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November 22, 2019

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मिलिए उत्तराखंड के अत्यंत रचनात्मक कवि और लेखक अनिल कार्की जी से

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पिता
बरसात में
बादलों को
चौबीस तिल्लियों वाले
गोल काले छाते के
भीतर समेट लेते थे

ईजा थी कि अपने ’घोघ’ में
सीमेटे रहती
चौमास की नदियाँ
जो छलछलाती थी
उसके अन्तस में

ईजा के घोघ के सामने
पिता का काला छाता
वैसे ही इठलाता रहता
जैसे ’सत्यमेव जयते’ के ठीक उपर
अशोक का धम्मचक्र

पिता परदेस थे
ईजा थी मुलुक

Anil Karki

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Post source : Anil Karki

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