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बैठे ठाले—- आभा पैन्यूली

बैठे ठाले—- आभा पैन्यूली

उसकी हस्ती में खुद को जज्ब करने की ख्वाहिशें बूंद पानी की कभी -पानी में नजर आती है ? मलिका-ऐ-हुस्न होना काफी नहीं होता – जोशे जुनूं दिल में ,लुत्फे जुबां भी रखा करो। आहें भरीं तो ऐसी कि बदरा भी उड़ चले निकले थे तुझे ढूंढने –खुद ही खो गए। नाम भी देना है ...
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Top 6 Women Bloggers of India

Top 6 Women Bloggers of India

If you like to create content, then blogging is the best way for you to earn money. Since the dawn of the blogging era, many Indian women have started blogging. Some of them emerged as prominent bloggers due to their excellent content. In this article we will learn about 7 top women bloggers. 1. Tanya ....
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Gazal by Mannu Bhatt

Gazal by Mannu Bhatt

चलें… चलो  इसबार एक ऊँची उड़ान पर चलें, चलो इस आसमान से उस आसमान पर चलें।   किसी ने किसी को धोखा दिया किसी ने किसी को, कम से कम यहाँ हम तो इश्क़ के ईमान पर चलें।   हवा मेरा रुख बदल देना चाहती है बहुत, मैं कहता हूँ हाथ थामें और इम्तेहान पर चलें। ...
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देहरादून वाला हूँ : नरेंद्र सिंह नेगी

देहरादून वाला हूँ : नरेंद्र सिंह नेगी

अपणुं सी दिखेंणु छे रे, लगणुं भल सि मौ को छे – अपणुं सी दिखेंणु छे रे, लगणुं भल सि मौ को छे कां बे ऐ रे पहाड़ी भुला, के जिला के गौं को छे? के जिला के गौं को छे? गढवालि कुमौं नि हूं, ना भुला, ना भोला-भाला हूं – गढवालि कुमौं नि हूं, ...
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Kavita by Kunj Bihari

Kavita by Kunj Bihari

करुण  कण्ठ से गाय रंभाती   सुन लो मेरी पुकार  / कान्हा  ने मुझको  अपनाया  करते तुम   इनकार // सुनो  तुम बात हमारी  , कहे  तुमको  महतारी………… भारतवर्ष  में सदियों  से ही होती मेरी पूजा  / वेद  पुराणों  में भी मेरा नाम हमेशा   गूँजा // स्वर्णिम  दिन लोटा  दो वापिस  समझो मुझे  न  भार,……… करुण………. कान्हा ...
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पुस्तक समीक्षा: बा

पुस्तक समीक्षा: बा

बा लेखक: गिरिराज किशोर मूल्य: रु. 250 (पेपर बैक)  राजकमल प्रकाशन क्या कस्तूरबा नहीं होतीं तो मोहनदास करमचंद गांधी सही मायने में महात्मा गांधी बन पाते? कस्तूरबा गांधी के जीवन पर लिखे उपन्यास बा को पढ़ते हुए यह सवाल आपके मन में कई बार उठेगा. महात्मा गांधी के ऊपर बहुचर्चित किताब पहला गिरमिटिया लिख चुके वरि...
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समीक्षा: पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नालासोपारा

समीक्षा: पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नालासोपारा

पुस्तक समीक्षा: पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नालासोपारा लेखक: चित्रा मुद्‍गल  मूल्य: रु. 200 (पेपर बैक)   सामयिक पेपरबैक्स  हमारे वक़्त की और हम जैसों की कहानी रचनेवाली चित्रा मुद्‍गल जब कुछ नया लिखती हैं, तो उसे पढ़ने की ललक ही कुछ और होती है. उनकी कहानियों और उपन्यासों के क़िरदार आसपास से गुज़रते से लगते हैं....
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समीक्षा: दिल्ली था जिसका नाम

समीक्षा: दिल्ली था जिसका नाम

लेखक: इन्तिज़ार हुसैन (अनुवादक: शुभम मिश्र) मूल्य: रु. 395 (पेपर बैक) सेज पब्लिकेशन्स इंडिया   इन्तिज़ार हुसैन की उर्दू में लिखी इस किताब का तर्जुमा नहीं किया गया है, अनुवादक द्वारा बस इसका लिप्यंतर कर दिया गया है. इसे पुस्तक की ख़ूबी कह सकते हैं और बड़ी ख़ामी भी. ख़ूबी इसलिए क्योंकि इसे पढ़ते समय उर्दू क...
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Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

सबको चिंता देश की और है फ़िक्र देश की जनता की लेकिन फिर बदहाल देश क्यों देश की जनता रोती है क्या कोई है अफ़सोस तुझे क्या शर्म आँख में रहती है ? तू बता देश की राजनीति ग़ैरत  तेरी क्या कहती है ?   गोरे  दुश्मन गए देश से काले फिर ज़ल्लाद हुए आम ...
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छोटी-सी बात तथा अन्य कहानियां

छोटी-सी बात तथा अन्य कहानियां

समीक्षा: छोटी-सी बात तथा अन्य कहानियां लेखक: देवेन्द्र कुमार मिश्रा मूल्य: रु. 400 (हार्ड बाउंड) लेखक देवेन्द्र कुमार मिश्रा के कहानी संग्रह छोटी-सी बात और अन्य कहानियां में कुल 22 कहानियां हैं. इस संग्रह में लेखक ने कई विषयों को समेटने की कोशिश की है. धर्म, जाति, सामाज और राजनीति जैसे कई मुद्दों को छूत...
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समीक्षा: डब्बू

समीक्षा: डब्बू

लेखिका: अनुजा चौहान अनुवाद: मनीषा तनेजा मूल्य: रु. 299 (पेपर बैक) वेस्टलैंड लिमिटेड  रिटायर्ड जज जस्टिस लक्ष्मी नारायण ठाकुर की पांच बेटियां हैं. जिनके नाम उन्होंने अंग्रेजी के पहले पांच अक्षरों पर रखे हैं-अंजनी, बिनोदनी, चंद्रलेखा, देबजानी और ईश्वरी. उन्हें केवल तीन चीज़ों से बेइंतिहा लगाव है-अपने बंगले...
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समीक्षा: लता सुर-गाथा

समीक्षा: लता सुर-गाथा

समीक्षा: लता सुर-गाथा लेखक: यतीन्द्र मिश्र  मूल्य: रु. 615 (पेपर बैक)  वाणी प्रकाशन लता मंगेशकर हमारे देश की ऐसी शख़्सियत हैं, जिनसे यहां का हर बाशिंदा जुड़ा हुआ है. उनके गाए अनगिनत गानों में एक-दो गाने ऐसे ज़रूर होते हैं, जिससे आपके अस्तित्व की पहचान बन जाती है. यूं तो पचास के बाद की पीढ़ी ...
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रिश्ते पुराने होते हैं, पर “मायका” पुराना नही होता। By  अमृता प्रीतम

रिश्ते पुराने होते हैं, पर “मायका” पुराना नही होता। By अमृता प्रीतम

रिश्ते पुराने होते हैं, पर “मायका” पुराना नही होता। जब भी जाओ ….. अलाये-बलायें टल जाये, यह दुआयें मांगी जाती हैं। यहां-वहां बचपन के कतरे बिखरे होते हैं, कहींहंसी,कहीं खुशी,कहीं आंसू सिमटे होते हैं। बचपन का गिलास…. कटोरी …., खाने का स्वाद बढ़ा देते हैं। अलबम की तस्वीरें, कई क...
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नॉन रेज़िडेंट बिहारी

नॉन रेज़िडेंट बिहारी

लेखक: शशिकांत मिश्र मूल्य: रु. 99 (पेपर बैक) फ़ंडा, राधाकृष्ण प्रकाशन का उपक्रम यह उपन्यास नायक राहुल के लालबत्ती और प्रेमिका शालू को पाने के दो सपनों के इर्द-गिर्द बुना गया है. राहुल लालबत्ती पाने की ख़्वाहिश में कटिहार से दिल्ली के मुखर्जीनगर पहुंचता है. वही मुखर्जीनगर, जो दिल्ली में बिहारी छात्रों की...
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डायल डी फ़ॉर डॉन

डायल डी फ़ॉर डॉन

डायल डी फ़ॉर डॉन लेखक: नीरज कुमार अनुवाद: मदन सोनी मूल्य: रु.250 (पेपर बैक) पेंगुइन बुक्स इंडिया प्रा. लि., सेवा निवृत्त आईपीएस ऑफ़िसर नीरज कुमार की यह किताब जुर्म की दुनिया के विभिन्न मामलों की तफ़्तीश में उनकी सक्रिय भूमिका पर आधारित है. इसमें कुल ग्यारह चैप्टर्स या कहें अपराध कहानियां हैं. ये सभी कहा...
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Gazal by Kavi Rajesh Purohit

Gazal by Kavi Rajesh Purohit

गरीबों में ईश्वर जिसने खोजा है। असल में वहीं करतार रहता है।।   योजनाओं का लाभ मिले उन्हें। जो असल में हकदार रहता है।।   मेरे शहर में डेंगू ने पैर पसारे है। हर कोई अब  बीमार रहता है।।   घरों में अपनत्व नहीं रहा जबसे। हर कोई यहाँ  लाचार रहता है।।   करूँ किस ...
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ये औरतें भी न! By Nanda Jakhmola Kestwal

ये औरतें भी न! By Nanda Jakhmola Kestwal

ये औरतें भी न! दो मिनट की आरामदायक और  बच्चों के पसंद की ज़ायकेदार मैगी को छोड़,  किचन में गर्मी में तप कर  हरी सब्ज़ियाँ बनाती फिरती हैं। बच्चे मुँह बिचकाकर  नाराज़गी दिखलाते हैं सो अलग, फिर भी बाज नहीं आती। ! ये औरतें भी न, जब किसी बात पे दिल दुखे , तो घर ...
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वसीयत…  By Shashank Awasthi

वसीयत… By Shashank Awasthi

वसीयत… एक घर मे तीन भाई और एक बहन थी…बड़ा और छोटा पढ़ने मे बहुत तेज थे। उनके मा बाप उन चारो से बेहद प्यार करते थे मगर मझले बेटे से थोड़ा परेशान से थे। बड़ा बेटा पढ़ लिखकर डाक्टर बन गया। छोटा भी पढ लिखकर इंजीनियर बन गया। मगर मझला बिलकुल अवारा और गंवार ...
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खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी…  By: सुभद्रा कुमारी चौहान

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी… By: सुभद्रा कुमारी चौहान

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। ...
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