना हुआ हैं लेकिन मुझे ख़ुशी इस बात हैं कि इस दुःख की घड़ी में मैं आपके काम तो आ रहा हूँ। 
आपका अपना उत्तराखंड।।


Written By : Divyanshu Bahuguna

छात्रसंघ अध्यक्ष 2014-2015 गढ़वाल विश्वविद्यालय
(केंद्रीय विश्वविद्यालय) श्रीनगर गढ़वाल




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Post source : Divyanshu Bahuguna

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