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पापा की बेटी: By जयंती रंगनाथन  

पापा की बेटी:  By जयंती रंगनाथन  
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एकबारगी मन हुआ कि घर जाने के लिए बस के बजाय ऑटो कर ले. नीले रंग के पर्स में उसकी ख़ुशियों की चाबी बना वो ऑफ़र लेटर पेट में गुदगुदी-सा कर रहा था. पर्स टटोला, दो सौ रुपए थे. ऑटो करेगी, तो सौ का पत्ता तो वहीं निकल जाएगा. नहीं, उससे अच्छा है कि जाते समय हीरा हलवाई से पावभर बालूशाही ले लेगी. मम्मी को कितनी पसंद है. दादी भी ना-ना करते एक पीस तो खा ही लेंगी.

मेधा को दस मिनट इंतज़ार करने के बाद बस मिल गई. रास्ता और दिनों की अपेक्षा लंबा लगा. हर स्टॉप पर बस रुकती तो दिल की धड़कन बढ़ जाती. मां को कैसा लगेगा, जब वह बताएगी कि उसे नौकरी मिल गई है? वो भी बैंगलोर में! मां को पता तो था कि इन दिनों कॉलेज में कैंपस इंटरव्यू चल रहे हैं. मां उससे कई दिनों से पूछ रही थीं,‘मेधा, तुझे आगे पढ़ना तो नहीं है? मेरे स्कूल में सब कह रहे थे कि इंजीनियरिंग के बाद अगर तू एमबीए कर लेगी तो तेरे लिए अच्छा होगा.’’
मेधा मुस्करा कर बोली थी,‘मां, दो-तीन साल बाद में करूंगी एमबीए. अभी तो मुझे नौकरी करनी है, पैसा कमाना है, तुम्हारे लिए ढेर-सी चीज़ें लानी हैं.’मां के चेहरे पर इस बात से ख़ुशी आनी ही थी, पर मेधा को पता था कि वो कुछ बातों को ले कर घबराती हैं. वैसे भी उनकी ज़िंदगी में सबकुछ आसान तो था नहीं.स्टॉप पर उतर कर मेधा हीरा हलवाई की दुकान पर पहुंची ही थी कि सामने पड़ोस में रहने वाले कुलवंत अंकल नज़र आ गए,‘‘बिटिया, अपने बाबूजी के लिए मिठाई लेने आई हो?’’
मेधा चौंक गई. अंकल निकल लिए. मिठाई लेने का उत्साह कम-सा हो गया. बाबूजी? पापा घर आ गए? क्यों?
वह बिना मिठाई लिए झटपट घर चली आई. उनके घर के सामने छोटी-मोटी भीड़ लगी थी. मेधा की आंखें मां को ढूंढ़ रही थीं. पर सामने नज़र आए चांद चाचा. पापा के बचपन के दोस्त. मेधा ने आगे बढ़ कर उनके पांव छुए. वे गदगद हो कर बोले,‘‘कु‌ड़िए, तेरा बाबा लौट आया है. ख़ुशियां मना. देख, मेरा यार घर आ गया, पूरे दो साल बाद.’’
किसी तरह भीड़ से रास्ता बना कर मेधा पीछे के रास्ते रसोई में घुसी. मां चाय बना रही थीं. सिर पर हल्का-सा आंचल. चेहरा पसीने से तर-बतर.मेधा को देखकर मां की आंखों में हल्की-सी चमक आई. मेधा को कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. उसने कुछ रुखाई से पूछा,‘‘मां, बाबा घर क्यों आ गए? सब ठीक चल रहा है उनके बिना भी. अब क्यों आए हैं? कितने दिन रहेंगे?’’
मां ने कुछ जवाब नहीं दिया. ढेर सारे कप में चाय छान कर उन्होंने ट्रे में रखा और मेधा से कहा,‘‘जा, बाहर जा कर दे आ. तेरे बाबूजी कब से चाय के लिए कह रहे हैं.’’मेधा के होंठ व्यंग्य से टेढ़े हो गए,‘ये साधू-संन्यासी कब से चाय पीने लगे?’ मां को कुछ जवाब दिए बिना वह ट्रे उठा कर बाहर ले आई. कमरे के बीचोंबीच मेज पर उसने ट्रे रख दी. दादी और छोटा भाई मनु वहीं बैठे थे. दादी ने उसे अपने पास खींच कर कहा,‘‘पहचाना इसे महादेव? मेधा बिटिया है. इस साल पूरी इंजीनियर बन गई है. एक नंबर की होशियार है. बाहर का सारा काम ये ही करती है.’’

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मेधा ने ना चाहते हुए भी पापा की तरफ़ निगाह डाली. पहले से और भी बूढ़े लग रहे थे. बड़ी सफ़ेद दाढ़ी, आंखों के नीचे काले गड्ढे, पिचके गाल. मेधा के सिर पर हाथ रखकर बाबा बोले,‘‘ये तो मेरी सबसे होनहार बिटिया है.’’
मेधा बिना कुछ कहे पीछे सरक गई.

होनहार बिटिया, पापा की लड्डू, गुड़िया-पुडि़या… यही तो बुलाते थे उसे पापा. पर ये वो वाले पापा नहीं हैं, जो उसका हाथ पकड़ कर उसे संगीत सिखाने ले जाते थे, रातभर जाग कर गणित सिखाते, उसके बीमार पड़ने पर दस मिनट में डॉक्टर को घर ले आते और रातभर उसके सिराहने बैठ कर जागा करते.
वो शायद सातवीं में पढ़ती थी. छोटू दूसरी में. पापा एक कारखाने में काम करते थे. बीमार रहने लगे. हमेशा खांसते रहते. नौकरी छूट गई. मां स्कूल में पढ़ाती थी. पापा ने बहुत इलाज करवाया. फिर किसी ने कहा कि हरिद्वार में एक सिद्ध योगी हैं. वे बड़ी से बड़ी बीमारी ठीक कर देते हैं. पापा वहां गए. कई महीनों बाद लौटे तो पैंट-शर्ट की जगह गेरुए धोती-कुर्ते में थे. सबने कहा…पापा साधू बन गए हैं. पापा बदल गए थे. मेधा को उनसे डर लगने लगा. वह दूर खड़ी देखती, पापा को. मम्मी से कहती,‘ये मेरे पापा नहीं हैं. ये तो कोई साधू बाबा हैं.’

मां कुछ कहती नहीं, उनकी आंखें दिन ब दिन सूखती जा रही थीं. बहुत संघर्ष वाले दिन थे. मां दोनों हाथ खींचकर घर चलातीं. दादी पापड़ और बड़ियां बनाकर बिकने दुकान में दे आतीं. मेधा के बस में बस एक ही चीज़ थी कि वह ख़ूब पढ़े, क्लास में फ़र्स्ट आए.

पापा छह महीने में एक बार आते. दो-तीन घर में रहते. उनसे मिलने दूर-दूर से लोग आते. पापा सबको बिठाकर ज्ञान की बातें बताते, नीति की कहानियां सुनाते. कहते-सुख और दुख में एक-सा रहो. सुख में डूबो मत, दुख में तैरो मत. अपने शरीर से प्यार मत करो, आत्मा से करो.
मेधा को अजीब लगता. स्कूल में उसकी सहेलियों के पिता इंजीनियर, डॉक्टर, पत्रकार थे और उसके-साधू बाबा. पर जल्द ही उसने समझ लिया कि ज़िंदगी अब ऐसी ही कटेगी. उसके प्यारे पापा अब नहीं लौटेंगे. जो कुछ है, वह मां है और मां का संघर्ष है.

शाम तक घर में आने जाने वालों का तांता लगा रहा. मेधा के बैग में रखी ख़ुशियों की चाबी ठंडी पड़ी थी. एकबारगी लगा जैसे अब उसके हाथ कभी ताला लगेगा ही नहीं.

उसे इंजीनियरिंग कॉलेज भेजने के पीछे मां को सबसे कितना लड़ना पड़ा था, छोटे चाचा, बुआ सब मां को नसीहतें दे रहे थे कि बेटी के पीछे इतना क्यों ख़र्च कर रही हो? एक बार इसके बाबूजी से भी तो पूछ लो. उस दिन पहली बार मां ने ज़रा ज़ोर से कहा,‘‘बेटी मेरी है, मुझे पता है इसके लिए क्या सही है क्या ग़लत.’’
उस दिन मेधा की नज़रों में मां का स्थान और बढ़ गया.
रात को खाने के बाद दादी ने मां को आवाज़ दी. मेधा भी उनके पीछे-पीछे बड़े कमरे में आ गई. गर्मियां शुरू हो चुकी थीं. पलंग पर बाबा लेटे हुए थे. दादी उनके पास बैठी थीं. मां को देखते ही दादी बोलीं,‘‘धीरा, मेरा बेटा घर वापस आ गया है. अब यहीं रहेगा. देख, कितना बीमार पड़ गया है. मैं तो कह रही हूं इससे कि अब कहीं ना जाए, तुम भी कहो इससे कि यहीं रहे.’’
मां का चेहरा गंभीर हो गया. मेधा ने चेहरा आगे निकालकर कहा,‘‘दादी, उस वक़्त कहां थे पापा, जब हम छोटे थे और हमें उनकी ज़रूरत थी?’’

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दादी ने झिड़क दिया,‘‘मेधा, ऐसा नहीं कहते, तेरे बाबूजी हैं. इतनी बड़ी हो गई है तू?’
मेधा की आंखें डबडबा आईं,‘‘बच्ची तो तब थी दादी, अब तो बड़ी हो गई हूं. सब देख लिया. अब ना ख़ुद सहूंगी, ना मां को सहने दूंगी. वैसे भी मुझे बैंगलोर में नौकरी मिल गई है. मैं मां और मनु को ले कर जा रही हूं. आप दोनों को जो करना हो कीजिए.’’
सबको हक्का-बक्का छोड़ मेधा अपने कमरे में चली गई. दिल तो भरा ही था, वह फूट-फूट कर रोने लगी.
मां पीछे से आ गई,‘‘तुमने बताया नहीं मेधा, नौकरी मिल गई?’’




रोते-रोते मेधा मां के गले लग गई,‘‘मैं आपको बतानेवाली थी. पर घर में यह सब देखकर हिम्मत नहीं हुई. आप मेरे साथ बैंगलोर चलेंगी ना?’’
मां ने उसका चेहरा अपनी तरफ़ करके कहा,‘‘सब ठीक हो जाएगा बेटू.’’

मेधा बिफर गई,‘‘इसका मतलब है आप नहीं चलेंगी? मुझे पता था, आप ओल्ड फ़ैशन्ड हैं. इतना सब होने के बाद भी… मां, उस आदमी ने आपके साथ इतना ग़लत किया और आप हैं कि उसी का पक्ष ले रही हैं?’’
मां की आवाज़ शांत थी,‘‘मेधा, रात बहुत हो गई है. सो जाओ. कल बात करेंगे.’’

सुबह बहुत देर से आई. मेधा उठी, तो आंखें जल रही थीं. बिना कुछ खाए-पिए वह कॉलेज चली गई. दोपहर को वह लाइब्रेरी में थी, छोटू का मोबाइल पर मैसेज आया-दीदी, घर आ जाओ, अर्जेंट.
मेधा छोटू को फ़ोन लगाती रही, उसका फ़ोन नहीं लगा. वह तुरंत ऑटो पकड़ कर घर पहुंची. रास्तेभर उसे मां की चिंता लगी रही. वह उनसे बिना कुछ कहे-सुने चली आई. कहीं उन्हें कुछ हो तो नहीं गया?
आज घर के सामने शांति थी. ऐसा लगा, जैसे बरसों से घर ख़ाली पड़ा हो. बड़े कमरे में दादी पलंग पर लेटी थी. मेधा को देखते ही उन्होंने मुंह फेर लिया और रोने लगीं. मेधा ‘मां-मां’ पुकारती अंदर चली गई. मां आंगन में चबूतरे पर चुपचाप बैठी थीं, उनके बगल में मनु. मां की आंखें नम थीं. उन्होंने कुछ कहा नहीं. मनु जल्दी से बोला,‘‘दीदी, सुबह नाश्ता करने के बाद पापा घर से चले गए.’’

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‘‘पता नहीं कहां. तुम्हारे नाम एक चिट्ठी छोड़ गए हैं. दादी तब से रो रही हैं, कह रही हैं कि अब बाबा कभी घर नहीं आएंगे.’’
मेधा का दिल बैठ गया. पापा की चिट्ठी? मनु ने इशारा किया,‘‘मां ने फ्रिज के ऊपर रख दी है.’’
मेधा दौड़ के गई. पुराने से कागज़ में पापा ने लिखा था-मेरी गुड़िया, मुझे माफ़ करना. मैं तुम लोग की तरह मोबाइल, मैसेज करना नहीं जानता. बस तुमसे कहना चाहता था कि मैंने जो कुछ भी तुम्हारे साथ किया, नहीं किया, उसके लिए सॉरी. कई बार आप जो निर्णय लेते हैं, उसका असर आपको बहुत बाद में पता चलता है. मुझे पता है कि मैंने तुम लोगों के साथ बहुत ग़लत किया है. तुम एक नई ज़िंदगी की तरफ़ बढ़ रही हो. तुम्हारी क़ामयाबी के पीछे तुम्हारी मां का हाथ है. तुम सब ख़ुश रहो.

मेधा की आंखें बरसने लगीं. उसके पुराने पापा. कितने बीमार हैं. कहां जाएंगे बीमारी में?
रात तक घर में शोक छाया रहा. मेधा मां से आंखें मिलाने की हिम्मत नहीं कर पाई. दादी बिस्तर पर औंधी पड़ी रहीं और बेचारा मनु इधर-उधर चक्कर काटता रहा कि कोई तो उसे पूरी बात बता दे.
मां ने किसी तरह खिचड़ी बनाई. दादी ने खाने से मना कर दिया. मेधा के सामने प्लेट रखते हुए मां बोलीं,‘‘मेधा, मैंने तो ज़िंदगी में तुझसे ज़्यादा दुख देखे हैं. मुझे पता है कि परिस्थितियों का सामना कैसे करना है. कुछ दिन रुक जाती बेटा, सबकुछ ठीक करने की जल्दी में देख तूने क्या कर दिया?’’

मेधा मां से लिपट गई,‘‘मां, मैंने क्या कर दिया? पापा अब कभी वापस नहीं आएंगे ना?’’
उसकी पीठ थपथपा कर मां कमरे से बाहर निकल गई. अचानक मनु ज़ोर से चिल्लाया,‘‘दीदी, बाहर आओ.’’
किसी के कुछ बोलने की आवाज़ आई. अपने आंसू पोंछ मेधा बाहर निकली. बड़े कमरे में पापा खड़े थे. दाढ़ी बनी हुई थी, बाल कटे हुए थे. पापा ने शर्ट और पाजामा पहन रखा था. हाथ में सामान था.
दादी से कह रहे थे,‘‘अम्मा, मैंने हीरा हलवाई की दुकान में काम ले लिया है. मैं बहुत बढ़िया मिठाई बनाता हूं अम्मा, कल ही चखाऊंगा तुम सबको.’’

मेधा दौड़कर उनके पास आ गई. उसके पहले वाले पापा उसके सामने खड़े थे,‘‘गुडि़या, मेरे पास आ. कितनी बड़ी हो गई है मेरी बिटिया, मुझे ज़िंदगी सिखा गई. देख बेटा, अपनी मां को हमेशा ख़ुश रखना. अब मैं चाहता हूं कि मैं काम करूं और वो आराम.’’

मेधा को इस वाले पापा से डर नहीं लगा. वो तो वही थी उनकी लड्डू बेटी. उसे पापा के गले लगते हुए देख, मां की आंखें नम थीं और सालों बाद उनके होंठों पर सुक़ून की मुस्कान थिरक रही थी.






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Post source : femina

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