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रिखणीखाल के बालक राम बलूदी: कहानी 1962 की…!

रिखणीखाल के बालक राम बलूदी: कहानी 1962 की…!
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आज मैं कर्णव नगरी कोटद्वार में हूँ जिस को प्रतापी भरत की नगरी भी कहा जाता है। चरक ऋषि के चरण पादुकाओं में बैठा हूँ। यह तपोभूमि वर्तमान में बाबा शिद्धबली के प्रताप से यह अपने अस्तित्व में जीवित है। कोट यानी गाँव द्वार, मतलब दरवाजा। इस ग्रामीण उत्तराखंड के दरवाजे के मुहाने पर एक मुहल्ला पड़ता है जिस का नाम है बालासोड।  बालासोड़ की पतली पगडंडी से मैं किसी खेत के तीर पर पहुंचा जहां 75 साल की एक महिला व 80 साल का एक बुज़र्ग जीवन के चौथी अवस्था में पहुंच अपने भूले बिसरी यादों की क्यारी में गुड़ाई कर रहे है।

मैं किसी के आग्रह पर नही भाव में आया हूँ। मुझे सौभाग्य मिला है कि मैं एक बीर योधा के साथ वक्त सांझा करूँ। मेरे सामने एक योद्धा बैठे है। 80 की उम्र में भी उन के चेहरे पर जवानी वाला तेज है। इस योद्धा का नाम श्री बालक राम बलूदी है।

कहानी 1939 की है जब यूनाइटेड प्रोविंस आज का उत्तरप्रदेश के पहाड़ियों में जिला पौड़ी गढ़वाल रिखणीखाल ब्लॉक पली गाँव में श्री कनैया लाल बलूदी के घर चौथे बेटे का जन्म हुआ जिस का नाम बालक राम रखा जाता है।


बालक राम बलूदी बचपन्न से ही देशभक्त से ओतप्रोत तो थे ही बड़े कर्मठ भी थे। मात्र 5 वीं तक की पढ़ाई के बाद बालक राम की शिक्षा परिवारिक कारणों से रुक गई। पिता क्षेत्र में पण्डिताई करते थे। 3 बड़े भाई 1 छोटी बहिन व दादा दाई का खर्चा ही बहुत था। तो कैसे शिक्षा का बोझ आगे खिसकता। पिता के आर्थिक माला में एक मणि ओर गूंथ जाए 18 मार्च 1960 को बालक राम कालूडांडा (लैंसडौन) से फ़ौज में भर्ती हो गए। 9 महीने की कठिन परिश्रम के बाद 4038649 राइफल मैन बालक राम को 4rth गढ़वाल रेफ़ल B कंपनी 6 प्लाटून में बिहार के रामगढ़ (अब झारखण्ड) पोस्टिंग मिली। वो दौर भारत चीन के नाजुर रिश्तों का था।

एकतरफ चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर दिया था दलाई लामा भारत आगये थे औऱ उन के भाई पंचम लामा चीन में ही बंदी हो गए थे। तिब्बत के बाद चीन की नजर भारत पर थी वो आहिस्ता आहिस्ता उत्तरप्रदेश (अब उत्तराखंड) व असम के रास्ते भारत की सीमा पर अपनी सैन्यशक्ति को मजबूत कर रहा था। उस वक्त भारत में लगभग सभी गोला बारूद के कारखने बंद थे देश राजनीति उठापटक व आर्थिक स्थिति से जूझ रहा था। चीन व भारत में एक नारा गूंज रहा था चीनी हिंदी भाई भाई मग़र यह भारत के साथ विश्वासघात था।

उसी दौरान भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने असम के नूरा नांग (अब अरुणांचल प्रदेश) में सीमा पर चौकसी बधाई और 4th गढ़वाल रेफ़ल को नूरा नांग की पहाड़ी पर भेजा गया बैच नम्बर 4038649 राइफल मैन बालक राम को भी 844 सदस्य के दल में देश सेवा का मौका मिला जिस में रिखणीखाल के अन्य जवान भी थे
राइफल मैन केशर सिंह (ग्राम खनेता)
बिहारी लाल (रोता)
धर्मा बन्द बलुदी (तलेड़ी)
केशर सिंह नेगी (भ्यांसु)
बिरोखाल के जसवंतसिंह रावत जयहरीखाल के आनंद मणि (ढंगसुण)।

बालक राम ने गढ़वाल रेफ़ल सेना में भरती होने से पहले 2 वर्ष शुभाष चंद बोष की सेना में 1958 में पोंटासहिब हिमांचल में जवान के रूप में काम किया उन्हें सेना में भर्ती होने से पूर्व युद्ध का बहुत अच्छा ज्ञान था।  07 दिसम्बर 1958 को 04th गढ़वाल राइफल बिहार के रामगढ़ से एक नारा लेकर चली थी 4 के बदले 8 चाहिए देश में ठाट बाट चाहिए…

20 अक्तू 1962 की -20 डिग्री शर्दी के साथ यह लड़ाई आरपार की सूरी हुई इस लड़ाई में 4th गढ़वाल रेफ़ल के पास मात्र 3 दिन का खाना 6 दिन का गोला बारूद था 844 जवानों की यह टुकड़ी बिना खाये पिये लगातार 21 नव॰ 1962 तक लड़ती रही। 5 ही दिन में गोलाबारी बंद हो गई क्यों कि भारत के जवानों के पास न अन्न था न बारूद। रात दिन बर्फबारी और सर्द हवाएं सैनिकों की हिम्मत को चुनोती दे रही थी। 18 नवम्बर की सुबह दोनों देशों की सेना आमने सामने बट (बंदूक का पिछला हिस्सा लकड़ी से निर्मित) की लड़ाई चली। और इस लड़ाई में खून खराबा इतना हुआ कि दोनों ओर से बराबर मौतें हुई। उसी दौरान 2nd Lmg जसवंत सिंह रावत व 1st Lmg गोपाल सिंह नेगी Lmg कमांडर त्रिलोक सिंह रावत नूरा नांग की चोटी पर फंस गए।

जिया दौरान जसवंतसिंह रावत के पैर में गोली लग गई और जसवंतसिंह ने फैसला लिया कि त्रिलोक सिंह व गोपाल सिंह वापस चले जाएं और जसवंतसिंह खुद पोस्ट तब तक सम्भाले जब तक पीछे से कोई मदद नही मिल जाती। 4th गढ़वाल 18 पोस्ट बना कर लड़ रही थी जिस में से जसवंतसिंह की पोस्ट मैकमोहन रेखा के सब से समीप थी। उन 3 जवानों को अन्य पोस्ट का कोई अंदेसा भी नही था कि आखिर क्या हो रहा है। यह क्षेत्र किसी गाँव के समीप था जहां तिब्बती लामा लोगों का बसेरा था वो लोग भी चीन से खपा थे और भारतीयों की मदद करना चाहते थे।

बालक राम जी कहते है, जसवंतसिंह पर बनी फिल्म में प्रेम और सोमांस आज की पीढ़ी का टेस्ट देख कर डाला है अन्यथा उन का या किसी भी भारतीय जवान का किसी भी महिला के साथ कोई सम्बन्ध नही रहा। लड़ाई के दौरान हम लोगों ने नूरा नांग में पोस्ट सम्भाली थी तो भला किसी ग्रामीण से प्रेम कैसे होता। जिन महिलाओं ने जसवंतसिंह को मदद किया वो दोनों सगी बहिने थे और देशभक्त थी न कि प्रेम में थी। न उन को हमारी भाषा समझ आती थी न हम को उन की भाषा समझ आती थी।

14,000 फीट ऊंचाई पर लड़ी गई इस युद्ध में जवानों का खून धरती पर गिरने से पहले जम जाता था। तापमान शून्य से नीचे पीने के लिए पानी नही खाने के लिए सिर्फ गोलियां। बालक राम जी कहते है। अगर चीन की सेना हम को मरती नही तो हम भूख प्याश के वैसे भी मर जाते।

बालक राम जी एक किस्सा सुनाते कहते है कि बिरोखाल के एक जवान जिस की उम्र तब मात्र 23 साल थी और घर में 2 महीने पहले बेटी हुई थी को मेरी आँखों के सामने काट दिया उन के छाती पर चाकू से वार किया और अधमरा छोड़ दिया वह जवान पानी मांग रहा था मगर पानी खत्म था मैंने जमीन से बर्फ उठाई उस के मुहं में डाली बस चंद पलों में उस के प्राण पखेरू निकल गए…वो मंजर याद कर के बालक राम जी आज भी सुबक जाते है।

21 नवम्बर को भारतीय सेना ने हथियार डाल दिये और 4th गढ़वाल रेफ़ल ने अपने 844 जवानों में से 622 जवान खो दिए थे। बाकी 218 जवानों को बंदी बना कर चीन अधिग्रहित तिब्बत ले गए जहां उन्हें बंकरों में रखा गया तरह तरह की यातनाएं दिए गए। खाने को अन्न नही पीने को पानी नही। हर जवान मौत मांग रहा था। वहीं शौचालय वहीं खाना वहीं पाखाना। मैकमोहन रेखा के समीप लड़ी गई यह लड़ाई जितनी आत्मसम्मान की हमारे लिए थी उतनी ही चीन के लिए भी। मग़र अचानक हुई बिस्वास्घात से भारत सम्भल नही सका।

आखिर चीन के प्रधनमंत्री झोउ एनलाई के व भारत के प्रधनमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 10 नवम्बर 1963 को एक सन्धि पर ह्नस्ताक्षर किये और 200 भारतीय जवानों को छोड़ा गया। 218 जवानों को चीन ने बंदी बना दिया था मगर 18 जवान जो जख्मी थे अपने प्राण गंवा बैठे। 17 नवम्बर 1963 को 12 km पैदल तय करने के बाद हम भारत की सीमा में आये करीब 4 घण्टे के बस के सफर के बाद हम हवाई जहाज में बैठे और रांची पहुंचे। आज भी बालक राम जी के पास वो खत मोजोद है जो उन्हों ने अपने घर भेजा था।

जवाहरलाल नेहरू के आग्रह पर चीन ने भारतीय सैनिकों को एक मौका दिया था कि वो मात्र एक खत अपने घर भेज सकता है जिस में अपनी सलामती के सिवाय कुछ नही लिखा जाएगा। बस यही लिखना है कि हम बहुत खुस है कोई दिक्कत नही और जल्दी घर आएंगे। बालक राम जी वो वाइक्या जब सुनाते है तो आँसू नही रुकते। बालक राम जी ने कहा जब मेरी चिट्ठी मेरे घर पँहुची तो घर वाले मुझे मृत्यु घोषित कर चुके थे।

भारत की सरकार हर महीने मेरे घर वालों को टेलीग्राम भेज कर कहती थी कि बालक राम ठीक है मगर मेरे घर वालों को यकीन नही होता था। बालक राम जी कहते है कि मेरी दादी सुरडी देवी की उम्र उस वक्त 90 साल की थी और सब से यही कहती थी कि मेरा पोता बालक राम जब तक घर नही आएगा मैं मरूँगी नही। जब घर में चिट्ठी आई तो सारे गाँव के सामने पत्र खुला और दादी को भी सुनाया गया दादी ने रोते हुए पत्र को छाती से लगाया और प्राण त्याग दिए। उन के घर की चौख से घेडी से भ्यांसु बारात जा रही थी। बालक राम जी के पिताजी श्री कनैया लाल ने शरैंयां ढोल वालों को अपने घर में बुलाया और बहुत देर तक खुसी मनाई।

कनैया लाल जी ने कहा मेरा बेटा घर आरहा है उस की खुसी है और मेरी माँ खुसी खुसी चली गई है उस की दुगनी खुसी है। घर आने के 1 साल बाद 1965 में बालक राम की शादी जैकोट की सुरेसी देवी से हुई जिस से उन का 1 बेटा जो दिल्ली में रहता है और 2 बेटी है। सेना मैडल से सम्मानित श्री बालक राम बलूदी आज 80 वर्ष के है। पयालन की मार ने 1994 में उन को भी पली गाँव रिखणीखाल से कोटद्वार बालासोड में लाकर बसा दिया है।

– देवेश आदमी

 

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