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समीक्षा: दिल्ली था जिसका नाम

समीक्षा: दिल्ली था जिसका नाम

लेखक: इन्तिज़ार हुसैन (अनुवादक: शुभम मिश्र) मूल्य: रु. 395 (पेपर बैक) सेज पब्लिकेशन्स इंडिया  

इन्तिज़ार हुसैन की उर्दू में लिखी इस किताब का तर्जुमा नहीं किया गया है, अनुवादक द्वारा बस इसका लिप्यंतर कर दिया गया है. इसे पुस्तक की ख़ूबी कह सकते हैं और बड़ी ख़ामी भी. ख़ूबी इसलिए क्योंकि इसे पढ़ते समय उर्दू का मज़ा मिलता है और ख़ामी कहने का कारण यह कि आपको काफ़ी सजग रहकर पढ़ना होता है, अन्यथा पूरा पेज पढ़ने के बाद समझ में केवल साठ-सत्तर फ़ीसदी चीज़ें ही आती हैं. हालांकि शुरुआती असुविधा के बाद आनंद आने लगता है. कठिन उर्दू शब्दों के अर्थ दिए गए हैं, जिससे पाठक को थोड़ी नहीं, काफ़ी मदद मिल जाती है.

पुस्तक में दिल्ली के कई-कई बार बसने उजड़ने की दास्तां बड़े रोचक अंदाज़ में बयां की गई है. ऐसा लगता है जैसे कोई कहानी सुना रहा हो. ख़ैर, पांडवों के इंद्रप्रस्थ से लेकर आधुनिक काल में नई दिल्ली के नाम से भारत की राजधानी के रूप में मौजूदा पहचान पाने तक यमुना में बहुत पानी बहा है. जिस-जिसने भी यहां से भारत का संचालन किया उसने डेढ़ ईंटों की अपनी-अपनी दिल्ली बसाने का प्रयास किया था. यह वैभवशाली शहर कुछ ऐसे शासकों से भी मिल चुका है,  दिल्ली के विविध रंगों, ख़ुशबुओं, ज़ायकों, बाज़ारों, फ़कीरों से मिलानेवाली यह पुस्तक इस शहर के इतिहास को जानने की इच्छा रखनेवालों को ज़रूर पढ़नी चाहिए. इसे दो बार पढ़ लीजिए आपको दिल्ली के गली-कूचों ही नहीं उर्दू की नज़ाकत और नफ़ासत से भी इश्क़ हो जाएगा. किताब को रस लेकर पढ़ें, जल्दबाज़ी के चक्कर में आप केवल अपना वक़्त ख़राब करेंगे और लिप्यंतरकार को कोसेंगे.
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Post source : सेज पब्लिकेशन्स इंडिया 

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