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June 27, 2019

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एक हलचल : कहानी

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By Renu Mandal

रात्रि के दस बज रहे थे. चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था. हवा में सर्दी बढ़ती ही जा रही थी.

सर्दी की रातें वैसे भी निस्तब्धता ओढ़े हुए होती हैं. गगन और जूही अभी-अभी पार्टी से लौटे थे. काफ़ी देर से वह उनके लौटने की प्रतीक्षा कर रहे थे. ज्यों ही वह सोने के लिए अपने बेडरूम में जाने लगे, खिड़की से उन्होंने देखा, गगन मेन गेट पर लॉक लगाना भूल गया था. पहले उन्होंने सोचा, वह स्वयं ही आगे बढ़कर लॉक लगा दें. फिर वह रुक गए. कहीं इतनी ठंड में लॉन में जाने से उन्हें सर्दी लग गई और वह बीमार पड़ गए तो लेने के देने पड़ जाएंगे. यही सोच वह गगन को लॉक लगाने का निर्देश देने के लिए उसके कमरे की ओर बढ़े, किंतु दरवाजे पर पहुंचकर उनके पांव ठिठक गए. ऐसा लगा, मानो शरीर की समस्त शक्ति चुक गई हो. हृदय में पीड़ा उठी. इतनी सर्दी में भी माथे पर पसीना आ गया. तुरंत दीवार का सहारा न लिया होता तो चक्कर खाकर गिर ही पड़ते. कुछ देर वह यूं ही खड़े रहे फिर लड़खड़ाते हुए कमरे में आकर बैठ गए.

उनकी पत्नी सविता गहरी नींद में सोई हुई थी. एक पल को उनकी इच्छा हुई, वह सविता को जगाकर अपनी हालत के बारे में बताएं किंतु दूसरे ही पल उन्होंने इरादा त्याग दिया. वह कमज़ोर मन की है. थोड़ी-सी घबराहट या परेशानी से उसका ब्लडप्रेशर हाई हो सकता है. नहीं, उसे कुछ भी बताना उचित नहीं. इस तनाव को वह स्वयं ही झेलेंगे. उन्होंने गहरी सांस ली और ईज़ीचेयर से पीठ टिकाकर अपनी आंखें बंद कर लीं.

यकायक ही उनके दिलोदिमाग़ में एक कोलाहल-सा मचने लगा. अभी चार-पांच दिन पहले ही तो सारी ज़िम्मेदारियों से मुक्त होकर उन्होंने राहत की सांस ली थी. सविता की इच्छानुसार अपने सभी रिश्तेदारों और परिचितों को बुलाकर बेटे-बहू का एक रिसेप्शन किया था. मुंह दिखाई में जब सविता ने अपने जड़ाऊ कंगन जूही को पहनाए तो पांव छूकर वह बोली थी,‘‘मैंने अपने मां-बाप को तो देखा नहीं. आज से आप दोनों ही मेरे माता पिता हैं.’’

अश्रुपूरित नेत्रों से सविता ने उसे गले लगा लिया था. यह देख उनके हृदय में गहरी आत्मसंतुष्टि की अनुभूति हुई थी. आत्मसंतुष्टि, सुनने में एक छोटा-सा शब्द, किंतु स्वयं में एक गहन विस्तार समेटे हुए. अपार सुख और शांति का विस्तार. यही सुख और शांति पाने के लिए उन्होंने सारा जीवन जद्दोजहद की. कोई बहुत बड़े स्वप्न नहीं पाले थे उनकी आंखों ने. पढ़ाई में वह प्रारम्भ से ही अच्छे थे. सो आराम से एक सरकारी नौकरी मिल गई उन्हें. जब शादी की बात चली तो मां-बाप की पसंद की लड़की पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगा दी. सविता ने भी अपने मधुर स्वभाव और कर्तव्यनिष्ठा के दम पर यह साबित कर दिया कि उसे जीवनसाथी के रूप में चुनकर उन्होंने कोई भूल नहीं की थी.

कुछ समय के अंतराल पर वह एक बेटी और एक बेटे के पिता भी बन गए. सविता की दो ही इच्छाएं थीं. अपना घर और बेटी-बेटे की अच्छे परिवार में शादी, किंतु वह सबसे पहले अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाना चाहते थे और इसके लिए वह हर माह अपनी सैलेरी का एक बड़ा हिस्सा पीपीएफ़ में कटवा देते थे. इस कारण सविता का हाथ सदैव तंग ही रहा. न तो वह बेचारी कभी अपने शौक़ पूरे कर पाई और न ही खुला ख़र्च कर पाई.

बेटी वंदना ने जब एमबीए पूरा कर लिया तो उन्होंने पीपीएफ़ का एक बड़ा हिस्सा निकालकर उसकी अच्छे परिवार में शादी करा दी. बेटा गगन बीटेक करके मुंबई की एक मल्टीनैशनल कंपनी में जॉब करने लगा था. एक साल बाद वह रिटायर हुए तो सरकारी मकान छोड़ना पड़ा. किराए के छोटे-से मकान में सविता का दम घुटता था. सो जल्दी ही उन्होंने दौड़धूप करके रिटायरमेन्ट में मिले पैसों से शहर से बाहर बनी कॉलोनी में एक मकान ख़रीद लिया. अच्छी कॉलोनी में इतना बड़ा घर पाकर सविता बहुत प्रसन्न थी. आसपास सभी पढ़े-लिखे लोग थे. माहौल भी अच्छा था. उसकी बरसों की इच्छा पूरी करके वह अपार संतुष्ट थे. किंतु दो लाख रुपयों को छोड़कर उनकी सारी जमापूंजी समाप्त हो गई थी. अब गगन का विवाह कैसे होगा? सविता अक्सर चिंता करती, ऊंचे घराने की लड़की से रिश्ता जोड़ने के लिए पैसा तो ख़र्च करना ही पड़ेगा. कहां से आएगा पैसा? उन्होंने इसका भी उपाय सोच लिया था. साल, दो साल प्रतीक्षा करेंगे. अभी गगन की उम्र ही क्या है? पेन्शन के कुछ रुपए और जमा हो जाएंगे. कम पड़े तो कुछ गगन से ले लेंगे और उसका भी विवाह कर देंगे.

तु इंसान के जीवन में तक़दीर नाम की भी एक चीज़ होती है, जो इंसान को जब चाहे चकमा दे सकती है और इंसान असहाय बना दूर से अपनी ज़िंदगी का तमाशा अपनी आंखों से देखता रहता है. आज की ही तरह उस दिन भी वह स्वयं को बेहद लाचार महसूस कर रहे थे, जिस दिन गगन का ईमेल आया था. मेल क्या था, मानो कोई दहकता हुआ ज्वालामुखी था, जिसका एक-एक शब्द गर्म अंगारे की तरह उनके हृदय को जला रहा था. कहीं पढ़ने में उन्होंने भूल तो नहीं कर दी. उन्होंने चश्मा साफ़ करके दोबारा पढ़ा. नहीं कोई भूल नहीं की थी.

गगन ने साफ़ शब्दों में लिखा था,‘पापा, मैंने आपके लिए बहू ढूंढ़ ली है. जूही नाम है उसका. सुंदर, सुसंस्कृत और बुद्धिमान. बिल्कुल आपके और मेरे सपनों के अनुरूप. आज सुबह ही मैंने उससे कोर्टमैरिज की है. मैं जानता हूं, आपने और मम्मी ने मेरे विवाह को लेकर बहुत से सपने संजोए होंगे, किंतु साथ ही यह भी जानता हूं कि मेरी ख़ुशी आप दोनों के लिए सबसे बढ़कर है. जूही का दुनिया में कोई नहीं है. वह अनाथाश्रम में पलकर बड़ी हुई है. अब मैं और आप दोनों ही उसके सब कुछ हैं. इसलिए मैं उसे लेकर घर आ रहा हूं. मुझे विश्वास है, आप दोनों उससे मिलकर बहुत ख़ुश होंगे.’
वह अवाक् रह गए थे.

कैसे उठा लिया बेटे ने इतना बड़ा क़दम? कितनी ही देर तक कमरे में निःसहाय बैठे इस पीड़ा को आत्मसात करने का प्रयास करते रहे, फिर चिन्ता हुई सविता की. उसे जब पता चलेगा तो रो, रोकर हलकान हो जाएगी. मां है आख़िर, कैसे बर्दाश्त करेगी इतना बड़ा सदमा? किंतु बर्दाश्त तो करना ही है, सोचते हुए वह किचन में चले आए, जहां सविता प्रफुल्लित मन से उनके लिए अदरक वाली चाय बना रही थी. साथ में ताजी मठरियों की सोंधी ख़ुशबू से किचन महक रहा था. चाय ख़त्म करके सविता उठने को हुई तो उन्होंने हाथ पकड़कर उसे बैठा लिया. धीरे-धीरे सारी बात बताई तो उसे

सहसा विश्वास नहीं हुआ. चेहरा विवर्ण हो गया. फिर खिसियाती-सी बोली,‘‘देखिए, अगर यह मज़ाक है तो आइंदा ऐसी बात मत कीजिएगा.’’
‘‘अफ़सोस यही है सविता कि यह मज़ाक नहीं हक़ीक़त है. गगन ने सचमुच कोर्टमैरिज कर ली है.’’ क्रोध और बेबसी के आलम में सविता बिल्कुल जड़ हो गई. उसका इतना आज्ञाकारी बेटा जिसने उसकी इच्छा के विरुद्ध आजतक कोई काम नहीं किया, अपनी ज़िंदगी का इतना बड़ा फ़ैसला स्वयं कैसे ले सकता है? उसका हृदय छलनी हो गया. आंखों से आंसू बहने लगे.

रूठे कंठ से बोली,‘‘अच्छा फल दिया इतने लाड़-प्यार का. समाज में मुंह दिखाने तक के क़ाबिल नहीं छोड़ा. क्या इज़्ज़त रह गई हमारी?’’
वह पत्नी सविता को समझाने लगे,‘‘इस तरह रोने और दुख मनाने की आवश्यकता नहीं है. ऐसा भी अनर्थ नहीं हो गया है. आजकल के बच्चे अपनी मर्ज़ी से शादी कर ही लेते हैं. और जहां तक समाज की बात है, हम लोग एक बढ़िया-सा रिसेप्शन दे देंगे तो कोई कुछ नहीं कहेगा.’’
सविता ने मानो उनकी सुनी ही नहीं. वह बड़बड़ाई,‘‘अरे, कोई भले घर की होती तब भी दिल को तसल्ली थी. अनाथाश्रम में पली-बढ़ी है. न धर्म का पता, न जात का. पता नहीं कैसा ख़ून है.’’

वह क्रोधित हो उठे. कठोर स्वर में बोले,‘‘बेकार में बात का बतंगड़ मत बनाओ. गगन ने कुछ तो उसमें देखा ही होगा. अब हमारा तुम्हारा ज़माना नहीं रहा, जब लोग जातपात में यक़ीन रखते थे. और देखा जाए तो जातपात से मिलता भी क्या है? इंसान का व्यवहार ही काम आता है. हर इंसान की धमनियों में एक-सा लहू दौड़ता है. तुम्हें तो गर्व होना चाहिए, तुम्हारे बेटे ने पुण्य का काम किया है. एक अनाथ लड़की को परिवार देकर उसकी ज़िंदगी बना दी.’’

वह उठकर बाहर जाने लगे, फिर वापिस लौटे और सविता को समझाने लगे,‘‘कल गगन बहू को लेकर आ रहा है. तुम्हारे चेहरे पर लेशमात्र भी शिकन नहीं आनी चाहिए. हमारा एक ही बेटा है. वही हमारे बुढ़ापे का सहारा है.’’ सविता ने सहमति में गरदन हिलाई थी.
सविता को तो वह समझा आए किंतु स्वयं सारी रात सो न सके थे. बेटे के विवाह का कितना चाव था दोनों को. कितने सपनों के महल बनाए थे, सब ताश के पत्तों की तरह बिखर गए. परिस्थितियां ऐसा मोड़ लेंगी, कभी सोचा नहीं था. किंतु होनी को भला कौन टाल सकता है.

अगले दिन वह और सविता बेटे बहू को लेने एयरपोर्ट पहुंचे. गगन के साथ गेट से बाहर आती जूही पर जब उन दोनों की नज़र पड़ी तो आत्ममुग्ध से उसे निहारते रह गए. दूधिया-सी रंगत जिस पर बड़ी-बड़ी कजरारी आंखें, गुलाबी होंठ, कंधे तक लटकते काले घने बाल, ऐसा लग रहा था, मानो ईश्वर ने फ़ुर्सत में उसे गढ़ा हो. तुरंत ही उसके अनाथ होने का ख़्याल मन को बेध गया. गगन के साथ जब वह उन दोनों के पांव छूने को झुकी तो मन में रहा सहा संताप भी जाता रहा और करुणा से उनका हृदय भारी हो उठा. न जाने कितने आशीष उन दोनों ने उसे दे डाले. दो दिन बाद अपने सभी रिश्तेदारों और परिचितों को बुलाकर उन्होंने रिसेप्शन दिया था. इतनी ख़ूबसूरत और मिलनसार भाभी पाकर बेटी वंदना ने भी भाई से कोई गिला नहीं रखा था और वह ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर लौट गई थी. उनके सभी दायित्व अब पूर्ण हो चुके थे और वह स्वयं को बेहद हल्का महसूस कर रहे थे.

पिछले चार दिनों से गगन और जूही घूमने-फिरने और मित्रों के घर पार्टियों में जाने में व्यस्त थे. उनकी नज़र सामने दीवार पर लगी अपने माता-पिता की फ़ोटो पर पड़ी. वह सोचने लगे,‘दो पीढ़ियों के बीच कितना गहरा अन्तराल है. वह तो हमेशा अपने मां-बाप के आज्ञाकारी पुत्र रहे. अपने घर की इज़्ज़त पर कभी आंच नहीं आने दी. किंतु आज की पीढ़ी…’ उनके व्यथित हृदय से एक आह-सी निकली.

जितना अधिक वह स्वयं को पराजित महसूस कर रहे थे, उनके मन का कोलाहल बढ़ता ही जा रहा था और इसी के बीच धीरे-धीरे मानसपटल पर एक धुंधली-सी आकृति उभर रही थी. एक अस्पष्ट-सा चेहरा, अट्टहास करता हुआ. शायद कहीं देखा है इसे किंतु कहां? कुछ याद नहीं आ रहा. फिर धीरे-धीरे वह चेहरा स्पष्ट, और स्पष्ट होता गया. यकायक स्मृतियों के बंद कपाट खुल गए. अरे, यह तो मीरा है. हां, वही है. मीरा, जो उनके साथ कॉलेज में पढ़ती थी. वहीं उससे मित्रता हुई थी. रुचियों और विचारों में समानता होने के कारण कब वह उनके जीवन के अंतरंग क्षणों में समाती चली गई, उन्हें याद नहीं. फिर तो इकट्ठे घूमना-फिरना और अंतहीन बातें. धीरे-धीरे उनके प्रेम की सुगंध हवा में फैल गई. बात उड़ते-उड़ते मीरा के घरवालों तक पहुंच गई थी और उन्होंने तुरंत ही उन्हें घर बुलवा लिया था. वह भी तुरंत पहुंच गए थे, उन्हें आश्वासन देने कि नौकरी लगते ही वह अपने मां-बाप से बात करेंगे और मीरा से विवाह करेंगे. पढ़ाई पूरी होते ही उन्हें नौकरी मिल गई थी. उनके लिए रिश्ते आने लगे. दबी ज़ुबान से जब उन्होंने अपनी मां और पिताजी से मीरा के बारे में बात की तो उन्होंने तुरंत इंकार कर दिया, यह कहकर कि उनके ऊंचे ख़ानदान में एक मध्यमवर्गीय विजातीय बहू का भला क्या काम? उनकी इज़्ज़त का क्या होगा? और वह भी कायरों की भांति ख़ामोश हो गए थे. इस तरह उनकी प्रेम कहानी का पटाक्षेप हो गया था. मां-बाप की पसंद की लड़की सविता से उन्होंने ब्याह रचा लिया फिर तो वह अपनी दुनिया में ऐसे रम गए कि कभी यह जानने का प्रयास भी नहीं किया कि मीरा के ऊपर क्या बीती होगी? उसका विवाह भी हुआ या नहीं? लेशमात्र भी पश्चाताप या आत्मग्लानि के अहसास ने कभी उन्हें नहीं कचोटा था. आज इतने वर्षों बाद उनका वही अतीत उनपर हंस रहा है. अट्टहास करती मीरा मानो उनसे पूछ रही हो,‘अब क्या हुआ आपकी इज़्ज़त का? आपके मान-सम्मान का?’

मीरा की हंसी की गूंज तीव्र, और तीव्र होती जा रही है. इतनी कि उन्हें अपने दिमाग़ की नसें फटती-सी जान पड़ रही हैं. काश वह गगन के कमरे की ओर बढ़े ही न होते. आगे बढ़कर गेट पर लॉक स्वयं ही लगा दिया होता तो उन्हें गगन की वह बात सुनाई भी न पड़ती, जो वह अपने कमरे में जूही से कह रहा था,‘जूही, मम्मी को हर बात खोद-खोदकर पूछने की आदत है. उन्हें यही बताना कि तुम मेरी कंपनी में काम करती हो. भूले से भी यह मत कह देना कि तुम मुंबई में बार डांसर थीं.’

उन्हें लग रहा है, उनके मन का यह हलचल अब जीवनपर्यन्त उनके साथ ही रहनेवाला है.

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