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हलाला : समीक्षा

लेखक: भगवानदास मोरवाल
मूल्य: रु. 175 (पेपर बैक) 
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन
लेखक भगवानदास मोरवाल ने उपन्यास हलाला के माध्यम से धर्म की आड़ में हो रहे स्त्री-शोषण पर प्रकाश डाला है. हलाला वह प्रथा है, जिसमें कोई तलाक़शुदा महिला अपने पहले पति के पास दोबारा तब जा सकती है, जब उसका किसी दूसरे पुरुष से निकाह हो और वह पुरुष हमबिस्तर होने के बाद उसे तलाक़ दे. वैसे तो हलाला मर्दों को सज़ा देने के नाम पर बनाया गया क़ानून है, पर इसने स्त्री को भोगने की वस्तु बना दिया है. 
 
शौहर नियाज़ द्वारा बिना किसी जायज़ वजह के तलाक़ दी गई नज़राना को उसके ससुरालवाले दोबारा बहू बनाकर अपने घर लाना चाहते हैं. लेकिन इसके लिए उन्हें शरिया क़ानून की वह शर्त पूरी करनी है, जिसे हलाला कहा जाता है. इस शर्त को पूरी करने के लिए उसकी शादी करा दी जाती है पड़ोस में रहनेवाले डमरू से. चार भाइयों में सबसे छोटा डमरू, अविवाहित है. काले रंग का होने के चलते उसे कलसंडा कहकर बुलाया जाता है. घर में उसकी ज़्यादा क़द्र नहीं है. तीन भाभियों में दो तो चाहती हैं कि उसकी शादी ही न हो, ताकि ज़मीन-जायदाद का एक और हिस्सा न करना पड़े. डमरू और नज़राना का तलाक़ हमबिस्तर न होने के चलते नहीं हो पाता. उन्हें एक और मौक़ा दिया जाता है. अपने बच्चों के पास पहुंचने के मोहवश नज़राना किसी तरह उसके लिए तैयार होती है, पर भोला-भाला डमरू इनकार कर देता है. हां, यह ज़रूर कहता है कि पंचों के सामने शर्त पूरी होने की बात स्वीकार लेगा.

जब हलाला की शर्त पूरी होने की बात पूरे गांव में फैलती है तो नज़राना की सास का उसे घर वापस लाने का इरादा बदल जाता है. लेकिन उसका पति नियाज़ उसे घर वापस लाना चाहता है. पंचों के सामने डमरू हलाला की शर्त पूरी करने की बात कहते हुए तलाक़ देने ही वाला होता है कि नज़राना सबको शर्त पूरी न होने की बात बता देती है. साथ ही यह भी कि आगे से वह डमरू के पास ही रहना चाहती है. वह पुरुषवादी सत्ता से कई तीखे सवाल पूछती है. उसकी ज़्यादतियों को न सहने की घोषणा करती है.
मुस्लिम परिवेश पर लिखे इस उपन्यास की कहानी की पृष्ठभूमि हरियाणा का मेवात ज़िला है. इसके पात्र मेवाती में संवाद करते हैं. इसमें काफ़ी गालियां भी हैं, पर चूंकि ये मेवाती बोली में आम हैं, अत: कहीं से भी बुरी या अश्लील नहीं लगतीं. ट्रिपल तलाक़ के ख़िलाफ़ इन दिनों जिस तरह मुस्लिम महिलाओं और राजनैतिक दलों द्वारा आवाज़ बुलंद की जा रही है, उससे यह उपन्यास सामयिक बन गया है. आम स्त्री के विद्रोह की यह कहानी ज़रूर पढ़ी जानी चाहिए.




Post source : प्रकाशक: वाणी प्रकाशन

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