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Gazal by Mannu Bhatt

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चलें…

 

 

चलो  इसबार एक ऊँची उड़ान पर चलें,

चलो इस आसमान से उस आसमान पर चलें।

 

किसी ने किसी को धोखा दिया किसी ने किसी को,

कम से कम यहाँ हम तो इश्क़ के ईमान पर चलें।

 

हवा मेरा रुख बदल देना चाहती है बहुत,

मैं कहता हूँ हाथ थामें और इम्तेहान पर चलें।

 

शहर की हवाएँ जहर से कम नहीं है मानो,

चलो गाँव चलें ,अपने खेत खलिहान पर चलें।

 

इस जहान में बहुत कुछ खो चुका हूँ मैं,

जिस्म खोने के लिए चलो दूसरे जहान पर चलें।

 

चढ़ते चढ़ते कामयाबी की राह थक गए हैं पैर मेरे,

चलो अब फिर से एक बार ढलान पर चलें।

मन्नू भट्ट

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