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‘तलाक़शुदा बेटी’ By निर्मला ‘बबली’

‘तलाक़शुदा बेटी’ By निर्मला ‘बबली’
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बेटी …….माना कि सब खुश नहीं होते इसके जन्म से मगर मानें या ना मानें घर का मान है ‘बेटी’ मान ही नही आन और शान भी ! उसकी किलकारियों से घर गूँजता है , उसकी उपस्थिती से घर में रौनक़ बनी रहती है | उसकी नन्ही उंगलियों का स्पर्श अपार हर्ष और प्यार का भाव जगाता है | उसके नन्हे क़दम और पायल कि छनछन घर में जीवन होने का एहसास दिलाते हैं कदाचित | उसके रूठते ही जीवन मानो थम सा जाता है | उसे तो देवी कि तरह पूजा जाता है | सुना है कन्यादान से बड़ा दान नहीं होता इसलिए खुशकिस्मत हैं वो जिनकी बेटियां हैं | एक वही तो है जो जन्म लेते ही ‘पराई’ समझी जाती है जबकि सच्चाई ये है कि उससे अधिक प्रेम करने वाला , समझने वाला , संवेदनशील , धैर्यवान , परिपक्व , शक्तिशाली और सहनशील की नहीं होता |




जिस बेटी से हम विदाई तक इतना प्यार और भरोसा करते हैं उसी बेटी का तलाक होते ही या किसी वजह से पति से सामंजस्य ना होने पर हम उसको सहर्ष स्वीकार क्यों नहीं कर पाते ? क्या शादी करके हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं ? क्या हमें अपनी बेटी पर भरोसा या अपनी परवरिश पे भरोसा नहीं होता ? क्या हम समाज से डरते हैं ? क्यों हम अपनी बेटी से अधिक समाज के ठेकेदारों कि परवाह करते हैं ? क्यों इक्कीसवीं सदी में इतना शिक्षित होने के बावज़ूद हम उसे स्वीकार नहीं कर पाते ?


जहाँ तक मेरी सोच जाती है इसमें सबसे अहम कारण ‘समाज ‘ है | क्यों हम समाज को और उसमें रहने वाले लोगों कि बातों को इतनी एहमियत देते हैं कि हमें अपनी बेटी का दर्द नहीं दिखता | सिर्फ इसलिए कि ‘लोग क्या कहेंगे ‘ हम उसके निर्णय या उसकी तकलीफ़ को नज़रअंदाज़ कर देते हैं | एक बेटी एक लड़की पूरी कोशिश करती है स्वयं को एक नए घर और माहौल में ढालने की , सबको समझने की , सबके हिसाब से चलने की , सबका ध्यान रखने की , सबको खुश रखने की | मायके में वो चकर चकर बोलती हो , चहकती फिरती हो , रूठती हो , बिंदास हो , आदेश देती हो , बेझिझक कुछ कहती हो या अपनी बात मनवाती हो , घूमती हो , सब कुछ अपनी इच्छा से करती हो , काम ना करती हो , देर तक जागती हो या सोती हो , अलहड़ सो हो मगर शादी के बंधन में बंधते ही और एक नए परिवार से जुड़ते ही वो काफी कुछ तो मायके के दरवाज़े पर ही छोड़ आती है |



वो नए घर में प्रवेश करते ही खुद को बदलना शुरू कर देती है वरना नई परिस्थितियाँ उसको खुद ही बदल देती हैं | इस तालमेल बिठाने और सबको समझने के कार्य में वो कई बार असफल भी होती है , दुखी भी होती है , रोती भी है , गुस्सा भी आता है , झुँझलाहट भी होती है , असहाय भी महसूस करती है – मगर कभी कोशिश करना नहीं छोड़ती क्योंकि भले ही शारीरिक तौर पे माँ -बाप साथ ना हों मगर उनकी दी हुई सीख उसको सहारा और हौंसला देती है | वो बार बार कोशिश करती है – कभी सफल होती है तो कभी असफल मगर हार नहीं मानती |


लड़की कितनी भी पढ़ी लिखी हो या आधुनिक हो वो कभी नहीं चाहेगी कि उसका घर टूटे या उसे वापस आपने मायके जाना पड़े क्योंकि वो विदाई होते ही मासूम बेटी से समझदार बेटी का सफ़र तय कर चुकी होती है | इतनी परिपक्व वो हो चुकी होती है और उसको पता होता है कि उसके किसी भी कदम या व्यवहार से बहुत लोगों पर असर होगा – खासकर उसकी अपनी ज़िन्दगी पर |
एक लड़की आपने अधूरे सपने लेकर पति के घर जाती है – जाहिर सी बात है उन सपनों के पति द्वारा पूरे किये जाने की आस होती है | अगर वो सब कुछ छोड़कर एक नए सिरे से अपनी ज़िन्दगी शुरू करने को तैयार है तो उसे भी ससुराल और पति से कुछ उम्मीदें होती हैं | ऐसे में यदि आप उसकी इच्छाओं का ध्यान नहीं रखेंगे , उसे दिल से नहीं स्वीकारेंगे , हर वक़्त ताने देंगे , उसकी परवरिश और जन्मदाताओं को कोसेंगे , उसमें कमियाँ निकालते रहेंगे , उसकी तुलना अपनों से करते रहेंगे , दहेज़ के लिए उलाहना देते रहेंगे तो आख़िर वो कब तक कोशिश करती रहेगी ? कभी तो टूटेगा उसके सब्र का बाँध |





कारण कोई भी हो अगर आपकी बेटी इतना बड़ा निर्णय ले रही है तो — उसके कारण जानिए , उसको सुनिए , उसको समझने की कोशिश करिये , समझाइए मगर सुनिए भी कि वो क्या चाहती है और क्यों | ‘ लोग क्या कहेंगे ‘ कि डर से उसको उस नरक में मत धकेलिए जहाँ से वो निकलना चाहती है | बेटी है वो आपकी , कई साल साथ बिताए हैं आपने तो अगर आप नहीं समझेंगे उसको तो कौन समझेगा , ख़ून का रिश्ता है आपका , आपके हर सुख दुःख का साक्ष्य है वो — कहीं ऐसा ना हो कि आपकी असहमती या बेरुखी उसे अपनी ज़िन्दगी ख़त्म करने पर मज़बूर कर दे | भले ही बेटियों वाले खुद को सौभाग्यशाली समझें मगर ये ‘बेटियां’ बड़ी अभागी होती हैं क्योंकि ‘उसका तो ना मायका होता है ना ससुराल ‘ वो तो बस अपना घर ढूंढ़ती रहती है | कहाँ जाये वो आखिर ? इसलिए यदि बेटी किसी वजह से वापस आपके पास आना चाहे तो खुली बाँहों से उसका स्वागत करें ना कि समाज के डर से ठुकराएं या उसकी भावनाओं का निरादर करें |

‘तलाक़शुदा बेटी’ By निर्मला ‘बबली’



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