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डाॅ. निशंक की एक और उपलब्धि, ‘वातायन’ अंतर्राष्ट्रीय शिखर सम्मान

डाॅ. निशंक की एक और उपलब्धि, ‘वातायन’ अंतर्राष्ट्रीय शिखर सम्मान
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  • यूके की संस्था ने किया अलंकृत, कवि और शायर मनोज मुंतशिर भी सम्मानित
  • निशंक ने देश के करोड़ों युवाओं को समर्पित किया पुरस्कार

देश-दुनिया में ख्यातिलब्ध साहित्यकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री डाॅ. रमेश पोखरियाल निशंक के खाते में एक और उपलब्धि जुड़ गयी। उन्हें हिन्दी साहित्य लेखन में विशिष्ट योगदान के लिए ’वातायन’ अंतर्राष्ट्रीय शिखर सम्मान (वातायन लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड) से अलंकृत किया गया। साथ ही प्रसिद्ध कवि मनोज मुंतशिर को ’वातायन’ अंतर्राष्ट्रीय कविता सम्मान (इंटरनेशनल वातायन लिटररी अवार्ड) से विभूषित किया गया।

डाॅ. निशंक ने इस सम्मान को पूरे हिंदुस्तान का सम्मान बताते हुए कहा कि यह सम्मान मेरे देश के उन करोड़ों युवाओं को समर्पित है, जो मेरे देश को पुनः विश्वगुरु बनाने की ओर अग्रसर हैं। डाॅ. निशंक की इस बड़ी उपलब्धि पर देश-दुनिया के अनेक साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने प्रसन्नता व्यक्त कर उन्हें शुभकामनाएं प्रदान कीं। भारतीय समय के अनुसार शाम 8.30 बजे आरंभ हुए इस वर्जुअल कार्यक्रम में अनेक देशों के विद्वानों, लेखकों, कवियों और शिक्षाविदों ने सहभागिता की।



लंदन में 21 आयोजित वातायन-यूके सम्मान समारोह में डाॅ. निशंक और मनोज मुंतशिर को यह पुरस्कार दिए गए। कार्यक्रम का आरंभ रीना भारद्वाज के सरस्वती वंदना गायन से हुआ। वातायन संस्था की संस्थापक दिव्या माथुर ने इन पुरस्कारों के विषय में विस्तार से प्रकाश डाला। वातायन के संस्थापक सदस्य पद्मेश गुप्त ने डाॅ. रमेश पोखरियाल निशंक की साहित्यिक यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डाॅ. निशंक ने बहुत कम समय में इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल की है।

वैश्विक हिंदी परिवार के संस्थापक अनिल शर्मा जोशी ने डाॅ. निशंक के साहित्य का विश्लेषण करते हुए कहा कि डाॅ. निशंक के साहित्य में पूरा पहाड़़ और वहां की संवेदनाएं झलकती हैं। उनकी कहानियों और उपन्यासों के पात्र पूंजीपति न होकर किसान और शिक्षक जैसे साधारण लोग हैं। 75 से अधिक पुस्तकों की रचना करने वाले और 15 से अधिक देशों में सम्मानित हो चुके डाॅ. निशंक का साहित्य उच्च कोटि का है। अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है। उनके साहित्य में आम आदमी की पीड़ा है।

इस मौके पर डाॅ. रमेश पोखरियाल निशंक ने इस पुरस्कार को हिंदुस्तान का सम्मान करार देते हुए कहा कि यह पुरस्कार मेरे देश के उन युवाओं को समर्पित है, जो मेरे भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने की ओर अग्रसर हैं। उन्होंने कहा कि भारत की सोच विस्तारवादी नहीं रही, वह शांति का समर्थक रहा है। विश्व में शांति और ज्ञान का रास्ता भारत से होकर गुजरता है। हमारी राष्ट्रीय शिक्षा की नींव इसी पर है।




पुरस्कार प्रदान करने वाली वातायन संस्था और वैश्विक हिंदी परिवार के हिंदी के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के कार्यों की सराहना करते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री डाॅ. निशंक ने कहा कि हिंदी ऐसी समृद्ध भाषा है, जिसमें नौ लाख शब्दों का शब्दकोश है। हिंदी एक विचार, उल्लार और संस्कार है। यह भाषा पूरे विश्व में अपना परचम लहराने जा रही है। इस भाषा के लिए कार्य करने वाली संस्थाएं बधाई की पात्र हैं।

अपनी साहित्यिक यात्रा पर डाॅ. निशंक ने कहा कि मेरी रचनाओं में उस पहाड़ी गरीब बालक का दर्द है, जो एक गरीब परिवार में पैदा हुआ, रोजाना पहाड़ी पगडंडियों पर आठ-नौ किलोमीटर पैदल चलते हुए जिसने शिक्षा हासिल की, अध्यापक बना और इसके बाद उत्तर प्रदेश में कैबिनेट मंत्री उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बनने के बाद भारत के शिक्षा मंत्री की कुर्सी तक पहुंचा। मेरी जीवन की कठोर और संघर्षमयी यात्रा ही मेरे साहित्य में बसती है, जिसमें तनाव-अभाव से ग्रस्त न जाने कितने पहाड़ी मजबूर युवाओं का दर्द उकेरा गया है।



उन्होंने कहा कि मैं अचानक राजनीति में आ गया, यह एक संयोग था, जिसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था। अब इस क्षेत्र में आ ही गया हूं तो अपने देश के लिए वह करने का पूरा प्रयास करूंगा, जो मेरा बचपन से ही सपना था। मैं हर युवा के हाथ में काम देखना चाहता हूं, वह युवा शिक्षित और संस्कारयुक्त हो, उसकी आत्मा में भारत बसता हो।

डाॅ. निशंक ने इस मौके पर अपनी दो कविताएं-’मैं पहाड़ हूं’ और ’अभी भी है जंग जारी’ सुनायीं। मनोज मुंतशिर ने ’तुमसे यह नहीं हो पाएगा’ कविता सुनायी। इस अवसर पर अनिल शर्मा जोशी ने डाॅ. निशंक को ’वातायन’ अंतर्राष्ट्रीय शिखर सम्मान से अलंकृत किया।

इस मौके पर वातायन के संरक्षक और सांसद वीरेंद्र शर्मा, वाणी प्रकाशन की कार्यकारी निदेशक अदिति माहेश्वरी, डाॅ. निखिल कौशिक आदि उपस्थित रहे।




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