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December 14, 2018

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मुबंई हमले के 10 साल बाद कितनी मज़बूत है समुद्री सीमाएं

मुबंई हमले के 10 साल बाद कितनी मज़बूत है समुद्री सीमाएं
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आज से 10 साल पहले 2008 में नवंबर के महीने में समुद्र के रास्ते कुछ चरमपंथी मुंबई में घुसे थे और एक बड़े हमले को अंजाम दिया था. भारत ने इस हमले के लिए पड़ोसी देश पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराया था.

उस हमले का असर आज तक भारत-पाक रिश्तों पर दिखता है. मुंबई हमलों के वक़्त भारतीय नौसेना की तैयारियों और समुद्री सीमा की सुरक्षा पर भी कई सवाल खड़े किए गए थे.

अब 10 साल बाद भारतीय नौसेना इस तरह के हमलों के लिए किस हद तक तैयार है और इसके अलावा समुद्री सीमा पर चीन के विस्तार का जवाब किस तरह देखा जा रहा है, इन तमाम मुद्दों पर बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित ने नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा से बात की.

आईएनएस अरिहंत को भारतीय बेड़े में शामिल किए जाने के बाद एक पूर्व नौसेना प्रमुख समेत कई टिप्पणीकारों ने माना था कि सिर्फ एक परमाणु पनडुब्बी (आईएनएस अरिहंत) भारतीय नौसेना के लिए काफ़ी नहीं है. भारत को और भी परमाणु पनडुब्बियों की ज़रूरत है और एक पनडुब्बी शामिल होने पर इतनी ख़ुशी ज़ाहिर करने से फायदे की जगह नुकसान हो सकता है. इस पर आपका क्या कहना है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समुद्री सीमाओं के बचाव के लिए लगातार पेट्रोलिंग की बात कही है, अब इसमें मुझे कुछ नहीं कहना है. आप समुद्री सीमाओं में बचाव के लिए ज़्यादा पनडुब्बियों को शामिल करने की बात कर रहे हैं तो मैं इतना कहना चाहूंगा कि हम इस दिशा में काम कर रहे हैं.

बीते साल दिसंबर में आपने कहा था कि और अधिक परमाणु पनडुब्बियां बनाने का काम शुरू हो गया है, वह काम कहां तक पहुंचा है?

न्यूक्लियर सबमरीन दो तरह की होती हैं, एक एसएसएन जो कि परमाणु क्षमता से लैस होती है और दूसरी एसएसबीएन. मैंने पिछली बार एसएसएन सबमरीन को लेकर बयान दिया था. हमें छह एसएसएन सबमरीन को बनाने की अनुमति मिल गई है. इस समय भारतीय नौसेना उनकी डिज़ाइन पर काम कर रही है और हमें इनके निर्माण की अनुमति मिल जाएगी.

क्या भारतीय नौसेना परमाणु शक्ति से चलने वाले एयरक्राफ़्ट कैरियर के बारे में भी गंभीरता से सोच रही है? क्या इसके अस्तित्व में आने की उम्मीद है?

हमने रक्षा मंत्रालय से भारत में निर्मित अपने दूसरे एयरक्राफ़्ट कैरियर के बारे में बात की है. हमने इसके प्रॉपल्शन प्लांट की समीक्षा की थी. हम परमाणु शक्ति से चलने वाला एक एयरक्राफ़्ट कैरियर बनाना चाहते थे लेकिन प्रस्तावित एयरक्राफ़्ट कैरियर के लिए गति की ज़रूरत थी. लेकिन, अब बिजली से चलने वाले प्लांट उपलब्ध हैं. ऐसे में हमने तय किया है कि हमारा अगला एयरक्राफ़्ट कैरियर कंवेशनली पॉवर्ड एयरक्राफ़्ट कैरियर होगा.

भारत के पास रूस से लीज़ पर लिया हुआ एक परमाणु शक्ति से चलना वाला सबमरीन आईएनएस चक्र है. लेकिन, इसकी लीज़ जल्द ही ख़त्म होने वाली है. हमने सुना है कि इस लीज़ को लेकर रूस के साथ बातचीत जारी है. इस पर अब तक क्या प्रगति हुई है?

हम रूस के साथ एक दूसरी परमाणु शक्ति से चलने वाली न्यूक्लियर सबमरीन लेने के संबंध में बात कर रहे हैं.

क्या इसमें अब तक किसी तरह की सफ़लता मिली है?

मैं इस मुद्दे पर बस इतना ही कहना चाहूंगा. इस बीच आईएनएस चक्र हमारे साथ है जो कि सीमाओं का ध्यान रख रही है. हम रूस के साथ इस सबमरीन की लीज़ बढ़ाने को लेकर बात कर रहे हैं.

मुंबई हमले को दस साल हो चुके हैं, भारत सरकार मानती है कि जो चरमपंथी भारत आए थे उन्हें पाकिस्तान में प्रशिक्षण मिला था. क्या वो प्रशिक्षण शिविर अभी भी वहां पर मौजूद है?

पिछले दस सालों में भारत समुद्री सीमाओं की सुरक्षा के लिहाज़ से काफ़ी आगे बढ़ा है. हम अब ज़्यादा तैयार हैं. इस मुद्दे पर जो एजेंसियां काम करती हैं, उनके बीच तालमेल बेहतर हुआ है. नेवी और कोस्ट गार्ड के बीच में स्टेंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीज़र को बनाया गया है. तटीय सुरक्षा को लेकर अलग-अलग तटीय प्रदेशों के साथ नियमित अभ्यास होते हैं. अगले साल जनवरी में हम सी विज़िल नाम का एक अभ्यास कर रहे हैं. इसमें तटीय सुरक्षा से जुड़ी सभी प्रक्रियाओं को शामिल किया जाएगा. ऐसे में हम पहले से ज़्यादा तैयार हैं. दूसरा मुद्दा आपने उठाया है कि पड़ोसी देशों में प्रशिक्षण शिविरों को लेकर. मैं कहना चाहूंगा कि वे प्रशिक्षिण शिविर अब भी मौजूद हैं.

अभी हाल ही में एक रिपोर्ट आई थी जिसमें बताया गया था कि तमाम प्रयासों के बाद भी 2.2 लाख मछली पकड़ने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली नावें ऐसी हैं जो कि 20 मीटर से कम की हैं और जिन्हें राडार से ट्रेस नहीं किया जा सकता. हम दस साल बाद भी यहां क्यों खड़े हैं?

बीते दस सालों में, मछली पकड़ने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली सभी नावों का पंजीकरण कराया जा चुका है. सभी मछुआरों को बायोमैट्रिक कार्ड जारी कर दिए गए हैं. आपने एआईएस ट्रांसपोंडर की बात की है. हमने गुजरात और तमिलनाडु में इसरो के साथ काम करते हुए एक हज़ार नावों पर ये ट्रांसपोंडर लगाए हैं और इन नावों को उपग्रहों की मदद से ट्रेस किया जा सकता है. हमने पूरी भारतीय तट रेखा पर एक राडार चेन बनाई है जिसका पहला भाग पूरा हो गया है और दूसरा भाग बाकी है. ऐसे में अगर ये छोटी नावें एक राडार पर भी नज़र आती हैं तो हमारे पास इन्हें ट्रेस करने के लिए दूसरे रास्ते हैं. लैंडिंग पॉइंट और बंदरगाहों पर बड़े ध्यान से मॉनिटर किया जा रहा है और अब हमारे पास पहले से कहीं ज़्यादा जानकारी है.

आपके मुताबिक़ इन 2.2 लाख नावों को मॉनिटर करना कब तक संभव होगा?

एक बार इस पायलट प्रोजेक्ट में सफलता मिल जाए तो हम इसे पूरे देश में लागू कर सकते हैं.

मार्च 2018 में आपने कहा था कि पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह पर अभी तक चीनी नौसेना की कोई गतिविधि नहीं देखी गई है. क्या अभीतक आपने वहां पर कोई सैन्य गतिविधियां नहीं देखी हैं?

आज की तारीख तक हम ग्वादर में चीनी नौसेना की किसी सैन्य गतिविधि का इंतज़ार कर रहे हैं. चीन ने कहा है कि वह एक कमर्शियल बंदरगाह है. इसलिए हम अभी भी चीन की ओर से किसी तरह की हरकत का इंतज़ार कर रहे हैं.

आपने हाल ही में कहा था कि चीन ने दक्षिण चीन सागर की मौजूदा स्थिति में बदलाव किया है. क्या आपको लगता है कि चीन अलग-अलग तरीकों जैसे अपनी नौसेना के लिए अड्डे बनाकर या पनडुब्बी और जहाज तैनात कर हिंद महासागर के हालात को भी बदलने की कोशिश कर रहा है?

साल 2008 के बाद से ही चीनी नौसेना ने हिंद महासागर के इलाके में अपनी निरंतर मौजूदगी दर्ज की हुई है, हर वक्त वहां 6 से 8 लड़ाकू जहाज़ तैनात रहते हैं. लेकिन जिस तरह के हालात उन्होंने दक्षिणी चीन सागर में बदले हैं वैसे वे हिंद महासागर में नहीं कर सकते. हां, यह सच है कि उन्होंने जिबूती में अपना पहला विदेशी बेस बनाया है लेकिन मैं यह नहीं कहूंगा कि इससे हिंद महासागर के हालात बदल जाएंगे. दक्षिणी चीन सागर के हालात और हिंद महासागर के हालात में बहुत फ़र्क है.

भारत सरकार लगातार कहती रहती है कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है, फिर भी संसद की रिपोर्ट कहती है कि साल दर साल सेना के बजट में कमी हो रही है. यहां तक की चीन के लगातार बढ़ते ख़तरे को महसूस करने के बाद भी. भारत की तीनों सेनाओं में आप सबसे वरिष्ठ अधिकारी हैं, इस लिहाज़ से आपको क्या लगता है कि सरकार आपकी ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पा रही या फिर सरकार और सेना के बीच संवाद की कमी है?

भारत तरक्की कर रहा है और हम भी इसी अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं. हमारी ज़रूरतों के बारे में सरकार अच्छे से जानती है और हमें उम्मीद है कि सरकार उन्हें पूरा करेगी.

लेकिन आपका बजट तो बढ़ ही नहीं रहा?

हमारे बजट में तो वृद्धि हुई है लेकिन जीडीपी में उसके कुल हिस्से में कमी आई है. तीनों सेनाओं की ज़रूरतें सरकार को पता हैं और मुझे पूरा विश्वास है कि इन्हें पूरा किया जाएगा.

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Post source : agency

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